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1998 से 2014: किस एग्जिट पोल ने क्या भविष्यवाणी की थी और मतदाताओं का फैसला क्या था
Sun, 19 May 2019 09:59 PM IST
अमर शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अमर शर्मा
Updated Sun, 19 May 2019 09:59 PM IST
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मतदान के लिए लगी कतार
- फोटो : अमर उजाला
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आठ राज्यों के 59 निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान खत्म होने के साथ ही रविवार को सात चरणों तक चला लोकसभा चुनाव 2019 संपन्न हुआ। अब सब की निगाहें विभिन्न टेलिविजन चैनलों के एग्जिट पोल पर टिकी हुई हैं।
एग्जिट पोल, जो कई बार अपने आकलन से अलग पाए गए हैं, उन लोगों की प्रतिक्रियाओं पर आधारित होते हैं जिन्होंने वोट डाला है। एक्जिट पोल की सर्वे करने वाला, यह मानते हुए कि मतदाताओं ने अपनी पसंद को सही ढंग से बता दिया है, चुनाव मतदान की वास्तविक गणना से पहले नतीजों की भविष्यवाणी करते हैं।
पढ़ें एक्जिट पोल 2019 लाइव
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ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं जब एग्जिट पोल आकलन से बहुत अलग पाए गए हैं। 1998 और 2014 के आम चुनावों को छोड़ दें तो कम से कम चार एग्जिट पोल ने गलत भविष्यवाणी की है।
भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार के गिर जाने के कारण 1999 में हुए चुनाव में ज्यादातर एक्जिट पोल ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की जीत के बारे में बढ़चढ़ कर भविष्य़वाणी की। उन्होंने एनडीए को 315 से अधिक सीटें दीं, लेकिन उसने असल में 296 सीटें जीतीं।
आज के एग्जिट पोल कितने सही साबित होंगे, यह तो हमें सिर्फ 23 मई को ही पता चल पाएगा। लेकिन यहां एक नजर में देखें कि 1998 के बाद से हुए चुनावों में एक्जिट पोल ने क्या भविष्यवाणी की थी और वास्तविक परिणाम क्या आए :
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एग्जिट पोल, जो कई बार अपने आकलन से अलग पाए गए हैं, उन लोगों की प्रतिक्रियाओं पर आधारित होते हैं जिन्होंने वोट डाला है। एक्जिट पोल की सर्वे करने वाला, यह मानते हुए कि मतदाताओं ने अपनी पसंद को सही ढंग से बता दिया है, चुनाव मतदान की वास्तविक गणना से पहले नतीजों की भविष्यवाणी करते हैं।
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ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं जब एग्जिट पोल आकलन से बहुत अलग पाए गए हैं। 1998 और 2014 के आम चुनावों को छोड़ दें तो कम से कम चार एग्जिट पोल ने गलत भविष्यवाणी की है।
भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार के गिर जाने के कारण 1999 में हुए चुनाव में ज्यादातर एक्जिट पोल ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की जीत के बारे में बढ़चढ़ कर भविष्य़वाणी की। उन्होंने एनडीए को 315 से अधिक सीटें दीं, लेकिन उसने असल में 296 सीटें जीतीं।
आज के एग्जिट पोल कितने सही साबित होंगे, यह तो हमें सिर्फ 23 मई को ही पता चल पाएगा। लेकिन यहां एक नजर में देखें कि 1998 के बाद से हुए चुनावों में एक्जिट पोल ने क्या भविष्यवाणी की थी और वास्तविक परिणाम क्या आए :
एक्जिट पोल के नतीजे कितने अलग निकले
पिछले पांच एक्जिट पोल के नतीजे बताते हैं कि यह सर्वे सांख्यिकी की बड़ी गलतियों के शिकार हो सकते हैं। इन सर्वे के आकलन और वास्तविक नतीजे कभी-कभार ही एक जैसे पाए जाते हैं।| 1998 | भाजपा+ | कांग्रेस+ | अन्य |
| आउटलुक/एसी नीलसन | 238 | 149 | 156 |
| डीआरएस | 249 | 155 | 139 |
| फ्रंटलाइन/सीएमएस | 235 | 155 | 182 |
| इंडिया टुडे/सीएसडीएस | 214 | 164 | 165 |
| आधिकारिक नतीजे | 252 | 166 | 119 |
| 1999 | भाजपा+ | कांग्रेस+ | अन्य |
| इंडिया टुडे/इनसाइट | 336 | 146 | 80 |
| एचटी-एसी नीलसन | 300 | 146 | 95 |
| आउटलुक/सीएमएस | 329 | 145 | 39 |
| टाइम्स पोल/डीआरएस | 332 | 138 | - |
| आधिकारिक नतीजे | 296 | 134 | 113 |
| 2004 | भाजपा+ | कांग्रेस+ | अन्य |
| आउटलुक/एमडीआरए | 290 | 169 | 99 |
| आज तक-ओआरजी मार्ग | 248 | 190 | 105 |
| एनडीटीवी/इंडियन एक्सप्रेस | 250 | 205 | 120 |
| स्टार-सी वोटर | 275 | 186 | 98 |
| आधिकारिक नतीजे | 189 | 222 | 132 |
| 2009 | भाजपा+ | कांग्रेस+ | अन्य |
| स्टार न्यूज/नीलसन | 197 | 199 | 136 |
| टाइम्स नाउ | 183 | 198 | 162 |
| एनडीटीवी | 177 | 216 | 150 |
| हेडलाइंस टुडे | 180 | 191 | 172 |
| आधिकारिक नतीजे | 159 | 262 | 79 |
| 2014 | भाजपा+ | कांग्रेस+ | अन्य |
| एबीपी/नीलसन | 281 | 97 | 165 |
| टाइम्स नाउ-ओआरजी | 249 | 148 | 146 |
| सीएनएन-आईबीएन सीएसडीएस लोकनीति | 280 | 97 | 166 |
| हेडलाइंस टुडे सीसेरो | 272 | 115 | 156 |
| चाणक्या | 340 | 70 | 133 |
| इंडिया टीवी-सी वोटर | 289 | 101 | 153 |
| एनडीटीवी | 279 | 103 | 161 |
| आधिकारिक नतीजे | 336 | 59 | 148 |
सबसे पहले कब कराया गया था एग्जिट पोल, ओपिनियन पोल से ये कितना अलग?
एग्जिट पोल
- फोटो : Amar Ujala
एग्जिट पोल
नीदरलैंड के एक समाजशास्त्री और पूर्व राजनेता मार्सेल वान डैम को इसका जनक माना जाता है और सबसे पहली बार इसे 15 फरवरी, 1967 में कराया गया था। यह ओपिनियन पोल से अलग होता है। जब मतदाता अपने मत का प्रयोग कर चुका होता है तो उससे यह पूछा जाता है कि उसने अपना मत किसे दिया। इस आधार पर किए गए सर्वे से जो व्यापक नतीजे निकलकर सामने आते हैं उनके आधार पर इसके परिणामों को तैयार किया जाता है। चूंकि यह एक निश्चित संख्या किया जाता है, इसलिए अनुमान हर समय सही साबित नहीं होता।ओपिनियन पोल
इस सर्वे का जनक जॉर्ज गैलप और क्लॉड रोबिंसन को माना जाता है। सबसे पहले अमेरिका में चुनावी सर्वे कराया गया था। इससे प्रभावित होकर इंग्लैंड और फ्रांस ने इसे अपनाया। इंग्लैंड में इसका प्रयोग 1937 में किया गया वहीं फ्रांस ने इसे 1938 में अपनाया। ओपिनियन पोल के परिणामों के लिए चुनाव के लिहाज से प्रमुख मसलों पर जनता के मन की बात जानने की कोशिश की जाती है। जनता किस बात से नाराज और किस बात से संतुष्ट है इन सभी को आधार बनाते हुए अनुमान लगाया जाता है कि किस दल और किस नेता को वो आगे चुनने वाली है। मतदाताओं से पूछा जाता है कि वो किसे अपना मत देने का मन बना रहे हैं।भारत में चुनावी सर्वे की दस्तक
भारत में चुनावी सर्वे का जनक भारतीय जनमत संस्थान (इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक ओपिनियन) के प्रमुख एरिक डी कोस्टा को माना जाता है। भारत में चुनाव के दौरान इस प्रकार के सर्वे से जनता के रुख को जानने का काम सबसे पहले इन्होंने ही किया था। भारत में जब इसका चलन बढ़ा तो सबसे पहले इसे पत्रिकाओं के माध्यम से प्रकाशित किया गया। टेलीविजन पर इसने अपनी दस्तक 1998 में दी जब एक राष्ट्रीय समाचार चैनल ने इस संबंध में एक कार्यक्रम का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में चुनावी विशेषज्ञ और मनोवैज्ञानिकों को बुलाया गया था।चुनावी सर्वे के नियम
चुनाव आयोग द्वारा 1999 में एक आदेश जारी कर ओपिनियन पोल और एग्जिट पोल पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इसके बाद एक समाचार पत्र ने इसका विरोध किया और कोर्ट में चुनौती दे दी। इसके बाद कोर्ट ने इस पर लगे प्रतिबंध को हटा लिया था। 2009 में भी इसके विरोध में आवाज उठी थी जिसके बाद कानून मंत्रालय ने जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 में संशोधन किया था। इसके बाद यह नियम लागू किया गया कि जब तक चुनावी प्रक्रिया का अंतिम वोट न डल जाए किसी भी चुनावी सर्वे को न तो दिखाया जा सकता है और न ही प्रकाशित किया जा सकता है।एक एग्जिट पोल पर आता है तीन से पांच करोड़ का खर्च, ये है पूरी प्रक्रिया
पोलिंग पार्टियां
- फोटो : अमर उजाला
प्रत्येक एग्जिट पोल पर तीन करोड़ का खर्च
एग्जिट पोल पर खर्च सीधे-सीधे सैंपल साइज पर निर्भर होता है। जितना बड़ा सैंपल साइज होगा, उतना ही खर्च बढ़ जाएगा। एग्जिट पोल को कराने वाली एजेंसियों के मुताबिक अगर सैंपल साइज 60 हजार लोगों का है तो फिर इस पर तीन करोड़ का खर्च आएगा।वहीं एक लाख के सैंपल साइज पर पांच करोड़ रुपये का खर्चा आएगा। एक सैंपल साइज पर करीब पांच सौ रुपये आता है। कर्मचारियों को केवल प्रोजेक्ट के बेसिस पर रखा जाता है। कोई भी कंपनी इनको मासिक वेतन पर नहीं रखती है।