जानिए क्या है वो विवाद जिसमें जल रहा महाराष्ट्र, क्यों मनाया जाता है अंग्रेजों की जीत का जश्न?

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 02 Jan 2018 07:09 PM IST
Know about real story of koregaon caste violence in maharashtra
विज्ञापन
ख़बर सुनें
महाराष्ट्र के पुणे से शुरू हुआ जातीय हिंसा का दौर अब मुंबई और कई अन्य शहरों तक पहुंच चुका है। जगह-जगह पथराव और आगजनी का दौर जारी है। मंगवार को मुंबई के उपनगरों चेंबूर, कुर्ला, मुलुंड और ठाणे के अलावा हड़पसर और फुरसुंगी में पथराव और आगजनी की कई घटनाएं हुईं।
विज्ञापन


यह भी पढ़ेंः  भाजपा-संघ की फासीवादी नीति का नतीजा है महाराष्ट्र में भड़की जातीय हिंसाः राहुल गांधी


कई जगह दुकानों और ऑफिसों को आग के हवाले कर दिया गया। चेंबूर और कुर्ला में एंबुलेंस पर भी पथराव की खबर सामने आई है। हालात बिगड़ते देख खुद राज्य के सीएम आगे और मामले में न्यायिक जांच के अलावा मृतक के परिजन को दस लाख रुपये मुआवजा देने की घोषणा की है।

मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद राज्य का प्रशसनिक अमला भी हरकत में आ गया है और राज्य के बाकी हिस्सों में सख्ती बरतने की कवायद शुरू कर दी है। मामले में अब विपक्षी दल भी कूद पड़े हैं, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस घटना को लेकर राज्य की भाजपा सरकार पर निशाना साधा है।

राहुल ने ट्वीट करते हुए कहा कि- आरएसएस भाजपा का एक केंद्रीय स्तंभ लगातार भारत के लिए एक फासीवादी नजरिया रखता है जिसमें दलितों को हमेशा निचले पायदान पर रखा जाए। राहुल ने गुजरात के उना, रोहित वेमुला कांड को भीमा कोरेगांव कांड से जोड़ते हुए कहा कि- यह उन्हीं प्रतिरोधों के प्रतीक हैं।

वहीं एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार ने मामले में उच्चस्तरीय जांच की वकालत की है। ऐसे में जानना जरूरी है कि ये सारा विवाद है क्या और क्यों अचानक महाराष्ट्र प्रतिशोध की ज्वाला में धधकने लगा है। 

200 साल पुराने युद्ध को लेकर मचा है बवाल

महाराष्ट्र के पुणे में यह सारा विवाद अंग्रेजों और पेशवाओं के बीच हुए युद्ध के 200 साल पूरे होने को लेकर हुआ है। जिसमें एक जनवरी 1818 में अंग्रेजों ने दलितों की सहायता से पेशवा द्वितीय को शिकस्त दे दी थी। पुणे के कोरेगांव के जय स्तंभ पर हर साल यह उत्सव मनाया जाता है।

दलित इसे शौर्य दिवस के तौर पर मनाते हैं, और मराठाओं की ओर से हर साल इसका छुटपुट विरोध होता रहा है। लेकिन इस साल युद्ध के 200 साल पूरे होने पर दलितों की ओर से इस बार भव्य आयोजन किया जा रहा था जिसमें 5 लाख से ज्यादा लोगों के जुटने की बात की जा रही है।

वैसे कार्यक्रम का मुख्य आयोजन सोमवार को रिपब्लिक पार्टी ऑफ इंडिया (अठावले) की ओर से किया गया था। यही कारण है कि आयोजन में भाजपा सांसद अमर साबले, सिद्धार्थ डेंडे और महाराष्ट्र के खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्री गिरीश बापट सहित दर्जनभर नेता शामिल हुए थे।

बताया जा रहा है कि भीम कोरेगांव में सोमवार को आयोजन के दौरान नजदीक के कई गावों के मराठाओं ने इसका विरोध किया, जिसके बाद हिंसा भड़क उठी। देखते ही देखते यह विवाद कोरेगांव से निकलकर मुंबई और अहमदनगर तक पहुंच गया। जहां दलित और मराठा संगठन आमने सामने आ गए हैं। इसके चलते एक व्यक्ति की भी मौत हो गई। 

क्यों मनाया जाता है शौर्य दिवस

असल में एक जनवरी सन 1818 में कोरेगांव में भीमा नदी के तट पर पेशवाओं और अंग्रेजों के बीच युद्ध हुआ था। जिसमें अंग्रेजों की छोटी सी टुकड़ी ने 2800 सैनिकों वाले पेशवाओं को शिकस्त दे दी थी।

खास बात ये है कि यह देश का इकलौता युद्ध है जिसमें अंगेजों की जीत का जश्न मनाया जाता है और उसकी वजह है अंग्रेजों की ओर से लड़ने वाले महार सैनिक। कहा जाता है कि अंग्रेजों की सेना में उस समय ज्यादातर दलित ही थे जिन्होंने पेशवाओं को मात दे दी और इसी का हर साल स्‍थानीय दलित जश्न मनाते हैं।

दलितों के अनुसार मात्र 800 महारों ने पेशवाओं की शक्तिशाली सेना को मात्र 12 घंटे में परास्त कर दिया था। उस समय अंग्रेजों की टुकड़ी का नेतृत्व फ्रांसिस स्टौण्टन ने किया था जबकि पेशवाओं की ओर से ग्वालियर के सिंधिया, इंदौर के होल्कर, बड़ौदा के गायकवाड़ और नागपुर के भोसले एक साथ मिलकर लड़ रहे थे।

उस समय पेशवाओं की कुल सेना 28000 के करीब थी जिसमें 20 हजार घुड़सवार और 8 हजार पैदल सैनिक थे। लेकिन इनमें से 2800 सैनिकों ने ही अंग्रेजों के‌ खिलाफ युद्ध किया और मात खा बैठे। एक अनुमान के अनुसार इस युद्ध में पेशवा के 500-600 सैनिक मारे गए और बाकी भाग खड़े हुए।

कहा जाता है कि पेशवाओं के अत्याचारों से तंग आकर ही दलितों ने अंग्रेजी सेना का दामन थामा था और युद्ध में पेशवाओं के छक्के छुड़ा दिए। इस जीत के उपलक्ष्य में ही हर साल कोरेगांव में शौर्य दिवस का जश्न मनाया जाता है। इस युद्ध को देश में सदियों तक होते रहे दलितों के दमन के प्रतिशोध के रूप में भी देखा जाता है, जो पेशवाओं ने लंबे समय तक उन पर किए।

सोमवार को एक जनवरी में इसी उपलक्ष्य में भव्य आयोजन किया गया था, जिसमें गुजरात के नवनिर्वाचित दलित विधायक जिग्नेश मेवानी, रोहित वेमुला की मां और कई अन्य दलित नेताओं को आना था।
विज्ञापन

आपकी राय हमारे लिए महत्वपूर्ण है। खबरों को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।

खबर में दी गई जानकारी और सूचना से आप संतुष्ट हैं?
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन

प्रिय पाठक

कृपया अमर उजाला प्लस के अनुभव को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।
डेली पॉडकास्ट सुनने के लिए सब्सक्राइब करें

क्लिप सुनें

00:00
00:00