फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   kurukshetra: Economic crisis may increase the political challenge of the government, states have not received GST payment for a year

कुरुक्षेत्रः आर्थिक संकट से बढ़ सकती है सरकार की राजनीतिक चुनौती, राज्यों को सालभर से नहीं मिला जीएसटी का भुगतान

Vinod Agnihotri विनोद अग्निहोत्री
Updated Thu, 10 Sep 2020 07:43 PM IST
सार

आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि असंगठित क्षेत्र का आकलन मिलाने के बाद विकास दर की गिरावट शून्य से -40 फीसदी तक नीचे जा सकती है। इस आधार पर कई जानी-मानी रेटिंग एजेसिंयों का अनुमान है कर वित्तीय वर्ष 2020-21 की वार्षिक विकास दर की अनुमानित गिरावट शून्य से -10 से 15 फीसदी तक नीचे जाने की आशंका है...

विज्ञापन
kurukshetra: Economic crisis may increase the political challenge of the government, states have not received GST payment for a year
gdp down - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

कोरोना काल का सबसे बड़ा आर्थिक दुष्प्रभाव अब देश के सामने है। जब सरकार के आपने आकलन के मुताबिक इस वर्ष अप्रैल से जून के तिमाही के दौरान भारत की आर्थिक विकास दर घट कर शून्य से भी नीचे करीब -24 फीसदी तक चली गई। वह तब जबकि इसमें असंगठित क्षेत्र का आकलन अभी शामिल नहीं है। जाने-माने आर्थिक विशेषज्ञ अरुण कुमार का कहना है कि असंगठित क्षेत्र का आकलन मिलाने के बाद विकास दर की गिरावट शून्य से -40 फीसदी तक नीचे जा सकती है। इस आधार पर कई जानी-मानी रेटिंग एजेसिंयों का अनुमान है कर वित्तीय वर्ष 2020-21 की वार्षिक विकास दर की अनुमानित गिरावट शून्य से -10 से 15 फीसदी तक नीचे जाने की आशंका है।

विज्ञापन


आर्थिक विकास दर की यह गिरावट केंद्र सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती हो सकती है। इससे सरकार के सामने आर्थिक और राजनीतिक चुनौती दोनों बढ़ सकती हैं। लेकिन प्रधानमंत्री के मुख्य आर्थिक सलाहकार और कुछ अन्य अर्थशास्त्री इससे सहमत नहीं हैं । उनका दावा है कि अर्थव्यवस्था में गिरावट जितनी हो सकती थी, हो चुकी है, अब वी शेप उछाल होगा। यानी चिंता की कोई बात नहीं है। लेकिन कई स्वतंत्र अर्थशास्त्री इस आशावादी तस्वीर को लेकर आशंकित हैं। फिलहाल आर्थिक विकास दर में आई इस कदर की गिरावट ने सरकार और देश के उद्योग जगत को चिंतित कर दिया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कोरोना को दैवीय आपदा बताकर इस गिरावट के लिए जिम्मेदार बताया है। जबकि विपक्ष का आरोप है कि सरकार की खराब आर्थिक नीतियों और कोरोना संकट से निबटने में नाकामी का नतीजा यह आर्थिक संकट है।
विज्ञापन


कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी रोज दो-तीन ट्वीट करके सरकार की आर्थिक नीतियों को लेकर हमले कर रहे हैं। राहुल ने अब सोशल मीडिया पर अपने तीन से चार मिनट के वीडिया डालकर भी आर्थिक संकट को लेकर निशाना साधना शुरू कर दिया है। उधर राज्यों विशेषकर गैर-भाजपा शासित राज्यों ने अपने हिस्से के जीएसटी के बकाए के भुगतान के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। इस मामले में सबसे ज्यादा मुखर पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलौत और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


इन सभी मुख्यमंत्रियों का कहना है कि जीएसटी के दायरे में आने के बाद राज्यों के अपने वित्तीय स्रोत बेहद सीमित हो गए हैं और उनकी जीएसटी में अपने अंशदान पर निभर्रता बढ़ गई है। जबकि केंद्र सरकार ने पिछले एक साल से राज्यों के हिस्से का जीएसटी का भुगतान नहीं किया है जिसकी वजह से राज्यों के सामने गंभीर वित्तीय संकट पैदा हो गया है। दिल्ली के उप मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री मनीष सिसौदिया ने साफ कहा है कि अगर केंद्र ने राज्यों के बकाए जीएसटी का भुगतान नहीं किया तो दिल्ली सरकार के पास अपने कर्मचारियों को वेतन देने के पैसे नहीं बचेंगे। लगभग यही स्वर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का भी है।

आर्थिक संकट तो सभी राज्यों के सामने है क्योंकि जीएसटी के बकाए का भुगतान किसी को नहीं हुआ है। लेकिन भाजपा और सहयोगी दलों के मुख्यमंत्री चुपचाप सहन करने को मजबूर हैं, जबकि गैर-भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री न सिर्फ मुखर हैं बल्कि इसे केंद्र के खिलाफ एक राजनीतिक मुद्दा भी बना रहे हैं। इस आर्थिक गिरावट के नतीजे बाजार में मंदी, उद्योगों की बंदी और बेरोजगारी के रूप में सामने आ रही है।

हालांकि विपक्ष का यह भी कहना है कि अर्थव्यवस्था की यह गिरावट महज कोरोना के कारण ही नहीं है। कोरोना से पहले ही लगातार आर्थिक विकास दर में गिरावट दर्ज हो रही थी और इसी साल जनवरी-मार्च तक के तिमाही में यह घट कर 3.2 फीसदी तक पहुंच गई थी। लेकिन अनियोजित लॉकडाउन और कोरोनो से निबटने में सरकार की असफलता ने इस गिरावट को तेज कर दिया और जी-20 देशों में सबसे ज्यादा जीडीपी की गिरावट भारत में दर्ज हुई। विपक्ष और अनेक अर्थशास्त्रियों के मुताबिक इस गिरावट की मूल वजह नवंबर 2016 में बिना सोचे समझे की गई नोटबंदी और उसके कुछ महीनों के बाद ही बेहद ही गलत तरीके से लागू किया गया जीएसटी है।

राहुल गांधी लगातार पिछले एक साल से नोटबंदी, जीएसटी और फरवरी 2020 से कोरोना को लेकर सरकार पर हमले कर रहे हैं और चेता रहे हैं। लेकिन शुरू में सरकार ने उनकी बातों को मजाक में उड़ा दिया और जनता ने भी इसे महज राजनीतिक बयानबाजी समझा। केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद और प्रकाश जावड़ेकर ने विपक्ष के आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए कहा है कि कोरोना संकट के बावजूद जिस तरह मोदी सरकार ने देश को संभाला है, उससे जल्दी ही भारत आर्थिक विकास की अपनी पुरानी रफ्तार पर लौट आएगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी भारत अमेरिकी औद्योगिक फोरम को संबोधित करते हुए विदेशी निवेशकों को यह भरोसा दिलाया कि भारत में बिजनेस सेंटीमेंट बेहद सकारात्मक है और यहां निवेश करना लाभदायक है। प्रधानमंत्री मोदी ने चीन के साथ तनातनी के माहौल में आत्मनिर्भर भारत का नारा देकर भी उद्योग जगत को हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने का संदेश देकर आर्थिक गतिविधियों को तेज करने का आह्वान किया है। साथ ही रक्षा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश की अधिकतम सीमा 24 फीसदी से बढ़ाकर 74 फीसदी कर दी गई है। भारत रक्षा क्षेत्र में एक बड़ा बाजार है और सरकार को उम्मीद है कि इससे रक्षा क्षेत्र में विदेशी निवेश बढ़ेगा जो अर्थव्यवस्था के लिए ऑक्सीजन का काम करेगा।

हालाकि दुनिया में कोरोना को लेकर जनवरी से ही कई देशों ने मोर्चा बंदी करनी शुरू कर दी थी। लेकिन भारत में कोरोना का पहला मामला 30 जनवरी को केरल में सामने आया। उसके बाद मार्च के पहले सप्ताह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने होली मिलन न मनाने की घोषणा करके सामाजिक दूरी बनाने की अपील की, लेकिन देश में मार्च के तीसरे सप्ताह में केंद्र सरकार को कोरोना का खतरा सिर पर मंडराता दिखा और 24 मार्च 2020 को पूरे देश में 21 दिन का लॉकडाउन घोषित कर दिया गया। सारे देश की आर्थिक गतिविधियां औद्योगिक इकाईयां ठप हो गईं। छोटी बड़ी फैक्ट्रियों से लेकर विशाल कारखाने, रेल सेवा, हवाई सेवा, सड़क परिवहन सेवा, होटल उद्योग, बाजार, मॉल, रेस्त्रा, पर्यटन, सिनेमा, सरकारी दफ्तर, स्कूल, कॉलेज, सारे संस्थान सब बंद हो गए। पूरा देश घरों में कैद हो गया। लॉकडाउन ने संगठित और असंगठित दोनों ही क्षेत्रों को प्रभावित किया।

बीमारी से ज्यादा काम-धंधे और पेट भरने की फिक्र ने लाखों करोड़ों दिहाड़ी मजदूरों, फैक्ट्री श्रमिकों, निर्माण मजदूरों, रिक्शा वालों, ठेले वालों, खोमचे वालों और रोज कमाने खाने वालों को शहरों को छोड़कर अपने पैतृक गावों की ओर जाने को मजबूर कर दिया। आजाद के बाद देश में यह अब तक का सबसे बड़ा पलायन था, जिसमें परिवार के परिवार अपना सामान समेट कर पैदल, साईकिल पर, रिक्शे पर जैसे भी जो साधन मिला अपने गावों की ओर चल पड़े। हालात ये बन गए कि केंद्र और राज्य सरकारों को कई दिन तक समझ ही नहीं आया कि इस समस्या से कैसे निबटें। इससे एक तरफ लॉकडाउन की सार्थकता खत्म हो गई तो दूसरी तरफ कोरोना संक्रमण के फैलने के खतरे के साथ साथ शहरों और गांवों दोनों की ही अर्थव्यवस्था चरमरा उठी।

लेकिन लॉकडाउन सिर्फ 21 दिन तक ही सीमित नहीं रहा। इसे तीन बार और बढ़ाया गया। नतीजा महीनों देश पूरी तरह ठप रहा और अभी तक अब जबकि अनलॉक का चौथा चरण शुरू हो गया है, आर्थिक गतिविधियों की गाड़ी पटरी पर नहीं आ सकी हैं। धीरे-धीरे बाजार खुल रहे हैं। सीमित स्तर पर फैक्ट्रियों में काम शुरू हुआ है। वर्क फ्राम होम के जरिए कंपनियों ने भी काम शुरू कर रखा है। बड़े कारखाने भी शुरू हुए हैं। लेकिन सबसे बड़ी समस्या है कि बाजार में मांग की बेहद कमी है जिसकी वजह से उत्पादन प्रभावित हो रहा है और बिक्री न होने से पूरा आर्थिक चक्र असंतुलित हो गया है।

कोविड-19 को लेकर हुए लॉकडाउन शुरू होते ही अर्थव्यवस्था को राहत देने के लिए सरकार पर आर्थिक पैकेज देने का दबाव बढ़ गया और केंद्र सरकार ने 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज का एलान भी किया। खुद यह एलान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को संबोधित करते हुए किया और बाद में विस्तार से वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लगातार तीन दिनों तक संवाददाता सम्मेलन करके इस पैकेज के तमाम बिंदुओं की जानकारी दी। इस पैकेज को लेकर भी अर्थशास्त्रियों और विपक्ष ने सरकार पर सवाल दागे और कहा कि इस पैकेज में नया कुछ भी नहीं है सिर्फ बजट में किए गए आवंटन को ही पैकेज के रूप में पेश कर दिया गया है।

लेकिन इस पैकेज में कृषि क्षेत्र में कई सुधारों की घोषणा भी हुई जिसके तहत किसानों को देशभर में कहीं भी अपनी उपज बेचने की आजादी, न्यूनतम समर्थन मूल्य और आवश्यक वस्तु अधिनियम के दायरे से कई कृषि उपजों को बाहर करने जैसी घोषणाएं शामिल थीं। लेकिन वित्त मंत्री की घोषणाओं को लेकर सबसे बड़ी आपत्ति यह की गई कि इनमें दीर्घकालीन रणनीति तो है लेकिन अर्थव्यवस्था को जो तत्काल राहत चाहिए वह नहीं है। जबकि सरकार ने लगातार दावा किया कि उसके इस लंबे-चौड़े आर्थिक पैकेज से देश की अर्थव्यवस्था संभलेगी और उद्योगों व आर्थिक गतिविधियों को राहत मिलेगी।

इस पैकेज का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा था लघु एवं मध्यम उद्योगों के लिए बिना कोलेट्रल कर्ज लेने के लिए तीन लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा की धनराशि बैंको को उपलब्ध कराना। इसका सरकार ने जोरशोर से प्रचार भी किया। लेकिन इस घोषणा का लघु एवं मध्यम औद्योगिक इकाईयों को उतना खास फायदा नहीं हुआ जितनी उम्मीद और दावे किए जा रहे थे। क्योंकि ज्यादातर इकाईयों के सामने संकट बाजार में नकदी के कम होने से मांग घटने का था और नया कर्ज लेकर कोई मझोला उद्योगपति इस मंदी के दौर में कर्ज के नए मकड़जाल में फंसना नहीं चाहता था।

इसकी बजाय लघु एवं मझोले उद्योग की मांग है कि सरकार बैंकों से लिए गए कर्ज की ब्याज दरों और किश्तों में राहत दे साथ ही दोबारा खड़े होने के लिए दीर्घकालीन ब्याज मुक्त ऋण की सुविधा उपलब्ध कराए। इसके अलावा छोटे एवं मझोले उद्योग संघ ने सरकार से मांग की कि विभिन्न सरकारी विभागों और सार्वजनिक उपक्रमों पर उनका करीब पांच लाख करोड़ रुपया बकाया है, अगर उसका ही भुगतान कर दिया जाए तो खासी राहत मिल जाएगी। लेकिन ये दोनों मांगे सरकार ने नहीं मानीं और भारतीय अर्थव्यवस्था का एक मजबूत पाया छोटे एवं मझोले उद्योग आर्थिक संकट में फंसे हुए हैं, जिसकी वजह से बेरोजगारी का संकट भी बढ़ गया है।

कांग्रेस नेता मोहन प्रकाश ने जापान, अमेरिका, इटली, फ्रांस, ब्रिटेन, नीदरलैंड, कनाडा, इंडोनेशिया, थाईलैंड, दक्षिण कोरिया, मलेशिया, हांगकांग और सिंगापुर में कोरोना काल में जनता को दिए गए आर्थिक पैकजों का विस्तार से जिक्र करते हुए कहा कि इनकी तुलना में भारत में लोगों को सीधे कोई राहत नहीं दी गई। जिससे आम जनता की कमर टूट गई और बाजार में मांग गिरने से औद्योगिक उत्पादन भी घटा और पहले से ही नीचे जा रही अर्थव्यवस्था धड़ाम से नीचे चली गई। आर्थिक गिरावट के इस पूरे दौर में अगर कहीं से कोई आशाभरी खबर है तो वह कृषि क्षेत्र से आई है जहां विकास दर करीब साढ़े तीन फीसदी सकारात्मक है और उसमें वृद्धि हुई। इसकी वजह अच्छा मानसून और लॉकडाउन का ग्रामीण और कृषि क्षेत्र में न्यूनतम असर होना है। इसके साथ ही राज्य सरकारों ने गावों में शहरों से पहुंचे मजदूरों को रोजगार मुहैया कराने के लिए मनरेगा का विस्तार किया उससे भी गावों में पैसा पहुंचा और उसका फायदा भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिला।

जाने-माने कृषि विशेषज्ञ अजयवीर जाखड़ कहते हैं कि कृषि अर्थव्यवस्था की विकास दर में उछाल का सही मायनों में श्रेय एक्ट ऑफ ग़ॉड है। क्योंकि मानसून अच्छा हुआ इसकी वजह से कृषि उत्पादन बढ़ा और विकास दर भी बढ़ी। जाखड़ मानते हैं कि इसमें कुछ योगदान मनरेगा और किसानों को दिए जाने वाली सम्मान राशि का भी हो सकता है लेकिन वह इतना नहीं है कि उसकी वजह से विकास दर में उछाल आए। आर्थिक विकास दर की यह गिरावट जहां देश की आर्थिक गतिविधियों के लिए संकट का संकेत है, वहीं इससे सरकार का राजनीतिक संकट भी बढ़ सकता है। हालाकि तमाम गुटों और समूहों में बिखरा विपक्ष फिलहाल सरकार के लिए कोई राजनीतिक चुनौती पेश नहीं कर पा रहा है, लेकिन अगर आर्थिक संकट समय रहते नहीं संभाला गया और बेरोजगारी इसी तरह चुनौती बनी रही तो विपक्ष को सरकार के खिलाफ गोलबंद होने का मौका मिल सकता है।

14 सितंबर से होने वाले संसद के मानसून सत्र में विपक्ष एकजुट होकर आर्थिक संकट के इस मुद्दे को उठायएगा और इसके बाद अक्टूबर में होने वाले बिहार विधानसभा चुनावों और फिर अगले साल मार्च-अप्रैल में प.बंगाल विधानसभा के चुनावों में भी केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा के लिए गिरती अर्थव्यवस्था एक चुनौती बन सकती है। इसके साथ ही सीमा पर जिस तरह चीन के साथ तनाव चल रहा है, अगर दुर्भाग्य से दोनों देशों के बीच युद्ध की नौबत आ गई, तो आथिर्क संकट और बढ़ सकता है। आर्थिक संकट जितना बढ़ेगा उतना ही सामजिक संकट भी बढ़ेगा। बेरोजगारी और काम-धंधा चौपट होने की स्थिति में अपराध बढ़ सकते हैं और सामाजिक तनाव और संघर्ष भी बढ़ सकता है। इसलिए सरकार को समय रहते अर्थव्यवस्था में जान डालने के कुछ जरूरी और सार्थक उपाय करने होंगे, जिससे देश का आर्थिक सामाजिक और राजनीतिक संकट हल हो सके।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed