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मोदी-शाह को विपक्षी चुनौती के अलावा पार्टी में उठ रहा विरोध का बवंडर भी झेलना होगा

Wed, 26 Dec 2018 05:58 PM IST
आसिम खान जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: आसिम खान Updated Wed, 26 Dec 2018 05:58 PM IST
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Narendra Modi and Amit Shah will have to face opposition challenge and party resist
नरेंद्र मोदी- अमित शाह

'2019' न जाने क्या-क्या दिखाएगा। ये नजदीक आ रहा है तो वैसे ही सत्ता पक्ष और विपक्ष की धड़कने भी अनियंत्रित होने लगती हैं। एक तरफ नितिन गडकरी ने इशारों-इशारों में मोदी-शाह की कार्यशैली पर सवाल उठाने शुरु कर दिए हैं तो दूसरी ओर एनडीए के सहयोगी दल भी आए दिन अपनी 'मांग' बढ़ाते जा रहे हैं। इस बीच बाबा रामदेव, जिन्होंने भाजपा को सत्ता के सिंहासन तक पहुंचाने के लिए खूब मशक्कत की थी, अब वे भी एकाएक 'बोली' बदलने लगे हैं। 

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बाबा कह रहे हैं कि 2019 में क्या होगा, पता नहीं। पीएम कौन होगा और वे खुद किसके साथ हैं, बाबा ने कहा, मुझे पता नहीं। मैं न तो किसी के साथ हूं और न किसी के विरोध में हूं। इन सबके बीच यह साफ हो रहा है कि मोदी-शाह की जोड़ी को विपक्षी चुनौती के अलावा खुद की पार्टी में उठ रहा विरोध का बवंडर भी झेलना होगा। 
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तीन राज्यों में सत्ता हाथ से निकलने के बाद भाजपा नेतृत्व पर सवाल उठने लगे हैं। चुनावी नतीजों के फौरन बाद एनडीए सरकार में शामिल रामविलास पासवान ने अपनी 'मांग' बढ़ा दी। उनसे पहले राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा यूपीए का दामन थाम चुके थे। अब एनडीए के कई दूसरे सहयोगी दल भी भाजपा नेतृत्व के सामने अपनी शर्तें रख रहे हैं। एक तरफ भाजपा इनसे जूझ रही है तो वहीं दूसरी ओर इनके खुद के नेता पार्टी के लिए नई मुसीबत खड़ी करने में लगे हैं। 
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भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने सोमवार को आईबी द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में जो कुछ कहा, वह पार्टी की अंदरूनी राजनीतिक रस्साकसी को जाहिर करने के लिए काफी है। उन्होंने पार्टी अध्यक्ष अमित शाह पर सीधा निशाना साधा है। गडकरी बोले, जब विधायक और सांसद हारते हैं तो जिम्मेदारी पार्टी अध्यक्ष की ही होती है। 

विरोध की इस मुहिम में आरएसएस के चहेते गडकरी 'अकेले' नहीं हैं

लोकसभा चुनाव की दहलीज पर भाजपा में मचे बवंडर को लेकर अभी कोई बोलने को तैयार नहीं है। हालांकि सूत्र बताते हैं कि नितिन गडकरी इस मुहिम में अकेले नहीं हैं। उन्हें पार्टी के मार्गदर्शक मंडल के अलावा मौजूदा कई केंद्रीय मंत्रियों और संघ के कुछ बड़े पदाधिकारियों का समर्थन मिल रहा है। कहा जा रहा है कि पार्टी अध्यक्ष की कार्यशैली से भाजपा नेता ही नहीं, बल्कि सहयोगी दल भी आहत हैं। 

भाजपा के एक बड़े पदाधिकारी का कहना है कि 2014 में लालकृष्ण आडवाणी को साइड लाइन करने के बाद गडकरी, सुष्मा स्वराज और राजनाथ सिंह अंदरखाते खुद का नाम पीएम के लिए आगे बढ़ाना चाहते थे। खास बात यह रही कि उस वक्त पीएम पद के लिए आगे आए नरेंद्र मोदी का नाम इन तीनों की पसंद नहीं था। बाद में तत्कालीन परिस्थितियों के मद्देनज़र इन्हें पीएम पद की दौड़ से बाहर होना पड़ा था। 

गडकरी के हाथ से पहले पीएम और फिर सीएम का पद निकल गया

Narendra Modi and Amit Shah will have to face opposition challenge and party resist

पार्टी सूत्रों का कहना है कि 2014 में नितिन गडकरी का नाम पीएम के दावेदारों की सूची से बाहर होने के बाद ही पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के साथ उनकी दूरी बढ़ गई थी। बाद में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद के लिए नितिन गडकरी आगे आ रहे थे तो एक बार फिर पहले की तरह उनकी राह रोक दी गई। राजनीति में उनके बहुत जूनियर रहे देवेंद्र फडणवीस को सीएम पद मिल गया। अब तीन राज्यों की पराजय के बाद नितिन गडकरी ने अपनी बात आगे बढ़ाने के लिए सही वक्त चुना है। 

कहा जा रहा है कि कई सहयोगी दल जो मोदी-शाह के नाम पर एनडीए में आने से कतरा रहे हैं, वे गडकरी और राजनाथ सिंह जैसे नेताओं पर भरोसा कर कुनबे का हिस्सा बन सकते हैं। चूंकि सुष्मा स्वराज पहले ही कह चुकी हैं कि वे इस बार लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगी। लिहाजा अब पीएम पद के एक बड़े दावेदार राजनाथ सिंह का रुझान किस ओर रहता है, यह देखने वाली बात होगी। आने वाले दिनों में यह भी साफ हो जाएगा कि गडकरी के साथ खुलकर कितने नेता सामने आ रहे हैं। इन सबसे एक बात तो साबित हुई है कि नितिन गडकरी 2019 में पीएम पद के लिए खुद की दावेदारी आगे बढ़ा रहे हैं। 

'उन्हें' नितिन गडकरी का खुलकर बोलना पसंद नहीं

कहा जाता है कि पार्टी की बैठक हो या कैबिनेट की मीटिंग, नितिन गडकरी बहुत खुलकर बोलते हैं। वे सार्वजनिक मंच से भी पार्टी की अंदरुनी राजनीति का जिक्र कर जाते हैं। दो-तीन साल पहले गुरुग्राम में आयोजित एक कार्यक्रम में हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने गडकरी को बतौर मुख्य अतिथि बुलाया था। उसमें गडकरी ने पार्टी की नीतियों का जिक्र करते हुए कहा, ये खट्टर साहब हैं, जब मैं पार्टी अध्यक्ष था तो ये मेरे पास काम मांगने आते थे। 

पार्टी के लिए मुझे कोई काम दीजिये। आज देखिये, ये मुख्यमंत्री हैं। हमारी पार्टी में कोई परिवार नहीं देखा जाता है, जो काम करता है, उसे फल मिलता है। ऐसे ही 2014 के चुनाव से पहले गडकरी ने एक बैठक में नीतिश कुमार से कहा, मेरी गारंटी है कि हम चुनाव से पहले किसी भी नेता का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए आगे नहीं लाएंगे। उस वक्त गडकरी पार्टी अध्यक्ष थे। 

वे दूसरी बार पार्टी अध्यक्ष बनने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन कथित तौर पर एक घोटाले में नाम आने के कारण वे इससे वंचित रह गए। मंत्री रहते हुए भी वे कई बार अपने खुलेपन के लिए चर्चित रहे हैं। अब उनका यही अंदाज भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को रास नहीं आ रहा है। बताया जा रहा है कि नए साल में पार्टी नेतृत्व को कुछ दूसरे नेताओं का भी खुलापन देखने को मिल सकता है। 

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