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कोविशील्ड में ज्यादा बनी एंटीबॉडी: देश के 12 राज्यों के 19 अस्पतालों में हुआ अध्ययन

Mon, 07 Jun 2021 10:09 AM IST
Jeet Kumar परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली
परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली Published by: Jeet Kumar Updated Mon, 07 Jun 2021 10:09 AM IST
सार

  • देश में पहली बार फंगस और वैक्सीन पर सामने आए अलग अलग अध्ययन में खुलासा
  • कोरोना की पहली लहर में फैल गया था फंगस , फिर भी सरकार ने नहीं दिया ध्यान 
  • देश के 12 राज्यों के 19 अस्पतालों में हुए अध्ययन

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more antibodies found in Covishield than covaxin
कोविशील्ड - फोटो : twitter@serum institute

विस्तार

फंगस और टीके को लेकर देश में पहली बार दो अलग-अलग अध्ययन सामने आए हैं। इनमें से 12 राज्यों के 19 अस्पतालों में हुए एक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि जहां कोविशील्ड टीका लेने वालों में कोवाक्सिन लेने वालों की तुलना में एंटीबॉडी का स्तर अधिक मिला। 

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ब्लैक फंगस के बढ़ते मामलों पर किए गए एक अन्य शोध में कहा गया है कि स्टेरॉइड के साथ-साथ मधुमेह की दवाएं न लेने इसका खतरा बढ़ा। ब्लैक फंगस देश के 26 राज्यों में फैल चुका है। गौर करने वाली बात है कि देश में फंगस पिछले साल ही फैल चुका था। 
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अध्ययन में पता चला है कि साल 2019 की तुलना में 2020 में ही फंगस के मामले तेजी से बढ़ने लगे थे, लेकिन उस दौरान राज्य और केंद्र सरकारों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। अगर ऐसा होता तो शायद फंगस से बीते तीन माह में हुई मौतों को रोका जा सकता था। 
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वहीं, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) ने इस तरह का अध्ययन किया है। पिछले वर्ष नवंबर में कुछ केस सामने आए थे जिसके बारे में बहुत अधिक चर्चा हुई भी नहीं। 

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के पूर्व अध्यक्ष डॉ. राजीव जयदेवन ने कहा, फंगस पर अध्ययन के परिणाम कई सवालों के जबाव दे रहे हैं लेकिन वर्तमान में अचानक से फैलने के पीछे भी एक अध्ययन होना चाहिए। ताकि दूसरी लहर में मामले बढ़ने के कारणों का पता चल सके।

कोवाक्सिन में 80 फीसदी, कोविशील्ड में 98 प्रतिशत बनी एंटीबॉडी 
पश्चिम बंगाल, राजस्थान, गुजरात और झारखंड के छह अस्पताल और एक स्वतंत्र विशेषज्ञों ने मिलकर यह अध्ययन पूरा किया है, जिसके अनुसार कोवाक्सिन और कोविशील्ड दोनों ही वैक्सीन असरदार हैं लेकिन कोविशील्ड जिन्हें दी गई उनमें कोवाक्सिन से अधिक एंटीबॉडी मिली है। 

अध्ययन में 515 स्वास्थ्य कर्मचारियों को लिया जिनमें से 90 को कोवाक्सिन की दोनों खुराक दी गई थीं। दोनों ही समूह में 95 फीसदी तक कर्मचारियों में एंटीबॉडी विकसित हुई हैं लेकिन कोविशील्ड लेने वालों में यह दर 98 और कोवाक्सिन वाले समूह में 80 फीसदी एंटीबॉडी मिलीं। 

यह अध्ययन वैक्सीन की दोनों खुराक लेने की महत्ता को भी बताता है। वैक्सीन को लेकर अभी तक काफी अध्ययन सामने आए हैं लेकिन यह देश का पहला ऐसा अध्ययन है जिसमें कोवाक्सिन और कोविशील्ड दोनों के परिणाम की आपस में तुलना की है।

दूसरा अध्ययन: 37 फीसदी फंगस मरीजों में मधुमेह नहीं 
भारत में सिंतबर से दिसंबर 2020 के बीच हुए शोध में पता चला कि 37 फीसदी फंगस रोगियों में मधुमेह नहीं था। 18 फीसदी मरीज घर 84 फीसदी पर ही उपचार ले रहे थे। कुल 287 में से 187 (65 फीसदी) फंगस रोगी संक्रमित थे। इन लोगों ने स्टेरॉयड का कोरोना के सेवन किया लेकिन मधुमेह का इलाज नहीं कराया। 2.7 फीसदी ने टोसिलिजुमैब ली। 

फंगस बाद पता चले के कोरोना के बाद आठ दिन बाद पता चले। 2019 में 112 और 2020 में 92 फंगस रोगी ऐसे मिले हैं , जिनमें कोरोना नहीं था । अत्यधिक भाप लेने, नाक की सूजन, अन्य दवा के उपयोग, एंटीबायोटिक उपयोग, पर्यावरणीय कारक या मास्क स्वच्छता को लेकर जानकारी नहीं है । 


इन अस्पतालों में पिछले साल आया फंगस 
दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल और एम्स के अलावा गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में पिछले साल ही कोरोना मरीजों में फंगस के मामले मिलने लगे थे। इनके अलावा चंडीगढ़ के पीजीआई, लखनऊ के एसजीपीजीआई, अहमदाबाद के सीआईएमएस, भोपाल के एम्स, सूरत के वीनस अस्पताल, मुंबई के कोकिलाबेन - पीडी हिंदुजा , बंगलूरू के सेंट जॉन्स, अपोलो चेन्नई और हैदराबाद जैसे अस्पतालों में भी फंगस के मरीज मिलने लगे थे, लेकिन नवंबर 2020 में सर गंगाराम अस्पताल ने ही फंगस मरीजों की सबसे पहले जानकारी दी थी जिनमें से 10 लोगों की मौत भी हुई थी।

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