मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के वरिष्ठ नेता सीताराम येचुरी ने उन अनगिन बैठकों, लंबे अभियानों और चुनावी रणनीति सत्रों को भी याद किया जो उन्होंने समाजवादी पार्टी के संस्थापक दिवंगत मुलायम सिंह यादव के साथ साझा कीं थीं। येचुरी ने कहा कि 82 वर्षीय नेता उत्साही श्रोता थे और विरोधाभासी विचारों को भी सुनने के लिए तैयार रहते थे।
माकपा महासचिव ने उस समयावधि के बारे में भी बात की जब तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने 1997 में गौड़ा सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। येचुरी ने याद करते हुए बताया कि फिर यह मुद्दा उठा कि हमें नए सिरे से चुनाव कराने चाहिए या वैकल्पिक सरकार बनानी चाहिए। चुनाव के लिए एक साल से भी कम समय बचा था, इसलिए वैकल्पिक सरकार ही एकमात्र रास्ता था, वरना यह बहुत सारी समस्याओं का कारण बन जाता।
जब आंध्र भवन में बिताई पूरी रात..
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मुलायम सिंह यादव।
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उन्होंने आगे बताया, अगली सुबह शपथ ग्रहण था, इसलिए हमने पूरी रात आंध्र भवन में बिताई और एक संकल्प पर काम करने की कोशिश की। सुबह तक हम चर्चा कर रहे थे। मुद्दा यह था कि अगर प्रधानमंत्री बदले जाते हैं, तो कैबिनेट के ढांचे को भी बदलने की जरूरत होगी। फिर दावे और प्रतिदावे होंगे क्योंकि बहुत सारी पार्टियां थीं। तो आखिर में मैंने सुझाव दिया कि हमारे पास एक ही कैबिनेट है और केवल प्रधानमंत्री को बदल दें, जब तक यह स्वीकार किया जाता, तब तक सुबह हो चुकी थी।
अच्छाई के लिए पीएम बनने का जायज दावा छोड़ा
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मुलायम सिंह यादव
- फोटो : amar ujala
येचुरी ने बताया, स्वाभाविक रूप से तनाव का माहौल था। मुलायम सिंह यादव वहां पर थे। वह दूसरों के विचार सुनने के लिए तैयार थे। हालांकि उन्होंने महसूस किया होगा कि उन्हें अगला प्रधानमंत्री होना चाहिए। लेकिन वे अच्छाई के लिए आगे आए और उन्होंने पीएम बनने का जायज दावा भी छोड़ा।
वाम नेात ने कहा कि यह एक मौका था जब वह प्रधानमंत्री बनने के करीब आए। येचुरी ने यह भी याद किया कि कैसे समाजवादी पार्टी प्रमुख, माकपा के हरकिशन सिंह सुरजीत जैसे वाम नेताओं के करीबी थे। उन्होंने गौड़ा सरकार के पतन के बाद यादव को प्रधानमंत्री बनने के लिए प्रेरित किया।
अस्सी के दशक में करीब आए वाम दल और सपा
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मुलायम सिंह यादव (फाइल)
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येचुरी ने याद करते हुए बताया कि कैसे वाम दलों ने समाजवादी पार्टी के नेता के साथ मिलकर अस्सी के दशक में वापसी की और अपने राज्य में जेपी आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने आगे कहा कि राजनीतिक दलों और गठबंधन सहयोगियों के रूप में वाम दल और सपा अस्सी के दशक के दौरान करीब आए और 1989 में चुनाव प्रचार के दौरान इसने गति पकड़ी, जिसमें वीपी सिंह ने केंद्र में सरकार बनाई और मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।
वामपंथी और धर्मनिरपेक्ष ताकतों की एकता को बनाया
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मुलायम सिंह यादव का अमरोहा से रहा खास रिश्ता
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येचुरी ने कहा, तबसे लेफ्ट और सपा ने मिलकर काम किया और भाजपा व सांप्रदायिक ताकतों के बढ़ते हमले को रोकने के लिए वामपंथी और धर्मनिरपेक्ष ताकतों की एकता को बनाया। येचुरी ने आगे याद करते हुए कहा, रथ यात्रा और बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय उन्होंने (मुलायम सिंह यादव) हमेशा अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए एक धर्मनिरपेक्ष स्थिति ली और एक अहम सहयोगी थी।