#MeToo: इस कार्यस्थल पर भी होता है महिलाओं का शोषण, लेकिन क्यों नहीं है खबरों में?
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देश में मीटू अभियान चल रहा है, जिसके तहत महिलाएं सामने आ रही हैं और खुद के साथ हुए यौन शोषण के खिलाफ आवाज उठा रही हैं। अखबार, टीवी और सोशल मीडिया हर जगह उनके द्वारा लगाए आरोपों पर खबर भी आ रही हैं। जो मामले हेडलाइन बन रहे हैं उनमें सिलेब्रिटी, पत्रकार और नेताओं पर आरोप लगे हैं।
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देश में मीटू अभियान चल रहा है, जिसके तहत महिलाएं सामने आ रही हैं और खुद के साथ हुए यौन शोषण के खिलाफ आवाज उठा रही हैं। अखबार, टीवी और सोशल मीडिया हर जगह उनके द्वारा लगाए आरोपों पर खबर भी आ रही हैं। जो मामले हेडलाइन बन रहे हैं उनमें सिलेब्रिटी, पत्रकार और नेताओं पर आरोप लगे हैं।
लेकिन उस कार्यस्थल को शायद लोग भूल गए हैं जहां यौन शोषण सबसे अधिक होता है। और उन महिलाओं में शिकायत करने की हिम्मत भी कम ही होती है। अगर शिकायत कर भी दें तो भी उन्हें न्याय कम ही मिल पाता है। अगर बात खबरों में आने की हो तो ऐसे मामले बेहद कम ही आते हैं। हम बात कर रहे हैं घरों में काम करने वाली मेड की।
निशा (बदला हुआ नाम) भी घरों में काम करती है। निशा का कहना है कि करीब 10 साल पहले उसके साथ भी शोषण हुआ। उसके पिता की उम्र के मालिक ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की। वह उसे दादाजी कहा करती थी। वह जब चाहे निशा के कमरे में आ जाता था। उस वक्त वह महज 20 साल की थी। निशा ही केवल ऐसी महिला नहीं है जिसने ये सब सहा हो बल्कि ऐसी लाखों महिलाएं हैं। जो आवाज भी नहीं उठा सकतीं।
कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम 2013 जो असंगठित क्षेत्र पर भी लागू होता है। लेकिन ये महिलाएं शिकायत नहीं करती क्योंकि इन्हें नौकरी जाने का डर रहता है। इसके अलावा ये इस कानून के बारे में भी कुछ नहीं जानतीं।
महिलाएं हो रही हैं जागरुक
गुरुग्राम के महिला कामगार संगठन की संस्थापक अंकिता यादव का कहना है कि घरेलू मजदूर शोषण के बारे में तो नहीं बोलतीं लेकिन दुष्कर्म, शोषण और बंधुआ मजदूरी के बारे में रिपोर्ट करती हैं। इस संस्थान की सदस्य 7 हजार महिलाएं हैं, जो घरों में काम करती हैं। इस संस्थान ने हाल ही में कार्यस्थल पर होने वाले यौन शोषण के बारे में बताने के लिए जागरुकता अभियान चलाना शुरू किया है।
साल 2012 में ऑक्सफेम इंडिया (एनजीओ) ने अपने सर्वे में पाया कि कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ जो यौन शोषण होता है, उसमें 29 फीसदी महिलाएं मजदूरी करने वाली होती हैं, घरों में काम करने वाली 23 फीसदी हैं और 16 फीसदी महिलाएं छोटी विनिर्माण इकाई में काम करने वाली होती हैं।