Karnataka Election 2023: इस बार आसान नहीं है BJP के लिए सत्ता की राह! इन मुद्दों पर घिरी हुई है कर्नाटक सरकार
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विस्तार
कर्नाटक में विधानसभा चुनावों की तारीखों के एलान के साथ ही सियासी हलचल तेज हो गई है। भाजपा से लेकर कांग्रेस और जेडीएस से लेकर आम आदमी पार्टी और बसपा समेत कई राजनीतिक दलों ने कर्नाटक में सत्ता पाने का अपना रोड प्लान तैयार कर लिया है। जो सत्ता पर काबिज भाजपा के लिए बड़ी चुनौती है। दरअसल भाजपा के लिए यह चुनौती राज्य में उन मुद्दों के साथ खड़ी हो गई है, जिसे लेकर लगातार न सिर्फ विवाद होते रहे बल्कि आंदोलन भी किए गए। इसके अलावा बीते चार दशक से कर्नाटक में सत्ता न रिपीट होने का भी एक रिवाज चला रहा है। भाजपा के नेताओं के मुताबिक कर्नाटक में सत्ता बदलने का रिवाज इस बार भाजपा तोड़ने जा रही है।
एंटी इनकम्बेंसी का असर कर्नाटक में
कर्नाटक की 224 विधानसभा सीटों पर 10 मई को चुनाव होने हैं। 2018 के विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें भाजपा को मिलीं, लेकिन वह बहुमत साबित नहीं कर सकी। नतीजतन दूसरे नंबर की बड़ी पार्टी कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर कर्नाटक में सरकार बना ली। हालांकि कुछ समय बाद ऐसी उथल-पुथल मची और भाजपा ने कर्नाटक की सत्ता पर कब्जा जमा लिया। अब एक बार फिर सियासी रण में कर्नाटक की तीन बड़ी पार्टियां भाजपा, कांग्रेस और जेडीएस सत्ता की लड़ाई में अपने सभी मोहरे सेट कर चुकी हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार कर्नाटक में लड़ाई सत्ता पक्ष के लिए बहुत कठिन मानी जा रही है। इसके पीछे का कारण बताते हुए राजनीतिक जानकार कहते हैं कि एंटी इनकम्बेंसी का असर कर्नाटक में दिख रहा है। राजनैतिक विश्लेषक एस किरन कहते हैं कि कर्नाटक के कई ऐसे मुद्दे जो स्थानीय स्तर के थे, लेकिन उनका निपटारा नहीं किया जा सका। नतीजा हुआ कि बीते कई समय से लगातार ऐसे मुद्दों को लेकर लोग आंदोलन करते रहे। इसके अलावा 1985 से कर्नाटक में हर पांच साल बाद होने वाले चुनावों में सत्ता पक्ष की वापसी नहीं हुई।
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एस किरन कहते हैं कि वैसे तो भाजपा कांग्रेस और जेडीएस अपने-अपने अलग सियासी एजेंडों के साथ चुनावी मैदान में हैं। लेकिन राज्य में एक बड़ा मुद्दा बेलागावी सीमा का विवाद है। यह विवाद बीते कुछ समय से लगातार मुसीबत बना हुआ है। वह कहते हैं कि सिर्फ सीमा विवाद ही नहीं, बल्कि मुस्लिम आरक्षण को खत्म किए जाने के बाद दलितों के आरक्षण को जिस तरह चार हिस्सों में बांट दिया गया, उससे बंजारा समुदाय समेत कई अन्य समुदाय भी सत्ता पक्ष के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। इसके अलावा काफी समय से चल रहा महाराष्ट्र और कर्नाटक का सीमा विवाद अभी तक नहीं सुलझा है। जो लोग कर्नाटक में महाराष्ट्र के बॉर्डर पर रहते हैं उनके लिए कई तरह की समस्याएं लगातार बनी हुई हैं। राजनैतिक विश्लेषक एस किरण का मानना है कि यह वह मुद्दे हैं जो चुनाव की दशा दिशा तय करते हैं।
भ्रष्टाचार को लेकर सरकार पर हमला
कर्नाटक में इन मुद्दों के अलावा भ्रष्टाचार का भी एक बड़ा मुद्दा सत्ता के गलियारों से लेकर सड़क तक गूंज रहा है। कर्नाटक के स्टेट कांट्रेक्टर एसोसिएशन ने राज्य सरकार पर बड़े भ्रष्टाचार का आरोप भी लगाया है। एसोसिएशन ने कर्नाटक की सरकार से नाराज होकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखी और राज्य में दिए जाने वाले ठेकों में भ्रष्टाचार का आरोप लगाया। सिर्फ कांट्रेक्टर एसोसिएशन ने ही नहीं बल्कि विपक्षी दलों ने भी सरकार के कई मंत्रियों पर आरोप लगाते हुए मोटे कमीशन की बात कही और सड़क से लेकर सदन तक हंगामा किया। इसके अलावा कर्नाटक में स्कूलों के एससिएशन से जुड़े लोगों ने भी भ्रष्टाचार को लेकर सरकार पर हमला बोला है। कर्नाटक की राजनीति को करीब से समझने वाले सियासी जानकारों का मानना है कि यहां पर किसानों की स्थिति को लेकर नाराजगी है। दक्षिण कर्नाटक में बारिश ना होने से किसान परेशान हैं। हालांकि वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक सुदर्शन कहते हैं केंद्र सरकार ने किसानों के लिए बजट में बड़ा प्रावधान किया है। बावजूद इसके यह मुद्दा आने वाले विधानसभा के चुनावों में बड़े जोर शोर से उठाया जाने वाला है।
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कर्नाटक कांग्रेस लगातार भाजपा पर सांप्रदायिक माहौल खराब करने का आरोप लगाती रही है। कर्नाटक कांग्रेस से जुड़े नेता और पूर्व विधायक एसवाई राज कहते हैं कि कर्नाटक में भाजपा जानबूझकर सांप्रदायिकता का मुद्दा गर्म किए रहती है। इसमें नकाब, टीपू सुल्तान, मंदिर मस्जिद, हलाल मीट समेत मुसलमानों की दुकानों जैसे तमाम मुद्दे साल भर छाए रहते हैं। हालांकि भाजपा का कहना है कांग्रेस जिसे मुद्दा बता रही है, दरअसल वह कानून व्यवस्था से जुड़े हुए मसले रहे हैं। भाजपा से जुड़े नेताओं का कहना है कि कर्नाटक में जिस तरीके से डबल इंजन की सरकार ने मिलकर यहां की समस्याओं को दूर किया है वह अब तक किसी सरकार ने किया ही नहीं था। यही वजह है कि भाजपा से जुड़े नेताओं का कहना है कि कर्नाटक की जनता एक बार फिर से मोदी पर भरोसा जताएगी। कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई इस बार 2018 की तुलना से बहुत ज्यादा सीटें लाकर पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने का दावा कर रहे हैं।