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महागठबंधन से भी उपेक्षित वाम मोर्चे के लिए अस्तित्व का सवाल

Sat, 16 Feb 2019 04:42 AM IST
गौरव द्विवेदी शरद गुप्ता, अमर उजाला, नई दिल्ली
शरद गुप्ता, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: गौरव द्विवेदी Updated Sat, 16 Feb 2019 04:42 AM IST
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Loksabha Election 2019: Left wants to co-operate with Congress
Left and Congress alliance

दस साल पहले 59-सांसदों वाले वाम मोर्चे ने अमेरिका के साथ सिविल न्यूक्लियर डील को लेकर मनमोहन सिंह सरकार को अस्थिर कर दिया था। लेकिन इस बीच उनकी अपनी हालत इतनी खराब हो गई कि आगामी लोकसभा चुनाव में मोर्चे को अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा।

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पिछली लोकसभा में वाम मोर्चे के 10 सदस्य थे। इनमें से 9 माकपा के सांसद थे तो एक भाकपा के। फॉरवर्ड ब्लॉक का एक भी सांसद लोकसभा नहीं पहुंच पाया था। जबकि रिवॉल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी) के एक सांसद - केरल से एन के प्रेमचंद्रन - थे जरूर लेकिन वे कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ का हिस्सा थे न कि वाम मोर्चे का।
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इस बार वाम दल कांग्रेस से तालमेल करना चाहते हैं लेकिन कांग्रेस है कि उन्हें भाव ही नहीं दे रही है। खासतौर पर पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में दोनों के गठबंधन की करारी हाल के बाद कांग्रेस अब हर राज्य में अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती है। यही वजह है कि वह वाम दलों से गठबंधन के खिलाफ है।
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माकपा ने 2014 के चुनाव में बंगाल में केवल दो सीटें जीती थीं। रायगंज से मो. सलीम जीते थे और मुर्शिदाबाद से बदरुद्दीन खान। लेकिन इस बार तृणमूल कांग्रेस बनाम भाजपा की लड़ाई में वाम दल गेहूँ में घुन की तरह पिस रहे हैं और उनका एक भी सींच जीतना मुश्किल है। यदि कहीं किसी की जीत की कोई संभावना बन रही है तो वह केवल मो. सलीम की है। सबरीमाला विवाद के चलते इस पार यही हालत केरल में भी है।

माकपा महाराष्ट्र में पालघर और डिंडोरी सीटों पर लड़ना चाहती है। दोनों जगहों पर माकपा उम्मीदवारों को सत्तर हज़ार से ज्यादा  वोट मिले थे। पालघर में उसका उम्मीदवार 47000 वोट पाने वाली कांग्रेस से आगे था जबकि डिंडोरी राकंपा के हिस्से में थी। लेकिन कांग्रेस की ओर से उसे अभी भी जवाब का इंतजार है। कांग्रेस सूत्रों का कहना है यदि उसे तालमेल करना ही होगा तो वह माकपा के बजाए बहुजन विकास अघाड़ी से करेगी जिसके उम्मीदवारों को इन दोनों क्षेत्रों में एक लाख से ज्यादा वोट मिले थे।


केवल डीएमके से उम्मीद

बिहार में भी वाम मोर्चे की हालत ढीली है।  यहां भाकपा दो सीटें और माकपा एक सीट की मांग कर रही हैं। माकपा की मांग मणिपुर और त्रिपुरा में भी एक-एक सीट लड़ने की है। लेकिन कांग्रेस की ओर से कोई रेस्पांस नहीं मिला है। माकपा को अब आखिरी आशा तमिलनाडु में डीएमके से रह गई है जो उसे तालमेल में एक सीट पर लड़ने मौका दे सकती है। 

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