Modi 3.0: पीएम नरेंद्र मोदी के सामने ये हैं सबसे बड़ी छह चुनौतियां, अब इन ऐतिहासिक फैसलों का क्या होगा?
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विस्तार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगातार तीसरी बार इस शीर्ष पद की शपथ लेकर एक इतिहास रच दिया है। लेकिन अब यहीं से उनकी अग्नि परीक्षा शुरू हो गई है। नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू जैसे सहयोगियों को पांच साल साथ लेकर चलना उनके लिए आसान नहीं रहने वाला है, यह अभी से तय माना जा रहा है कि सहयोगी दलों की बेतरतीब मांगें उनके सामने रोड़ा अटका सकती हैं। पिछली बार जब सरकार ने अकेले दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी, पहले ही संसद सत्र में तीन तलाक की समाप्ति और अनुच्छेद 370 के विवादित प्रावधानों की समाप्ति करने जैसे एतिहासिक निर्णय किए गए थे। लेकिन क्या इस बार भी मोदी इतने बड़े फैसले लेने का जोखिम उठा सकेंगे, पूरे देश की निगाहें इस पर टिकी हुई हैं।
1- भाजपा-आरएसएस की आंतरिक राजनीति से तालमेल
पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा-आरएसएस के बीच के तनावपूर्ण रिश्ते लगातार मीडिया की सुर्खियां बने रहे। लगातार यह कहा जाता रहा कि आरएसएस इस पूरे चुनाव में पूरी तरह शांत रहा है। उसने सक्रिय रूप से भाजपा का साथ नहीं दिया, और संभवतः इसी के कारण लोकसभा चुनावों में भाजपा को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। अब जबकि सरकार अपने दम पर नहीं है, उसे आरएसएस से रिश्ते बेहतर करना बहुत आवश्यक हो जाएगा।
उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक के कई भाजपा प्रत्याशियों-नेताओं ने पार्टी संगठन को खुलकर यह बात कही है कि चुनावों में पार्टी के कुछ नेताओं ने उनका सहयोग नहीं किया। उलटे कई जगहों पर उन्हें भितरघात का सामना करना पड़ा।
पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा का कार्यकाल 30 जून को समाप्त हो रहा है। वे केंद्रीय मंत्री भी बनाए जा चुके हैं। ऐसे में भाजपा को नए अध्यक्ष की भी तलाश है। चूंकि, मोदी सरकार भाजपा के संगठन के जरिए ही अपनी योजनाओं को निचले स्तर तक पहुंचाने का काम करती रही है, सरकार को ऐसे संगठन से तालमेल बिठा पाना और ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो जाएगा।
2- यूपी सरकार और राजपूतों को साधना
भाजपा का शीर्ष नेतृत्व लगातार इस बात से परेशान है कि इस लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में उसकी सीटें कम क्यों आईं। उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और गुजरात के बाद भाजपा के तीसरे सबसे मजबूत गढ़ के रूप में उभरा था। लेकिन कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के गठबंधन ने उसका खेल खराब कर दिया। राम मंदिर वाली फैजाबाद लोकसभा सीट पर भाजपा की हार पार्टी अब तक पचा नहीं पा रही है।
इसके लिए कहीं यूपी सरकार की भाजपा संगठन में तालमेल में कमी को जिम्मेदार बताया गया, तो कहीं राजपूत समुदाय की भाजपा से नाराजगी को सबसे बड़ी वजह बताया गया। यूपी के महत्त्व को देखते हुए सरकार इसको नजरअंदाज नहीं कर सकती। इसलिए नई सरकार के लिए यूपी सरकार और संगठन में आपसी तालमेल बेहतर करना बड़ी चनौती साबित होने वाला है।
3- आर्थिक चुनौतियां
मोदी घोषणा कर चुके हैं कि तीसरे कार्यकाल में वे देश को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने की कोशिश करेंगे। इसके लिए अर्थव्यवस्था को लगभग आठ फीसदी की दर से लगातार आगे बढ़ाते रहने की आवश्यकता होगी। इसके लिए सरकार एक बार फिर मूलभूत ढांचे में भारी निवेश का अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने का अपना पुराना फॉर्मूला अपनाएगी। इससे ज्यादा संख्या में रोजगार सृजन करने के साथ-साथ 50 मूल उद्योगों को गति देने में भी मदद मिलेगी।
सरकार इसकी शुरुआत भारी संख्या में प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत घरों के निर्माण से कर सकती है। यह ग्रामीण क्षेत्रों के साथ-साथ शहरी इलाकों में भी रोजगार पैदा करने में सहायक होगा। लोगों के हाथों में पैसा पहुंचेगा तो घरेलू वस्तुओं की खपत को बढ़ाने में भी मदद मिलेगी।
4- इन बड़े फैसलों का क्या होगा?
इसके साथ ही 'एक देश, एक चुनाव' और पूरे देश में 'समान नागरिक संहिता' लागू करने को भी पिछली सरकार ने अपनी प्राथमिकता बताई थी। चुनावों के दौरान भी मोदी-शाह लगातार इस बात को उठाते रहे थे। चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार की बैसाखियों पर टिकी इस सरकार में वे अपने इन इरादों को पूरा करने में कितना सफल हो पाएंगे, यह देखने वाली बात होगी।
हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश-नायडू ने जिस तरह सरकार को साथ देने का भरोसा दिया है, इस बात की संभावना कम ही है कि वे सरकार की राह रोकने की कोशिश करेंगे। लेकिन घरेलू राजनीति और अगले साल ही बिहार में होने वाले विधानसभा चुनावों के दबाव में ये फैसले तब तक के लिए टाले अवश्य जा सकते हैं।
5- इन चुनावों में जीत या हार से पड़ेगा असर
प्रधानमंत्री हर चुनाव बेहद मजबूती के साथ लड़ने के लिए जाने जाते हैं। इसी साल के सितंबर-अक्तूबर माह में हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभाओं के चुनाव होने हैं। झारखंड में भी नवंबर-दिसंबर माह में चुनाव होने हैं। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को ध्यान में रखते हुए जम्मू-कश्मीर में भी सितंबर माह के करीब चुनाव कराए जा सकते हैं। अगले वर्ष की शुरुआत में ही दिल्ली विधानसभा के भी चुनाव होने हैं। दिल्ली को छोड़कर इनमें से ज्यादातर राज्यों में पिछले लोकसभा चुनावों की तुलना में इस बार एनडीए-भाजपा का प्रदर्शन खराब रहा है।
विधानसभाओं के चुनाव प्रमुख तौर पर राज्यों के स्थानीय मुद्दों पर होते हैं और इसे राष्ट्रीय राजनीति का असली प्रतिबिंब भी नहीं माना जाता। लेकिन इसके बाद भी यदि भाजपा-एनडीए विधानसभा चुनावों में इन राज्यों में बेहतर प्रदर्शन करती है, तो इससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मजबूत होती छवि से जोड़कर देखा जाएगा। लेकिन यदि भाजपा का प्रदर्शन खराब रहता है तो विपक्ष इसे मोदी की छवि से जोड़कर दिखाने की कोशिश करेगा। इस तरह इन चुनावों में जीत हासिल करना प्रधानमंत्री के लिए एक चुनौती साबित होने वाला है।
6- अंतरराष्ट्रीय राजनीति का दबाव
चीन से भारत के रिश्ते लगातार दबाव में हैं। चीन लगातार अरुणाचल-सिक्किम में आक्रामक रुख अपना रहा है। पाकिस्तान, नेपाल, भूटान और बांग्लादेश से उसकी लगातार नजदीकी बढ़ रही है। यह नजदीकी भारत के व्यापार और सुरक्षा को प्रभावित करने वाली है। यही कारण है कि चीन की बढ़ती दखल भारत के लिए परेशानी का सबब बनी हुई है। अमेरिका-चीन के बीच बढ़ती तल्खी में भारत के लिए अपनी भूमिका का सही चयन करना भी बहुत महत्त्वपूर्ण होने वाला है। मोदी 3.0 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की सही रणनीतिक पोजीशन लेना भी सरकार के लिए एक चुनौती भरा काम साबित होने वाला है।