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मायावती लौटीं 2007 के फॉर्मूले पर, ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट बंटवारे में तरजीह
Mon, 04 Mar 2019 07:06 PM IST
Prabudhh Jain
अमर उजाला, चुनाव डेस्क, नई दिल्ली
अमर उजाला, चुनाव डेस्क, नई दिल्ली
Published by: Prabudhh Jain
Updated Mon, 04 Mar 2019 07:06 PM IST
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मायावती
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बसपा अध्यक्ष मायावती एक बार फिर अपनी 'सोशल इंजीनियरिंग' थ्योरी को आजमाने का मन बना रही हैं। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो बसपा ने आने वाले लोकसभा चुनाव के लिए 25 फीसदी टिकट, ब्राह्मणों को दिए हैं। जबकि अभी तक जितने भी प्रभारी बसपा ने नियुक्त किए हैं उसमें सबसे ज्यादा संख्या ब्राह्मणों की ही है।
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बसपा ने दूसरी पार्टियों की तुलना में ब्राह्मणों को ज्यादा सीटें दी हैं, जिससे न सिर्फ भाजपा को कमजोर किया जा सके बल्कि कांग्रेस के खाते में वोट जाने से बचाया जा सके। कुछ सीटों को छोड़कर बसपा लगभग सभी सीटों पर अपने उम्मीदवारों का चयन कर चुकी है। बसपा एक बार फिर 2007 विधानसभा चुनाव परिणाम दोहराने के मूड में है।
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माना जा रहा है कि अनुसूचित जाति-मुसलमानों के अलावा सपा के साथ आने से ओबीसी वोट भी बसपा के खाते में जाएगा। वहीं ब्राह्मणों को टिकट देने से बसपा को लगता है कि उसे भाजपा और कांग्रेस पर बढ़त हासिल हो सकेगी।
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बसपा आठ ब्राह्मणों को लोकसभा का टिकट देने जा रही है, जिसमें पूर्वी उत्तर प्रदेश से 6 नाम करीब-करीब तय हो चुके हैं। राकेश पांडे (अंबेडकर नगर), नकुल दुबे (सीतापुर), कुशल तिवारी (खलीलाबाद), संतोष तिवारी (कैसरगंज), रंगनाथ मिश्रा (भदोही), अशोक तिवारी (प्रतापगढ़)।
सतीश चंद्र मिश्रा की भूमिका
बसपा में सतीश चंद्र मिश्रा को कर्मठ ब्राह्मण चेहरे के तौर पर देखा जाता है। मिश्रा अभी राज्यसभा सांसद हैं और वह 2007 से ही बसपा के लिए ब्राह्मण-अनुसूचित जाति के वोट को दोबारा एकजुट करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। 2007 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा के ब्राह्मण-अनुसूचित जाति वाली सोशल इंजीनियरिंग ने मायावती को मुख्यमंत्री बनाया था। बसपा को तब 403 विधानसभा सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश में 206 सीटों पर जीत मिली थी। वहीं सपा को 97, भाजपा को 51 और कांग्रेस को 22 सीटें मिली थीं।