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Hindi News ›   India News ›   Maharashtra: What happened between the Marathas and the Maharas maratha clashes in Koregaon 

कोरेगांव में मराठों और महारों के बीच हुआ क्या था

Wed, 03 Jan 2018 08:12 PM IST
बीबीसी हिन्दी
बीबीसी हिन्दी Updated Wed, 03 Jan 2018 08:12 PM IST
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Maharashtra: What happened between the Marathas and the Maharas maratha clashes in Koregaon 
- फोटो : HULTON ARCHIVE

महाराष्ट्र में दलितों और मराठा समुदाय के बीच कई जगह हिंसक झड़पें होने की खबरें हैं। इन झड़पों की शुरुआत कोरेगांव भीमा, पाबल और शिकरापुर से हुई, जहां बवाल में कथित रूप से एक व्यक्ति की मौत हो गई। कोरेगांव भीमा में 1 जनवरी 1818 को पेशवा बाजीराव पर ब्रिटिश सैनिकों की जीत की 200वीं सालगिरह मनाई जा रही थी, जब ये हिंसा भड़की। इस मौके पर कई वाहन फूंके जाने की भी खबर है।

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दलित नेता ब्रिटिश फ़ौज की इस जीत का जश्न इसलिए मनाते हैं क्योंकि ऐसा माना जाता है कि जीतने वाली ईस्ट इंडिया कंपनी से जुड़ी टुकड़ी में ज़्यादातर महार समुदाय के लोग थे, जिन्हें अछूत माना जाता था। इसे कोरेगांव की लड़ाई भी कहा जाता है। जानकार बताते हैं कि पेशवा बाजीराव द्वितीय की अगुवाई में 28 हजार मराठा पुणे पर हमला करने की योजना बना रहे थे। 
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रास्ते में उन्हें 800 सैनिकों से सजी कंपनी फोर्स मिली, जो पुणे में ब्रिटिश सैनिकों की ताक़त बढ़ाने के लिए जा रही थी। पेशवा ने कोरेगांव में मौजूद कंपनी फ़ोर्स पर हमला करने के लिए अपने 2 हजार सैनिक भेजे। कप्तान फ्रांसिस स्टॉन्टन की अगुवाई में ईस्ट इंडिया कंपनी की इस टुकड़ी ने क़रीब 12 घंटे तक अपनी पोजीशन संभाले रखी और मराठों को कामयाब नहीं होने दिया। बाद में मराठों ने फैसला बदला और कदम खींच लिए।
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क्योंकि उन्हें इस बात का डर था कि जनरल जोसफ़ स्मिथ की अगुवाई में बड़ी ब्रिटिश टुकड़ी वहां पहुंच जाएगी जिससे मुकाबला आसान नहीं होगा। इस टुकड़ी में भारतीय मूल के जो फौजी थे, उनमें ज़्यादातर महार दलित थे और वो बॉम्बे नेटिव इनफ़ैंट्री से ताल्लुक रखते थे। ऐसे में दलित कार्यकर्ता इस घटना को दलित इतिहास का अहम हिस्सा मानते हैं।

मराठों को टक्कर
जेम्स ग्रांट डफ ने अपनी किताब 'ए हिस्टरी ऑफ द मराठाज' में इस लड़ाई का ज़िक्र किया है। इसमें लिखा है कि रात भर चलने के बाद नए साल की सुबह दस बजे भीमा के किनारे पहुंचे जहां उन्होंने करीब 25 हजार मराठों को रोके रखा।

वो नदी की तरफ मार्च करते रहे और पेशवा के सैनिकों को लगा कि वो पार करना चाहते हैं लेकिन जैसे ही उन्होंने गांव के आसपास का हिस्सा कब्ज़ाया, उसे पोस्ट में तब्दील कर दिया। हेनरी टी प्रिंसेप की किताब हिस्टरी ऑफ़ द पॉलिटिकल एंड मिलिट्री ट्रांजैक्शंस इन इंडिया में इस लड़ाई में महार दलितों से सजी अंग्रेज़ टुकड़ी के साहस का ज़िक्र मिलता है।

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इस किताब में लिखा है कि कप्तान स्टॉन्टन की अगुवाई में जब ये टुकड़ी पूना जा रही थी, तो उस पर हमला होने की आशंका थी। खुली जगह पर फंसने के डर से बचने के लिए इस टुकड़ी ने कोरेगांव में पहुंचकर उसे अपना किला बनाने का फैसला किया। अगर ये टुकड़ी खुले में फंस जाती तो मराठों के हाथों बुरे हालात में फंस सकती थी।

अलग-अलग इतिहासकारों के मुताबिक इस लड़ाई में 834 कंपनी फौजियों में से 275 मारे गए, घायल हुए या फिर लापता हो गए। इनमें दो अफसर भी शामिल थे। इंफ़ैंट्री के 50 लोग मारे गए और 105 जख़्मी हुए। ब्रिटिश अनुमानों के मुताबिक पेशवा के 500-600 सैनिक इस लड़ाई में मारे गए या घायल हुए।

''मराठा नहीं ब्राह्मणों के खिलाफ थी लड़ाई''

Maharashtra: What happened between the Marathas and the Maharas maratha clashes in Koregaon 
maharashtra violence

अस्मिता की लड़ाई
जो इतिहासकार महारों और पेशवा फ़ौजों के बीच हुए इस युद्ध को विदेशी आक्रांता अंग्रेज़ों के खिलाफ भारतीय शासकों के युद्ध के तौर पर देखते हैं, तथ्यात्मक रूप से वो गलत नहीं हैं। लेकिन जानकार मानते हैं कि महारों के लिए ये अँग्रेज़ की नहीं बल्कि अपनी अस्मिता की लड़ाई थी।

अंत्यजों यानी वर्णव्यवस्था से बाहर माने गए 'अस्पृश्यों' के साथ जो व्यवहार प्राचीन भारत में होता था, वही व्यवहार पेशवा शासकों ने महारों के साथ किया। इतिहासकारों ने कई जगहों पर ब्यौरे दिए हैं कि नगर में प्रवेश करते वक़्त महारों को अपनी कमर में एक झाड़ू बांध कर चलना होता था ताकि उनके 'प्रदूषित और अपवित्र' पैरों के निशान उनके पीछे घिसटने इस झाड़ू से मिटते चले जाएं।

''मराठा नहीं ब्राह्मणों के खिलाफ थी लड़ाई''

उन्हें अपने गले में एक बरतन भी लटकाना होता था ताकि वो उसमें थूक सकें और उनके थूक से कोई सवर्ण 'प्रदूषित और अपवित्र' न हो जाए। वो सवर्णों के कुएं या पोखर से पानी निकालने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे।

इतिहासकार और आलोचक प्रो. रुषिकेश काम्बले कोरेगांव भीमा का दूसरा पक्ष भी बताते हैं। उनका दावा है कि कि महारों ने मराठों को नहीं बल्कि ब्राह्मणों को हराया था। ब्राह्मणों ने छुआछूत जबरन दलितों पर थोप दिया था और वो इससे नाराज थे। जब महारो ने ब्राह्मणों से इसे खत्म करने को कहा तो वे नहीं माने और इसी वजह से वो ब्रिटिश फौज से मिल गए।

ब्रिटिश फौज ने महारों को ट्रेनिंग दी और पेशवाई के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा दी. मराठा शक्ति के नाम पर जो ब्राह्मणों की पेशवाई थी ये लड़ाई दरअसल, उनके खिलाफ थी और महारों ने उन्हें हराया। ये मराठों के खिलाफ लड़ाई तो कतई नहीं थी।

काम्बले कहते हैं कि महारों और मराठों के ख़िलाफ़ किसी तरह का मतभेद या झगड़ा था, ऐसा इतिहास में कहीं नहीं है। अगर ब्राह्मण छुआछूत ख़त्म कर देते तो शायद ये लड़ाई नहीं होती।

वो कहते हैं कि मराठों का नाम इसमें इसलिए लाया जाता है क्योंकि ब्राह्मणों ने मराठों से पेशवाई छीनी थी। ये आखिरी पेशवा ताकत थी और ब्रिटिश उन्हें हराना चाहते थे। इसीलिए ब्रितानी फौज ने महारों को साथ लिया और पेशवा राज खत्म कर दिया।

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