युद्धों के बाद ऐसा रहा है 'वोटिंग ट्रेंड', एयर स्ट्राइक और भारत-पाक तनाव का चुनाव पर कितना होगा असर?
- भारत और पाकिस्तान के बीच तीन बार हो चुके हैं युद्ध, माहौल का भी पड़ा है असर
- पुलवामा हमले के बाद भारतीय वायु सेना की एयर स्ट्राइक की चहुंओर हुई है सराहना
- राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि भारत-पाक तनाव का असर चुनाव पर भी पड़ेगा
- विपक्ष सरकार की कार्रवाई पर सवाल उठा रहा है, जबकि भाजपा दे रही है जवाब
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विस्तार
पुलवामा आतंकी हमले के बाद भारत की ओर से की गई जवाबी कार्रवाई के बाद देश में सुरक्षा, जम्मू कश्मीर, भारत-पाक तनाव जैसे मुद्दे अहम हो चले हैं। सत्तारूढ़ पार्टियों की रैलियों में इसी मुद्दे पर नेताओं के स्वर तेज हो रहे हैं तो दूसरी ओर विपक्षी पार्टियां भी इन्हीं मुद्दों पर सरकार को घेरती नजर आ रही है। सुरक्षा का यह मुद्दा विशुद्ध रूप से राजनीतिक बन गया है।
आतंकवाद और देश की सुरक्षा जैसे मुद्दों के आगे चुनाव या विकास के अन्य मुद्दे लगभग दूसरी कतार में चले गए हैं। कल तक किसानों की समस्या, बेरोजगारी, न्यूनतम आमदनी की गारंटी जैसे मुद्दों पर बात करने वाली कांग्रेस भी इसी मुद्दे पर बात कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्षी पार्टियां अपनी गलतबयानियों और आरोपों से भाजपा को पॉजिटिव मौका दे दे रही है।
फिलहाल साफ दिख रहा है कि भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़े तनाव के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता बढ़ी है। भाजपा के कुछ नेताओं ने तो इस मुद्दे को वोट बैंक में भुनाने तक की बात कह डाली है। ऐसा माना जा रहा है कि हाल की घटनाओं के बाद भारत-पाक तनाव पर बने माहौल का बड़ा असर पड़ेगा। यह असर भाजपा के कितना पक्ष में होगा और विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार को कितना घेर पाएगी, इन सवालों का जवाब भविष्य के गर्भ में है।
दोनों देशों के बाजार पर भी पड़ा बड़ा असर
पुलवामा हमले के बाद शेयर बाजार पर भी बड़ा असर पड़ा था। न केवल भारत बल्कि पाकिस्तान में भी शेयर बाजार तेजी से नीचे गिरा था। भारत-पाक सीमा पर तनाव बढ़ने के बाद दोनों देशों के बीच व्यापार ठप हो गया था। भारत द्वारा मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा छीनने के बाद 200 फीसदी ड्यूटी बढ़ा दी गई थी। इसका पाकिस्तान पर देशव्यापी असर देखने को मिला था। विशेषज्ञ बताते हैं कि युद्ध जैसे हालात बनने पर कंपनियों को उनका पैसा डूबने की आशंका होती है, इसलिए कंपनियों ने अपना पैसा निकालने की तैयारी शुरू कर दी थी। इस बीच अभिनंदन की वापसी के बीच स्थितियां संभली और शेयर बाजार 196 अंक चढ़ गया।
तीन बार हुआ भारत-पाक युद्ध, चुनाव पर पड़ा ऐसा असर
भारत और पाकिस्तान के बीच अब तक तीन बार युद्ध हुआ है। साल 1965 में, फिर 1971 में और फिर 1999 में। तीनों बार युद्ध का असर उसके बाद हुए आम चुनावों पर भी पड़ा। युद्धों के परिणाम का असर चुनाव के परिणामों पर भी देखने को मिला है। तीनों युद्धों में सिर्फ 1999 करगिल युद्ध के परिणाम थोड़ा अलग रहा था।
1965 चुनाव के बाद घटी थी कांग्रेस की सीटें
1965 में आजादी के बाद भारत-पाक के बीच पहला युद्ध था, जब वायु सेनाओं ने भी एक-दूसरे का मुकाबला किया। पांच महीने तक चलने वाले इस युद्ध में दोनों पक्षों के हजारों सैनिक मारे गये। इस युद्ध का अंत संयुक्त राष्ट्र के द्वारा युद्ध विराम की घोषणा के साथ हुआ और ताशकंद में दोनों देशों के बीच समझौता हुआ। इस युद्ध के दो साल बाद 1967 में देश में आम चुनाव हुए थे। चुनाव से पहले कांग्रेस के पास 361 सीटें थी। चुनाव के बाद ये सीटें घटकर 283 हो गई।
1971 युद्ध के बाद इंदिरा गांधी को मिला था लाभ
1971 भारत-पाक युद्ध में पाकिस्तान को बड़ी हार का सामना करना पड़ा था। 16 दिसंबर को भारतीय सेना ने पाकिस्तान के हजारों सैनिकों को घुटने के बल खड़ा कर दिया था। हार चुका पाकिस्तान सरेंडर कर चुका था और पूर्वी पाकिस्तान आजाद होकर बांग्लादेश के रूप में नया देश बना। इस युद्ध में मिली जीत ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी आयरन लेडी के नाम से प्रसिद्ध हुईं। इस युद्ध के आठ महीने बाद देश में आम चुनाव हुए और इंदिरा गांधी की सत्ता में जोरदार वापसी हुई।
करगिल युद्ध का रहा था मिला जुला असर
करगिल युद्ध मई से जुलाई 1999 तक चला। ऑपरेशन विजय के नाम से जाने जानेवाले इस युद्ध में सेना की शहादतों के बाद देश की जीत हुई थी, लेकिन इसका परिणाम चुनाव पर व्यापक तौर पर देखने को नहीं मिला। भाजपा की सीटों में इजाफा देखने को नहीं मिला था। 1999 में करगिल युद्ध के ठीक बाद हुए लोकसभा चुनावों में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा को 182 सीटें ही मिलीं, हालांकि वोट में 1.84 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई। वहीं उत्तर प्रदेश, पंजाब जैसे राज्यों में भाजपा की सीटें 50 फीसदी तक कम हो गई थी। कुल मिलाकर करगिल युद्ध के परिणाम का लोकसभा चुनाव परिणामों पर मिला जुला असर रहा।
राजनीतिक विश्लेषकों का क्या है अनुमान
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्षी पार्टियां अपनी गलतबयानियों और आरोपों से भाजपा को पॉजिटिव मौका दे दे रही है। दिल्ली विश्वविद्यालय के दयाल सिंह कॉलेज में राजनीति शास्त्र के शिक्षक और पॉलिटिकल एक्टिविस्ट डॉ सुनील का कहना है कि सरकार ने इस बार बजट में शानदार घोषणाएं की है। किसानों, मजदूरों, मिडिल क्लास हर वर्ग को राहत दी। पिछले पांच साल में काम भी किए। भाजपा इन दिनों अपने विकास कार्यों को भी ठीक से नहीं गिना पा रही है, बल्कि संवेदनाओं से भरे इस देश में भाजपा उसके लिए भी मुद्दा अहम हो गया है।
मुद्दा लंबा खिंचा तो विपक्ष को ही होगी दिक्कत
हाल के दिनों की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियां हो, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की जनसभा हो, अन्य सार्वजनिक कार्यक्र्म हो या फिर पार्टी की कोई प्रेस कांफ्रेंस, हर जगह पाकिस्तान पर कूटनीति, आतंकवाद पर प्रहार, एयर स्ट्राइक का जिक्र छेड़ा जा रहा है। विपक्षी पार्टियों के नेता एयर स्ट्राइक के सबूत मांग रहे हैं तो भाजपा विरोधियों पर और ज्यादा आक्रामक होती दिख रही है।
पीजीडीएवी कॉलेज में राजनीति शास्त्र के शिक्षक डॉ अभिषेक श्रीवास्तव ने कहा कि हमें अपनी संस्थाओं पर विश्वास रखना चाहिए। इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए थी। हालांकि सरकार की भी जिम्मेदारी बनती है कि सवाल उठे तो उनका जवाब देना चाहिए। डॉ सुनील भी उनकी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं कि अगर यह मुद्दा लंबा खिंचता है, तो निस्संदेह भाजपा के पक्ष में माहौल बनेगा और विपक्ष को दिक्कत हो सकती है।