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संविधान से ऊपर नहीं मुस्लिम पर्सनल लॉ : दारुल उलूम

Fri, 09 Dec 2016 02:56 AM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, देवबंद (सहारनपुर
ब्यूरो/ अमर उजाला, देवबंद (सहारनपुर Updated Fri, 09 Dec 2016 02:56 AM IST
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Muslim personal law is not above the Constitution says Darul Uloom
फाइल फोटो

ट्रिपल तलाक और मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी पर दारुल उलूम के मोहतमिम ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ दफा 25 के तहत संविधान के ऊपर नहीं बल्कि संविधान के अंदर है, जो मजहब पर अमल करने की आजादी देता है।

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बृहस्पतिवार को दारुल उलूम के मोहतमिम मौलाना मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी बनारसी ने तीन तलाक के मसले पर कहा कि हम भी कहते हैं कि तीन तलाक नहीं देनी चाहिए। तीन तलाक देने वाले को गलत समझा जाता है लेकिन अगर कोई तीन तलाक देता है तो वह हो जाएगा।
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उन्होंने कहा कि न तो हम तीन तलाक की वकालत करते हैं और न ही इसमें किसी की हिम्मत अफजाई करते हैं। दारुल उलूम के उलेमा जुमा के खुत्बे और इस्लाही जलसों में तीन तलाक और औरतों के हकों के बारे में लोगों को जानकारी देते हैं। 
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मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक देना क्रूरता की निशानी है? इस सवाल पर मौलाना बनारसी ने कहा कि इस्लामी तालीमात के अंदर जितनी भी बेसहारा औरतें हैं चाहे वह किसी भी वजह से हों, उनकी खैरियत के लिए निजाम (सिस्टम) बनाया गया है। 

धारा नंबर 25 में पूरे मजहब पर अमल करने की आजादी दी

Muslim personal law is not above the Constitution says Darul Uloom
तलाक

ट्रिपल तलाक मुस्लिम महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों का हनन है? इस सवाल पर मौलाना अबुल कासिम बनारसी ने कहा कि हम यह समझते हैं कि जो संविधान है, उसकी धारा नंबर 25 में पूरे मजहब पर अमल करने की आजादी दी गई है।

जिस वक्त हमारा संविधान बन रहा था, उस वक्त संविधान बनाने वालों ने इसकी गारंटी दी थी कि यह हमेशा रहेगा और इसमें कभी कोई तब्दीली नहीं होगी। उसके अंदर नमाज, रोजा, हज, जकात और तमाम हमारी इबादतें शामिल हैं।

लिहाजा ऐसी चीज जो पर्सनल लॉ से टकराती है, वो संविधान के खिलाफ होगी। आपका यह फैसला रोज संविधान से टकरा रहा है। जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ संविधान से ऊपर नहीं बल्कि संविधान के अंदर है। 

मौलाना बनारसी ने यह भी कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट के अंदर यह मसला जरे बहस (विचाराधीन) है और मुसलमानों की जमातें मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जमीयत उलेमा-ए-हिंद अदालत के अंदर अपना पक्ष रख चुकी हैं और वहां बहस चल रही हैं, तो दौराने बहस निचली अदालतों को या समाज के तबके से लोगों को इसके अंदर दखल देना यह अदालत के जहन को मोड़ने की कोशिश है जो गलत है। जबकि कई मुस्लिम महिलाओं की तंजीमें भी अदालत में अपना पक्ष रख चुकी हैं।

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