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कर्नाटक: वैज्ञानिकों की नायाब खोज, फूंक मारते ही पता चलेगा कैंसर है या नहीं

Fri, 16 Feb 2018 09:15 PM IST
परीक्षित निर्भय, अमर उजाला, बंगलूरू 
परीक्षित निर्भय, अमर उजाला, बंगलूरू  Updated Fri, 16 Feb 2018 09:15 PM IST
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karnataka Scientists made machine for cancer and diabetes

कर्नाटक के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी फोटोन मशीन बनाई है जिसमें फूंक मारते ही दो मिनट में कैंसर का पता चल सकता है। मुंह के कैंसर के अलावा महिलाओं में होने वाले गर्भाशय कैंसर, मधुमेह और तनाव के बारे में यह मशीन जानकारी देती है। 

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राज्य के तीन अस्पतालों में मशीन की जांच भी की जा चुकी है। 200 से ज्यादा मरीजों की बीमारी के बारे में मशीन ने प्रारंभिक स्टेज पर ही बता दिया। इस मशीन का बंगलूरू में चल रहे फॉर्मा सम्मेलन में प्रदर्शन किया गया है। 
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हाल ही में बजट में सरकार ने दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना आयुष्मान भारत की घोषणा की थी। साथ ही कहा था कि सरकार 2022 तक डेढ़ लाख हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर स्थापित करेगी। इन सेंटर पर दांतों से लेकर कैंसर तक की जांच की जाएगी। यहां पांच तरह का कैंसर और हाइपरटेंशन जैसी गंभीर बीमारियों का उपचार किया जाएगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि उनकी ये मशीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल को कम समय और लागत में सफल बना सकता है।
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थूक में मौजूद तत्वों से चलता है पता
कर्नाटक के मणिपाल एकेडमी ऑफ हायर एजूकेशन के परमाणु और आणविक भौतिकी विभागाध्यक्ष डॉ. संतोष चिंदांगिल ने बताया कि इंसान के सलाइवा (थूक) में 500 से भी ज्यादा प्रोटीनयुक्त तत्व मौजूद होते हैं। उनकी फोटोन मशीन इन्हीं तत्वों की रीडिंग करते हुए अंकों के आधार पर बीमारी की मौजूदगी या गैरमौजूदगी की पुष्टि करती है।

उन्होंने बताया कि कैंसर, मधुमेह, तनाव जैसी बीमारियों की पहचान थूक की जांच से बहुत ही आसानी से की जा सकती है। इसकी विश्वसनीयता अन्य चिकित्सीय जांच मशीनों से ज्यादा होती है।

ऐसे काम करती है मशीन

karnataka Scientists made machine for cancer and diabetes

इस पूरे मशीन का आधार है लेजर तकनीक। वैज्ञानिकों ने मेक इन इंडिया को ध्यान में रखते हुए लेजर की जगह पर एलईडी बल्ब का इस्तेमाल किया है। एक बार सलाइवा लेने या फूंक मारने के बाद तत्व एक पाइप के जरिए मशीन में लगे एलईडी के सामने पहुंचते हैं।

यहां करीब एक मिनट तक जांच के बाद सॉफ्टवेयर पर रिजल्ट एक ग्राफ के जरिए दिखाई देने लगता है। ये सॉफ्टवेयर भी विशेष तौर पर मशीन के लिए बनाया गया है। दावा है कि इस मशीन को बनाने में महज 2 लाख रुपये का खर्चा आया है और आकार में छोटी होने से इसे कहीं भी रखा जा सकता है।

तीन साल में पूरा हुआ शोध
वैज्ञानिकों ने बताया कि तीन वर्ष पहले शोध को शुरू किया था। उस वक्त देश में कैंसर जैसी बीमारियों की स्थिति ज्यादा और सुविधाएं कम थीं। वर्ष 2014 से 2017 के बीच वैज्ञानिकों ने कई देशों और विज्ञान के मॉडल को फॉलो करते हुए फोटोन मशीन को नया अवतरण दिया है।

कर्नाटक सरकार देगी तोहफा
मशीन का ट्रॉयल किया जा चुका है। हालांकि कुछ बदलाव होने के बाद इसे मान्यता के लिए राज्य सरकार के समक्ष पेश किया जाएगा। बताया जा रहा है कि कर्नाटक सरकार इस मशीन को तोहफे के रूप में प्रधानमंत्री को देने वाली है। इसलिए सरकार का इस पर फोकस ज्यादा है। अंतिम मंजूरी के लिए जल्द मशीन को दिल्ली भेजा जाएगा।

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