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कश्मीर को लेकर मोदी सरकार सख्त, फारूक अब्दुल्ला के बाद दूसरे नेताओं पर भी लग सकता है पीएसए
Tue, 17 Sep 2019 10:01 PM IST
आसिम खान
जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली
Published by: आसिम खान
Updated Tue, 17 Sep 2019 10:01 PM IST
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फारूक अब्दुल्ला (फाइल फोटो)
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कश्मीर को लेकर मोदी सरकार के तेवर सख्त हैं। अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद जम्मू कश्मीर में किसी को भी शांति व्यवस्था बिगाड़ने की इजाजत नहीं दी जा सकती। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने जम्मू कश्मीर प्रशासन को साफ शब्दों में कह दिया है कि कोई भी व्यक्ति चाहे वो कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो, अगर वह कश्मीर में कानून व्यवस्था का उल्लंघन करता है या लोगों को भड़काने का प्रयास करता है तो उसके खिलाफ पब्लिक सेफ्टी ऐक्ट (पीएसए) लगा दिया जाए।
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मंत्रालय के सूत्र बताते हैं कि आने वाले समय में राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि, अलगाववादी नेता और कथित सामाजिक संगठनों के सदस्यों के खिलाफ सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम लगाया जा सकता है। ये सभी वे लोग हैं जो अभी तक अनुच्छेद 370 हटाए जाने के मसले पर अलग राह अपनाए हुए हैं। सूत्रों की मानें तो जल्द ही 350 से ज्यादा लोग पीएसए के दायरे में आ सकते हैं।
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बता दें कि सोमवार को जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला को पीएसए के तहत हिरासत में ले लिया गया था। हालांकि इससे पहले वे करीब एक माह से भी ज्यादा समय तक नजरबंद रहे हैं। फारूक अब्दुल्ला को अब जहां पर रखा जाएगा, वह जगह अस्थायी जेल का रूप ले लेगी। पीएसए के तहत यह प्रावधान है कि इसमें बिना किसी मुकदमे के किसी भी व्यक्ति को दो साल तक हिरासत में रखा जा सकता है। जम्मू कश्मीर से जुड़े एक आईपीएस अधिकारी का कहना है कि फारूक अब्दुल्ला के बाद अब अनेक लोगों के खिलाफ पीएसए के तहत कार्रवाई की जाएगी।
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इसकी वजह यह है कि अनुच्छेद 370 हटाए जाने के करीब डेढ़ माह बाद भी ये लोग केंद्र सरकार के साथ चलने को तैयार नहीं हैं। अभी तक जो व्यक्ति नजरबंद हैं या दूसरे राज्यों की जेलों में कैद हैं, उनसे दो बार पूछा गया है कि वे मुख्यधारा में लौटना चाहें तो सरकार उनकी पूरी मदद करेगी। हालांकि अभी तक इस मामले में सरकार को खास सफलता हाथ नहीं लगी है। अधिकारी का कहना है कि जो लोग जेलों में बंद हैं या नजरबंद किए गए हैं, उनमें अधिकांश व्यक्ति राजनीतिक दलों से जुड़े हैं।
इसके बाद अलगाववादियों एवं दूसरे संगठनों का नंबर आता है। जम्मू कश्मीर की जेलों में अनेक ऐसे युवा भी बंद हैं जो अतीत में पत्थरबाजी और दंगे कराने जैसी घटनाओं में शामिल रहे हैं। सरकार को अब ऐसी खबर मिल रही है कि जेल में बंद या घरों में नजरबंद लोग बड़े स्तर पर अदालतों का रुख करने की तैयारी कर रहे हैं। इसके लिए उन्हें देश विदेश के कई संगठन मदद देने के लिए तैयार खड़े हैं। ऐसे में सरकार नहीं चाहती कि इस मामले में कल को उसे अदालत की फटकार खानी पड़े।
जेलों में बंद करीब दो सौ से ज्यादा लोग तो ऐसे हैं तो पूर्व में भी पीएसए के तहत अंदर जा चुके हैं। सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम, सरकार को 16 साल से ऊपर के किसी भी व्यक्ति को दो साल तक बिना मुकदमा चलाए कैद में रखने की अनुमति देता है। साल 2011 में, यह न्यूनतम आयु 16 से बढ़ाकर 18 साल कर दी गई थी।
पिछले दशकों में पीएसए का इस्तेमाल आतंकवादियों, अलगाववादियों और पत्थरबाजों के खिलाफ किया जाता रहा है। खासतौर पर, 2016 में हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकवादी बुरहान वानी की हत्या के बाद कश्मीर घाटी में जब विरोध प्रदर्शनों और पत्थरबाजी का दौर शुरू हुआ तो पांच सौ से अधिक लोगों को पीएसए के तहत हिरासत में लिया गया था।