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ONOE: जेपीसी ने आर्थिक विशेषज्ञों से की बात, अध्यक्ष बोले- एक देश, एक चुनाव से GDP को होगा 1.5 फीसदी लाभ

Wed, 24 Sep 2025 11:00 PM IST
बशु जैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: बशु जैन Updated Wed, 24 Sep 2025 11:00 PM IST
सार

एक देश-एक चुनाव संसदीय समिति ने 16वें वित्त आयोग के अध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया, अर्थशास्त्री डॉ. सुरजीत भल्ला और योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया के विचार सुने। भाजपा सांसद चौधरी ने कहा कि देश में लगभग हर साल चुनाव होते हैं। अगर लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होते हैं तो इससे धन की बचत होगी।

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JPC talked to economic experts, Chairman said - One country, one election will give 1.5 percent benefit to GDP
पीपी चौधरी - फोटो : ANI

विस्तार

एक देश-एक चुनाव विधेयक की जांच कर रही संसदीय समिति (जेपीसी) ने बुधवार को आर्थिक विशेषज्ञों से बात की। विशेषज्ञों ने समिति को विधेयक को लेकर अहम सुझाव दिए। समिति अध्यक्ष और सांसद पीपी चौधरी ने कहा कि एक देश-एक चुनाव से जीडीपी को 1.5 फीसदी या लगभग सात लाख करोड़ रुपये तक का लाभ होगा।
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समिति ने 16वें वित्त आयोग के अध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया, अर्थशास्त्री डॉ. सुरजीत भल्ला और योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया के विचार सुने। भाजपा सांसद चौधरी ने कहा कि देश में लगभग हर साल चुनाव होते हैं। अगर लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होते हैं तो इससे धन की बचत होगी। हमने आज आर्थिक विशेषज्ञों को बुलाया।  उन्होंने कहा कि पीएम मोदी का दृष्टिकोण है कि धन का उपयोग विकास के लिए किया जाना चाहिए। यह चर्चा का विषय है। अभी कुछ भी अंतिम नहीं है। अगली बैठक अक्तूबर के अंत तक हो सकती है।
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सूत्रों के मुताबिक समिति के सामने अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने चुनाव का एक ऐसा मॉडल प्रस्तावित किया है जिसमें सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव लोकसभा चुनावों के लगभग ढाई साल बाद एक साथ कराए जाएं। ताकि चुनावों की आवृत्ति कम हो, लेकिन फिर भी जवाबदेही सुनिश्चित हो और जनादेश की जांच हो।
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वहीं मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने कहा कि राष्ट्रीय और राज्य चुनाव अलग-अलग समय पर होने चाहिए क्योंकि दोनों चुनावों के मुद्दे अलग-अलग होते हैं। जबकि अरविंद पनगढ़िया ने कहा कि पांच साल की चुनावी अवधि में कुल 13 दौर के चुनाव होते हैं और देश में औसतन हर 4.5 महीने में कहीं न कहीं एक चुनाव होता है।

उन्होंने कहा कि संविधान निर्माताओं ने 1957 के आम चुनाव एक साथ कराने के लिए राज्य विधानसभाओं को समय से पहले भंग करने का विकल्प चुना था। अगर उनको यह अनुमान होता कि देश एक दिन खुद को चुनावों के एक सतत चक्र में पाएगा तो उन्होंने 129वें संविधान संशोधन विधेयक में उल्लिखित चुनाव प्रणाली के समान ही एक चुनाव प्रणाली का विकल्प चुना होता।

सूत्रों के मुताबिक 16वें वित्त आयोग के अध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने बताया कि वित्त आयोग भी 2024 के आम चुनाव और उसके बाद होने वाले राज्य चुनावों से प्रभावित हुआ है। इसके चलते परामर्श प्रक्रिया में देरी हुई। आचार संहिता के बार-बार लागू होने से नीति निर्माण में बाधा आती है। खरीद और परियोजनाओं के क्रियान्वयन में देरी होती है, और सरकारों के लिए प्रभावी सुधारों की अवधि कम हो जाती है। उन्होंने कहा कि वहीं पांच साल में एक बार होने वाला चुनाव मॉडल राज्य और केंद्र दोनों सरकारों के लिए एक लंबा और स्पष्ट नीतिगत क्षितिज प्रदान करता है, जिससे अनिश्चितता कम होती है और स्थिरता पैदा होती है। जो निजी पूंजी निर्माण को प्रोत्साहित करती है।

उन्होंने बताया कि चुनावों से पहले सरकारी खर्च में वृद्धि से राजकोषीय घाटा बढ़ता है क्योंकि सरकार अल्पकालिक विकास को बढ़ावा देने के लिए राजकोषीय खर्च बढ़ाती है। जब चुनाव एक साथ होते हैं तो केंद्र सरकार की सब्सिडी राज्य के खर्च का स्थान ले सकती है। अगर चुनाव मौजूदा ढांचे में होते हैं तो राज्य की सब्सिडी को केंद्र सरकार की सब्सिडी का पूरक होना होगा, जिससे सब्सिडी पर कुल खर्च बढ़ जाएगा।


सुरजीत भल्ला ने बताया कि दो दशकों से भी अधिक समय में सभी लोकसभा चुनाव अपनी पूरी अवधि तक चले हैं। हर पांच साल में लोकसभा चुनाव होना कोई समस्या नहीं है। मगर बार-बार होने वाले राज्य चुनाव चिंता का विषय हैं। आदर्श आचार संहिता (एमसीसी) का लागू होना भी राज्य चुनावों के लिए ज़्यादा मायने रखता है, लेकिन केंद्र के लिए उतना नहीं, क्योंकि लोकसभा चुनावों की आवृत्ति और संरचना निश्चित होती है। उन्होंने माना कि चुनावों की वास्तविक लागत में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। हालांकि, चुनावों की अमूर्त और अप्रत्यक्ष लागत चिंता का विषय है। 

 
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