{"_id":"589582f24f1c1b953fe81b59","slug":"jat-s-displeasure-bjp-will-do-much","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"उप्र में क्या जाटों की नाराजगी बीजेपी को पड़ने वाली है भारी? ","category":{"title":"India News","title_hn":"भारत","slug":"india-news"}}
उप्र में क्या जाटों की नाराजगी बीजेपी को पड़ने वाली है भारी?
शरद गुप्ता वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
Updated Sat, 04 Feb 2017 01:05 PM IST
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शुक्रवार को जहाँ राहुल गाँधी और अखिलेश यादव का आगरा में जबरदस्त रोड शो हुआ। वहीं मेरठ में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने अपनी पदयात्रा रद्द कर दी। अब सबकी निगाहें शनिवार को मेरठ में होने वाली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली पर हैं। उत्तर प्रदेश में पहले चरण के मतदान से सिर्फ एक सप्ताह पहले होने वाली इस रैली से चुनाव की दिशा का अनुमान लग सकता है।
2012 में हुए दंगों के बाद से इस क्षेत्र में मुद्दे गौण हो गए हैं, जातियां और धर्म प्रमुख हो गए हैं। लोकसभा चुनाव में बीजेपी की अपार सफलता के पीछे बड़ा कारण यही था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की पहले चरण की 71 सीटों पर फिलहाल तिकोना मुकाबला है।
सपा और कांग्रेस के गठबंधन से सियासी समीकरण एकदम बदल गए हैं। गठबंधन हर जगह लड़ता हुआ दिखाई दे रहा है, हालांकि यह इलाका न तो सपा और न ही कांग्रेस का गढ़ रहा है। त्रिकोण के बाकी दो कोने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) हैं।
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2012 में हुए दंगों के बाद से इस क्षेत्र में मुद्दे गौण हो गए हैं, जातियां और धर्म प्रमुख हो गए हैं। लोकसभा चुनाव में बीजेपी की अपार सफलता के पीछे बड़ा कारण यही था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की पहले चरण की 71 सीटों पर फिलहाल तिकोना मुकाबला है।
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सपा और कांग्रेस के गठबंधन से सियासी समीकरण एकदम बदल गए हैं। गठबंधन हर जगह लड़ता हुआ दिखाई दे रहा है, हालांकि यह इलाका न तो सपा और न ही कांग्रेस का गढ़ रहा है। त्रिकोण के बाकी दो कोने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) हैं।
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बदल गए हालात
गठबंधन होने से पहले तक इस क्षेत्र में मुख्य मुकाबला इन्हीं दोनों के बीच था। तब तक चुनाव 2014 की तर्ज पर साम्प्रदायिक हो रहा था। एक संप्रदाय बीजेपी के पक्ष में था तो दूसरा बसपा के। बसपा ने बड़ी संख्या में मुस्लिम उम्मीदवार जो उतारे थे। पूरे प्रदेश में 97। उसका मुस्लिम चेहरा नसीमुद्दीन सिद्दीकी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रभारी भी थे।
गठबंधन से पहले बीजेपी मान कर चल रही थी कि दलित और मुस्लिम समुदायों के बसपा के पक्ष में जाने से उसे मुश्किल हो सकती है। लेकिन गठबंधन ने उसे राहत दे दी। बीजेपी प्रवक्ता सुदेश वर्मा का कहना था कि अब मुसलमानों के वोट बंट जाएंगे।
लेकिन 2014 के विपरीत इस बार सभी जातियां अलग-अलग जाती दिख रही हैं। जाट राष्ट्रीय लोकदल के साथ, दलित बसपा के तो मुसलमान मुख्य रूप से सपा-कांग्रेस के साथ खड़ा दिख रहा है। सवर्ण जातियां बीजेपी के साथ हैं। जातियों के इस बंटवारे से किसी एक पार्टी के पक्ष में हवा नहीं दिख रही है।
गठबंधन से पहले बीजेपी मान कर चल रही थी कि दलित और मुस्लिम समुदायों के बसपा के पक्ष में जाने से उसे मुश्किल हो सकती है। लेकिन गठबंधन ने उसे राहत दे दी। बीजेपी प्रवक्ता सुदेश वर्मा का कहना था कि अब मुसलमानों के वोट बंट जाएंगे।
लेकिन 2014 के विपरीत इस बार सभी जातियां अलग-अलग जाती दिख रही हैं। जाट राष्ट्रीय लोकदल के साथ, दलित बसपा के तो मुसलमान मुख्य रूप से सपा-कांग्रेस के साथ खड़ा दिख रहा है। सवर्ण जातियां बीजेपी के साथ हैं। जातियों के इस बंटवारे से किसी एक पार्टी के पक्ष में हवा नहीं दिख रही है।
बीजेपी से मुखर हो रहे जाट जा रहे है राष्ट्रीय लोकदल में
पिछले चुनाव में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की वजह अधिकतर जातियां बीजेपी के साथ थीं। यही वजह है उसने इस इलाके की सभी सीटें जीत ली थीं। लेकिन इस बार जाट बीजेपी से नाराज होकर राष्ट्रीय लोकदल के साथ दिख रहे हैं। बागपत के चौधरी सुलेमान सिंह कहते हैं, "हमें आरक्षण का वादा पूरा नहीं किया गया।
जाट बाहुल्य हरियाणा में मुख्यमंत्री जाट नहीं बनाया गया। गन्ने के दाम पिछले चार साल से नहीं बढ़ाए गए हैं। हमारा इस्तेमाल खूब किया गया, लेकिन बदले में सिर्फ अपमान मिला।" छपरौली, बड़ौत, कैराना, जानसठ जैसे इलाकों में जाटों की पहचान एक बड़ा मुद्दा है। वे कहते हैं कि उनकी पहचान केवल चौधरी चरण सिंह की वजह से थी।
जाट बाहुल्य हरियाणा में मुख्यमंत्री जाट नहीं बनाया गया। गन्ने के दाम पिछले चार साल से नहीं बढ़ाए गए हैं। हमारा इस्तेमाल खूब किया गया, लेकिन बदले में सिर्फ अपमान मिला।" छपरौली, बड़ौत, कैराना, जानसठ जैसे इलाकों में जाटों की पहचान एक बड़ा मुद्दा है। वे कहते हैं कि उनकी पहचान केवल चौधरी चरण सिंह की वजह से थी।
पिछले चुनाव में अजित सिंह का साथ छोड़ना पड़ा भारी
पिछले चुनाव में चौधरी अजित सिंह का साथ छोड़ने का उन्हें बड़ा दुःख है। खतौली के सुरेंद्र सिंह कहते हैं कि रालोद जीते या हारे लेकिन इस बार वोट उसी को देना है। इसी तरह जाटों का गढ़ माने जाने वाली बागपत सीट पर रालोद ने गुज्जर नेता करतार सिंह भड़ाना को टिकट दिया है। उनका मुकाबला बसपा के नवाब अहमद हमीद और बीजेपी के योगेश धामा से है।
अहमद के पिता नवाब कोकब हमीद पांच बार विधायक और तीन बार मंत्री रह चुके हैं। कभी वो अजित सिंह के सबसे करीबियों में शुमार होते थे। लेकिन इस बार पला बदल कर बसपा में आ गए हैं। दलित और मुस्लिम गठजोड़ से उन्हें जीतने की उम्मीद है। वैसे पिछले बार भी ये सीट बसपा की हेमलता चौधरी जीती थीं।
अहमद के पिता नवाब कोकब हमीद पांच बार विधायक और तीन बार मंत्री रह चुके हैं। कभी वो अजित सिंह के सबसे करीबियों में शुमार होते थे। लेकिन इस बार पला बदल कर बसपा में आ गए हैं। दलित और मुस्लिम गठजोड़ से उन्हें जीतने की उम्मीद है। वैसे पिछले बार भी ये सीट बसपा की हेमलता चौधरी जीती थीं।
मुसलमान बंटा हुआ
पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुसलमान बंटा हुआ दिखा। अधिकतर जगहों पर वे सपा उम्मीदवार का साथ दे रहे हैं। मुजफ्फरनगर में कचहरी से रिटायर हुए चौधरी अमीन कहते हैं, "टीपू हमारा सुलतान है। तरक्कीपसंद है। और उसूल के लिए तो उसने अपने बाप से भी बगावत कर दी लेकिन अपराधियों को पार्टी में नहीं आने दिया।"
इस सबके अलावा हर सीट पर स्थानीय मुद्दे भी चुनाव को प्रभावित कर रहे हैं। इस ट्रेंड का सबसे बड़ा उदाहरण मेरठ की सरधना सीट पर मिला जहाँ 2012 दंगों के आरोपी बीजेपी के संगीत सोम लड़ रहे हैं। बीजेपी के सभी समर्थक उनका मुकाबला बसपा के उम्मीदवार इमरान कुरैशी से बता रहे हैं। इमरान के पिता हाजी याकूब कुरैशी 2007 में बतौर निर्दलीय मेरठ से जीते थे।
पेरिस के अखबार चार्ली हेब्दो के कार्टूनिस्ट द्वारा मोहम्मद साहब का कार्टून बनाने से नाराज हो याकूब ने उसकी गर्दन काटने वाले को 10 करोड़ रुपए का इनाम घोषित किया था। यानी ध्रुवीकरण के सब कारण यहाँ मौजूद हैं। लेकिन इस सीट पर सबसे मजबूत उम्मीदवार सपा का अतुल प्रधान माने जा रहे हैं।
इस सबके अलावा हर सीट पर स्थानीय मुद्दे भी चुनाव को प्रभावित कर रहे हैं। इस ट्रेंड का सबसे बड़ा उदाहरण मेरठ की सरधना सीट पर मिला जहाँ 2012 दंगों के आरोपी बीजेपी के संगीत सोम लड़ रहे हैं। बीजेपी के सभी समर्थक उनका मुकाबला बसपा के उम्मीदवार इमरान कुरैशी से बता रहे हैं। इमरान के पिता हाजी याकूब कुरैशी 2007 में बतौर निर्दलीय मेरठ से जीते थे।
पेरिस के अखबार चार्ली हेब्दो के कार्टूनिस्ट द्वारा मोहम्मद साहब का कार्टून बनाने से नाराज हो याकूब ने उसकी गर्दन काटने वाले को 10 करोड़ रुपए का इनाम घोषित किया था। यानी ध्रुवीकरण के सब कारण यहाँ मौजूद हैं। लेकिन इस सीट पर सबसे मजबूत उम्मीदवार सपा का अतुल प्रधान माने जा रहे हैं।
सपा जोड़ रही मजबूत मुस्लिम वोटर
हर गाँव, हर शहर में हर समुदाय में उनके समर्थक मिले। लोगों का कहना है कि अतुल ने इलाके में काम कराए हैं। उनकी पत्नी सीमा जिला पंचायत अध्यक्ष थीं। राज्य में सरकार सपा की थी। अतुल ने हर गाँव में कुछ न कुछ विकास के काम जरूर कराए हैं। यहीं एक और हकीकत दिखी। सरधना के कांग्रेस प्रमुख अतुल के ऑफिस में शिकायत दर्ज कराते मिले,
" हमारे लोग आपके लिए जीजान से लगे हैं लेकिन आपके प्रचार में कांग्रेस का झंडा एक भी नहीं दिख रहा है।" अतुल प्रधान के सचिव उन्हें इत्मिनान दिला रहे थे, "क्या बात करते हैं। हमारे ऑफिस के ऊपर ही लगा है।" बाहर निकल कर देखा तो वो कहीं नहीं था।
यानी कांग्रेस उम्मीदवार हर जगह सपा का झंडा लेकर चल रहे हैं। उससे उन्हें फायदा मिल रहा है। लेकिन सपा के लोगों को कांग्रेस का झंडा लगाने में अभी भी संकोच हो रहा है। क्या वे अभी से भविष्य से बारे में सोचने लगे हैं?
" हमारे लोग आपके लिए जीजान से लगे हैं लेकिन आपके प्रचार में कांग्रेस का झंडा एक भी नहीं दिख रहा है।" अतुल प्रधान के सचिव उन्हें इत्मिनान दिला रहे थे, "क्या बात करते हैं। हमारे ऑफिस के ऊपर ही लगा है।" बाहर निकल कर देखा तो वो कहीं नहीं था।
यानी कांग्रेस उम्मीदवार हर जगह सपा का झंडा लेकर चल रहे हैं। उससे उन्हें फायदा मिल रहा है। लेकिन सपा के लोगों को कांग्रेस का झंडा लगाने में अभी भी संकोच हो रहा है। क्या वे अभी से भविष्य से बारे में सोचने लगे हैं?