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कुरुक्षेत्र: किसान आंदोलन से सियासी नुकसान का बढ़ा दबाव, इसलिए बदले-बदले से अब सरकार नजर आते हैं...

Vinod Agnihotri विनोद अग्निहोत्री
Updated Thu, 31 Dec 2020 02:58 PM IST

सार

गणित की दृष्टि से कहा जा सकता है कि 50 फीसदी मांगों पर रजामंदी हो गई है, लेकिन अगर मांगों के वजन के हिसाब से देखा जाए तो असली और पेचीदा मांगें कृषि कानूनों की वापसी और न्यूनतम समर्थन मूल्य के बाध्यकारी होने की कानूनी गारंटी हैं जिन पर आगे बात होनी है...
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किसानों के साथ पीयूष गोयल और नरेंद्र सिंह तोमर
किसानों के साथ पीयूष गोयल और नरेंद्र सिंह तोमर - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार

किसानों के साथ होने वाली बातचीत से पहले भले ही केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने यह कहकर कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी न किसी दबाव में और न किसी प्रभाव में काम करते हैं, सरकार के दृढ़ इरादों का संकेत दिया था। साथ ही साफ किया था कि सरकार उन तीनों कृषि कानूनों को वापस नहीं लेगी जिन पर आंदोलनकारी किसानों को एतराज है। लेकिन बुधवार को किसानों के साथ हुई छठे दौर की बातचीत के बाद ऐसा लगा कि दोनों के बीच जमी बर्फ कुछ पिघली है। क्योंकि सरकार के मुताबिक किसानों की प्रमुख चार मांगों में से दो मांगों पर सहमति बन गई और शेष दो मांगों पर सहमति बनाने के लिए चार जनवरी को सातवें दौर की बातचीत होगी।
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हालांकि गणित की दृष्टि से कहा जा सकता है कि 50 फीसदी मांगों पर रजामंदी हो गई है, लेकिन अगर मांगों के वजन के हिसाब से देखा जाए तो असली और पेचीदा मांगें कृषि कानूनों की वापसी और न्यूनतम समर्थन मूल्य के बाध्यकारी होने की कानूनी गारंटी हैं जिन पर आगे बात होनी है। इसलिए कायदे से अभी आधा रास्ता पार होना तो दूर वहां तक पहुंचे भी नहीं है, फिर भी उम्मीद की जानी चाहिए कि जब चल पड़े हैं और कोई रुकावट नहीं आई तो मंजिल तक पहुंच भी जाएंगे।


छठे दौर की बातचीत में एक सकारात्मक संकेत भले ही वह प्रतीकात्मक क्यों न हो लेकिन महत्वपूर्ण यह रहा कि बातचीत में शामिल सरकार के तीनों मंत्री कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, वाणिज्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री पीयूष गोयल और वाणिज्य राज्य मंत्री सोम प्रकाश ने किसानों के साथ उनके लंगर में जाकर भोजन किया। इससे पिछली वार्ताओं में अलग-अलग भोजन करने से पैदा होने वाली तल्खी भी दूर हुई। दूसरी तरफ रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने किसानों को खालिस्तानी या नक्सली कहने वालों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि किसान अन्नदाता हैं और उन्हें खालिस्तानी या नक्सली कहना पूरी तरह गलत है। एक तरह से रक्षा मंत्री ने किसानों के उन घावों पर मरहम लगाने की कोशिश की है जो पिछले दिनों भाजपा के कुछ नेताओं और भाजपा शासित राज्यों के मंत्रियों के बयानों से पैदा हो गए थे, जिनमें आंदोलनकारी किसानों को तमाम अनर्गल विशेषणों से नवाजा गया था।

सरकार के रुख में यह बदलाव और नरमी की वजह क्या है, यह एक सवाल है। दरअसल शुरू में किसान आंदोलन की उपेक्षा और फिर बाद में उसे रोकने और बदनाम करने की कोशिशों में विफलता के बाद अब सरकार दबाव में है। एक तरफ किसान आंदोलन में बिखराव और टूट के कोई आसार दूर-दूर तक नहीं दिख रहे हैं तो दूसरी तरफ दिल्ली की सीमाओं पर हो रहे इस शांतिपूर्ण किसान आंदोलन की आंच अब दूसरे प्रदेशों में भी पहुंचने लगी है।

पंजाब-हरियाणा तो पहले से ही आंदोलित हैं, पटना में राजभवन की ओर मार्च करते किसानों पर लाठीचार्ज, महाराष्ट्र में किसानों के धरने, तमिलनाडु, कर्नाटक, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश से किसान असंतोष की खबरें, दिल्ली धरने में पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के किसानों की खासी संख्या के साथ-साथ अन्य कई राज्यों के किसान संगठनों के प्रतिनिधियों की बढ़ती शिरकत और कनाडा, इंग्लैंड, अमेरिका, आस्ट्रेलिया आदि देशों में किसानों के आंदोलन को मिलने वाले समर्थन से सरकार का सिरदर्द बढ़ गया है। लगातार जिस तरह एमएसपी को इस आंदोलन का केंद्रीय मुद्दा बना दिया है उसने देश के उन तमाम राज्यों, जहां मंडी व्यवस्था और एपीएमसी कानून प्रभावशाली तरीके से लागू न होने के कारण किसानों को एमएसपी का लाभ नहीं मिल रहा है, उनमें भी एमएसपी पाने की ललक बढ़ने लगी है।

यह सब देखकर विपक्षी दलों ने भी सरकार पर अपना दबाव बढ़ा दिया है। पहले संयुक्त विपक्ष ने मिलकर राष्ट्रपति को किसानों के समर्थन में ज्ञापन दिया। फिर संयुक्त बयान में किसानों की तीनों कृषि कानून वापस लेने की मांग का समर्थन किया और फिर करीब दो करोड़ हस्ताक्षर वाला ज्ञापन लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी राष्ट्रपति से मिले। एनसीपी नेता शरद पवार ने किसान आंदोलन के समर्थन में संयुक्त विपक्ष के सीधे सड़क पर उतरने की जरूरत बताकर मामले को गरमा दिया।

दूसरी तरफ तीन कृषि कानूनों के विरोध में जारी किसानों के आंदोलन को लेकर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के भीतर भी खासा मंथन भी है। उपरोक्त कारणों से पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारियों से लेकर केंद्रीय मंत्री, सांसद और भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री और मंत्री और विधायकों के माथे पर इस आंदोलन को लेकर चिंता की लकीरें भी साफ देखी जा सकती हैं। किसान आंदोलन की आंच पार्टी के नेता भी महसूस करने लगे हैं।

एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और उपभोक्ता मामलों के मंत्री पीयूष गोयल लगातार किसानों को नए कानूनों के फायद बताते हुए इन्हें सत्तर सालों से तबाह हो रही कृषि और किसानों के उत्थान के लिए एतिहासिक सुधार करार दे रहे हैं, वहीं इससे थोड़ा अलग रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का कहना है कि इन कानूनों को प्रयोग के तौर पर साल दो साल चलने दिया जाए और अगर ये किसानों के लिए कल्याणकारी साबित होते हैं तो जारी रहने दिया जाए वरना इनमें किसानों के हित में जरूरी बदलाव किए जा सकते हैं। राजनाथ सिंह के बयान से यह संकेत मिलता है कि सरकार और भाजपा के भीतर भी किसान आंदोलन के लंबा खिंचते जाने से एक चिंता जरूर व्याप्त होने लगी है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के भाजपा के एक सांसद का कहना है कि जिस तरह किसानों का जमावड़ा दिल्ली की सीमाओं पर जमा है उससे गांवों में भी अब किसान कानूनों को लेकर चर्चा शुरू हो गई है और लोग उन पर दबाव डालने लगे हैं कि वो किसानों के पक्ष में क्यों नहीं खुलकर आते। पूर्व केंद्रीय मंत्री और हरियाणा में भाजपा नेता वीरेंद्र सिंह ने खुलकर किसान आंदोलन के समर्थन में बयान देकर भाजपा नेताओं की मुश्किल और बढ़ा दी है।

इसी तरह हरियाणा के निर्दलीय विधायक ने राज्य सरकार से अपना समर्थन वापस लेकर भी दबाव बढ़ाया है और राजस्थान के सांसद बेनीवाल ने एनडीए से नाता तोड़कर भाजपा नेताओं खासकर सांसदों और विधायकों के सामने मुश्किल बढ़ा दी है। उत्तर प्रदेश में भाजपा विधायक अवतार सिंह भड़ाना ने भी किसानों के समर्थन की घोषणा की है। अपनी पार्टी के भीतर बढ़ रहे दबाव को देखते हुए भाजपा के शीर्ष नेताओं ने अब आंदोलन को लेकर अपना स्वतंत्र फीडबैक लेना शुरू कर दिया है।

अमर उजाला से बातचीत करते हुए एक शीर्ष भाजपा नेता ने माना कि आंदोलन को शुरू में ही अगर समझकर किसानों से बातचीत की जाती तो बात यहां तक नहीं पहुंचती। इस बड़े नेता ने यह भी स्वीकार किया कि पार्टी के कुछ जिम्मेदार नेताओं और मंत्रियों और राज्यों के मुख्यमंत्री और मंत्रियों के किसान आंदोलन को लेकर दिए गए भड़काऊ बयानों ने भी किसानों को नाराज किया है। इससे भी स्थिति बिगड़ी है। इस नेता के मुताबिक पार्टी नेतृत्व ने अब ऐसे अनर्गल बयान न देने के निर्देश दे दिए हैं।

अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री रहे भाजपा के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक खेती-किसानी भारत में सिर्फ जीवन यापन का जरिया ही नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक संस्कृति है। यह भारतीयता की बुनियाद है। इसलिए इसमें इतने बड़े बदलाव करने से पहले सरकार को देशभर में एक अनुकूल वातावरण बनाना चाहिए था। सरकार यहां चूक गई और जिस तरह कोरोना काल में पहले अध्यादेश और फिर बहुमत के बल पर संसद में जिस तरह इन कानूनों को पारित कराया गया उससे माहौल बिगड़ा।

भारतीय जनता पार्टी से जुड़े और जाने-माने किसान नेता व कृषि विशेषज्ञ डा. कृष्णवीर चौधरी भी मानते हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी एक बड़ा मुद्दा है क्योंकि यह किसान हितों की सुरक्षा का कवच है। हालांकि चौधरी कहते हैं कि सरकार लगातार यह कह रही है कि एमएसपी जारी रहेगा, तब किसान आंदोलन का हठ समझ में नहीं आता है। उधर कई किसान नेता और संगठन विशेष रूप से जो उत्तर प्रदेश जुड़े हैं, निजी स्तर पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से मिलकर उनसे दखल देने की मांग भी कर रहे हैं।

लेकिन राजनाथ सिंह फिलहाल इस पूरे मामले में सरकार के साथ हैं और उनकी कोशिश है कि किसान नेता किसी सर्वमान्य समझौते पर सहमत हो जाएं। कुल मिलाकर भाजपा और केंद्र सरकार ने किसान आंदोलन के सियासी नफे नुकसान का हिसाब लगाना भी शुरु कर दिया है और सरकार का बदलता हुआ नरम रुख इसका संकेत है।
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