Moon: जीवन की उत्पत्ति से लेकर जलवायु परिवर्तन तक धरती के हर पहलू को प्रभावित करता है चांद, पढ़ें पूरी खबर
चंद्रमा का प्रभाव जलवायु पर भी पड़ता है। जब चंद्रमा की कक्षा पृथ्वी के भूमध्यरेखा के साथ संरेखित होती है तो उच्च गुरुत्वाकर्षण बल के कारण ज्वार अधिक मजबूत होते हैं और जब यह भूमध्यरेखा से दूर झुका होता है तो ज्वार कमजोर होते हैं।
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अंतरिक्ष विशेषज्ञों, भूवैज्ञानिकों और खगोलशास्त्रियों के अनुसार चंद्रमा पृथ्वी के प्राकृतिक उपग्रह से कहीं अधिक है, जिसने जीवन की उत्पत्ति से लेकर जलवायु परिवर्तन तक, इसके हर पहलू को प्रभावित किया है। 4.5 अरब वर्ष पहले सौरमंडल के जन्म के लगभग 175 मिलियन वर्ष बाद एक प्रलयकारी घटना में थिया नामक मंगल के आकार का ग्रह पृथ्वी से टकरा गया। इस घटना से निकला मलबा एकत्रित होकर चंद्रमा के रूप में निर्मित हुआ।
इस घटना ने संभवत: पृथ्वी को बदल दिया
सबसे तात्कालिक प्रभाव ग्रह की संरचना पर पड़ा। पृथ्वी पर भारी तत्व कोर में जमा हो जाते हैं और हल्के तत्व क्रस्ट में केंद्रित रहते हैं। थिया के साथ टकराव से संभवत: पानी जैसे कुछ हल्के तत्व चंद्रमा तक पहुंच गए। अमेरिका के क्वींसलैंड विश्वविद्यालय में खगोल भौतिकी के प्रोफेसर जोंटी हॉर्नर के अनुसार, यदि पृथ्वी पर अधिक पानी होता तो सब कुछ महासागर होता और हमारे पास महाद्वीप नहीं होते।
इसके बाद ज्वार आया और शुरू हुआ जीवन
3.2 अरब साल पहले चंद्रमा पृथ्वी से करीब 70 फीसदी नजदीक था। इस निकटता के बाद ज्वार आने लगे जो बेहद मजबूत थे। ऐसा माना जाता है कि उल्कापिंडों और धूमकेतुओं से वितरित कार्बनिक अणुओं की प्रतिक्रिया स्वरूप डीएनए या आरएनए जैसे न्यूक्लिक एसिड बने, इससे जीवन शुरू हुआ।
ज्वार ने ऐसे निभाई महत्वपूर्ण भूमिका
उच्च ज्वार के दौरान तटीय क्षेत्र पानी के नीचे होते हैं और कम ज्वार के दौरान वे सूखे होते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यह बदलता वातावरण जटिल प्रतिक्रियाओं को उत्प्रेरित करता है, जिससे सरल अणुओं को जटिल अणुओं के रूप में परिवर्तित करने की सुविधा होती है। तटीय क्षेत्रों में जीवन की उत्पत्ति के बाद ज्वार ने प्राचीन समुद्री जीवों को जमीन पर आने में भी मदद की। ज्वार-भाटा के कारण पृथ्वी के एक दिन की अवधि भी बढ़ गई। लगभग 1.4 अरब वर्ष पहले एक दिन कुल 18 घंटे और 41 मिनट का होता था।
आकाशीय बहाव से भी पृथ्वी-चंद्रमा को खतरा
चंद्रमा पृथ्वी से प्रति वर्ष 3.8 सेमी दूर जा रहा है, जो लगभग नाखूनों की वृद्धि के बराबर है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि यह दर जारी रही तो लगभग 15 अरब वर्षों में ग्रह के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव से मुक्त होने के बाद पृथ्वी अपना प्राकृतिक उपग्रह खो सकती है, लेकिन लगभग 6 अरब वर्षों में सूर्य का ईंधन खत्म हो जाएगा, इस वजह से वह फूल जाएगा और पृथ्वी तथा चंद्रमा को नष्ट कर देगा।
जलवायु परिवर्तन पर भी पड़ता है असर
चंद्रमा का प्रभाव जलवायु पर भी पड़ता है। जब चंद्रमा की कक्षा पृथ्वी के भूमध्यरेखा के साथ संरेखित होती है तो उच्च गुरुत्वाकर्षण बल के कारण ज्वार अधिक मजबूत होते हैं और जब यह भूमध्यरेखा से दूर झुका होता है तो ज्वार कमजोर होते हैं। ज्वार के साथ समुद्र के स्तर में भी उतार-चढ़ाव होता है। नासा का कहना है कि चंद्र नोडल चक्र के आधे हिस्से में दैनिक ज्वार तीव्र होते हैं। वैज्ञानिक साक्ष्य बताते हैं, जीवन के बीजारोपण और आकार देने में चंद्रमा की महत्वपूर्ण भूमिका है। चंद्रमा के बिना हमारा ग्रह बहुत अलग दिखता।
पृथ्वी दो-तीन अरब वर्षों में चंद्रमा के घटते प्रभावों को देखना शुरू कर सकती है। जैस-जैसे पृथ्वी का घूर्णन धीमा होगा, इसकी धुरी अस्थिर हो जाएगी और यह डगमगाने लगेगी। इसके बाद कोई मौसम ही नहीं होगा। यह तबाही की स्थिति होगी। जीवों को उसके अनुकूल ढलने के लिए विकसित होना होगा।