13 पॉइंट रोस्टर : भाजपा को एक बार फिर सता रहा नोटा का डर
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अदालत द्वारा विश्वविद्यालयों में नियुक्तियों के मामले में दिए गए 13 पॉइंट रोस्टर सिस्टम फैसले को खत्म करने के लिए कैबिनेट ने गुरुवार को अध्यादेश पर मंजूरी दे दी। लेकिन इसी के साथ उसके इस फैसले के राजनीतिक नफा-नुकसान को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है।
पार्टी के ही कुछ नेता मानते हैं कि अगर पहले की तरह सरकार के इस फैसले के खिलाफ भी सवर्ण समाज ने कड़ा रुख अपनाया, तो उसे मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव की तरह लोकसभा चुनाव में इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।
पार्टी के एक नेता के मुताबिक, केंद्र सरकार ने इस फैसले पर पहले न झुकने का फैसला किया था। लेकिन पांच मार्च को दलित संगठनों, छात्र संगठनों और कुछ राजनीतिक दलों के द्वारा बुलाए गए भारत बंद के असर को भांपते हुए सरकार ने इस फैसले पर अपना रुख बदलने का निर्णय लिया।
सरकार को अंदेशा था कि लोकसभा चुनाव के ठीक पहले अगर यह मांग जोर पकड़ती है तो उसे इसका नुकसान हो सकता है। खासकर उत्तर भारत में इस मामले पर गहरी नाराजगी सामने आ सकती है।
दस फीसदी आरक्षण से थमेगा सवर्णों का गुस्सा
जानकारी के मुताबिक, भाजपा ने 13 पॉइंट रोस्टर को खत्म करने के लिए अध्यादेश लाने के पहले इस पर खूब मंथन किया है। पार्टी को लगता है कि उसने हाल ही में गरीब सवर्णों को दस फीसदी आरक्षण देने का जो फैसला लिया है, उससे सवर्ण समाज अब उसका विरोध नहीं करेगा।
इसी के साथ, पाकिस्तान पर वायुसेना द्वारा किए गए हमले के बाद उपजी भावनाओं के कारण भी अब सवर्ण समाज उसका विरोध नहीं करेगा।
जातीय समीकरण अहम
भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश और बिहार में बड़ी सफलता हासिल की थी। उत्तर प्रदेश में उसे 80 में से 73 सीटों पर सफलता मिली थी, जबकि बिहार की 22 सीटों पर भी उसने कामयाबी हासिल की थी। पार्टी का मानना है कि उसे यह कामयाबी उसी स्थिति में मिली थी जब उसे समाज के हर वर्ग से अच्छा समर्थन हासिल हुआ।
2019 में भी 2014 के चुनाव की सफलता को दुहराने की सोच रही भाजपा इस वक्त किसी भी वर्ग को अपने से दूर जाने का संदेश नहीं देना चाहती। यही कारण है कि सरकार ने बहुत आत्ममंथन के बाद 13 पॉइंट रोस्टर को खत्म करने का फैसला लिया।
मध्य प्रदेश में नोटा के कारण गई सरकार
हाल ही में संपन्न हुए पांच विधानसभा राज्यों के चुनावों में भाजपा को नोटा के कारण भारी नुकसान उठाना पड़ा था। आंकड़ों से स्पष्ट हुआ था कि पार्टी अलग-अलग सीटों पर कुल दो हजार वोटों के अंतर से लगभग ग्यारह सीटों पर जीत हासिल करने में नाकाम रही। इन सभी सीटों पर नोटा को पड़े वोटों की संख्या जीत के अंतर से अधिक थी।
इन नोटा वोटों को सीधे भाजपा के वोटों के नुकसान के रुप में देखा गया था क्योंकि सवर्ण समाज ने उसका बहिष्कार करने का फैसला किया था। इसी कारण शिवराज सिंह चौहान मध्य प्रदेश में चौथी बार सरकार बनाने का सपना पूरा नहीं कर पाए।