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बंगाल की सियासी जंग: 33 सीटों पर चुनाव लड़ेगी आईएसएफ, 4 सीटों पर लेफ्ट के साथ फ्रेंडली फाइट की नौबत
Sat, 21 Mar 2026 07:30 PM IST
राकेश कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोलकाता
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोलकाता
Published by: राकेश कुमार
Updated Sat, 21 Mar 2026 07:30 PM IST
सार
नौशाद सिद्दीकी ने साफ किया कि वाम मोर्चा के साथ 29 सीटों पर उनकी सहमति बन चुकी है। लेकिन असली पेंच नंदीग्राम, पांशकुड़ा पश्चिम, भगवानगोला और मुरारई पर फंसा है।
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इंडियन सेक्युलर फ्रंट के विधायक नौशाद सिद्दीकी
- फोटो : @ANI
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विस्तार
Bengal Election: पश्चिम बंगाल की सियासत में इस बार 'गठबंधन की राजनीति' के बीच इंडियन सेक्युलर फ्रंट ने एक बड़ा धमाका कर दिया है। दरअसल, आईएसएफ नेता नौशाद सिद्दीकी ने ऐलान किया है कि उनकी पार्टी राज्य की 33 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। हालांकि, इस घोषणा ने वामपंथी खेमे में थोड़ी बेचैनी जरूर पैदा कर दी है। दरअसल, चार सीटों पर फ्रेंडली फाइट की स्थिति बन गई है।
नौशाद सिद्दीकी ने साफ किया कि वाम मोर्चा के साथ 29 सीटों पर उनकी सहमति बन चुकी है। लेकिन असली पेंच नंदीग्राम, पांशकुड़ा पश्चिम, भगवानगोला और मुरारई पर फंसा है। इन सीटों पर दोनों पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।
अब सहयोगी की भूमिका में नहीं रहना चाहती आईएसएफ
नंदीग्राम जैसी हाई-प्रोफाइल सीट पर उम्मीदवार उतारने का फैसला बताता है कि आईएसएफ अब सिर्फ सहयोगी दल बनकर नहीं रहना चाहती, बल्कि अपनी राजनीतिक पहचान को और मजबूत करना चाहती है। सिद्दीकी ने कहा, "हमने लेफ्ट नेतृत्व को इन 4 सीटों के बारे में सूचित कर दिया है। हमें उम्मीद है कि वे इन निर्वाचन क्षेत्रों में अपने उम्मीदवार नहीं उतारेंगे, जिससे वोटों का बिखराव रोका जा सके।"
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24 परगना में शक्ति प्रदर्शन की तैयारी
बता दें कि इंडियन सेक्युलर फ्रंट ने सबसे ज्यादा ध्यान दक्षिण और उत्तर 24 परगना जिलों पर केंद्रित किया है। पार्टी ने इन दोनों जिलों में 8-8 यानी कुल 16 सीटों पर उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है। पिछले चुनाव में नौशाद सिद्दीकी ने भानगढ़ सीट जीतकर सबको चौंका दिया था। इस बार भी इंडियन सेक्युलर फ्रंट का मुख्य आधार यही इलाके हैं। इन सीटों पर अल्पसंख्यक और दलित मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं।
यह भी पढ़ें: तेल की तपिश: क्या भारत में बंद हो जाएंगी फैक्ट्रियां? कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सरकार को किया आगाह
दो चरणों में होगा फैसला
पश्चिम बंगाल की 294 सदस्यीय विधानसभा के लिए चुनावी बिगुल बज चुका है। राज्य में इस बार मुकाबला दो चरणों में सिमटा हुआ है। पहले चरण का मतदान 23 अप्रैल को होगा, जबकि दूसरे और अंतिम चरण की वोटिंग 29 अप्रैल को तय की गई है। नतीजे 4 मई को सामने आएंगे।
बताते चलें कि इंडियन सेक्युलर फ्रंट का यह कदम तृणमूल कांग्रेस के लिए चिंता का सबब बन सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ISF का मजबूत होना सीधे तौर पर ममता बनर्जी के पारंपरिक वोट बैंक में सेंधमारी होगा। अब देखना यह है कि लेफ्ट और इंडियन सेक्युलर फ्रंट का यह 'खट्टा-मीठा' रिश्ता धरातल पर कितना सफल हो पाता है।
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नौशाद सिद्दीकी ने साफ किया कि वाम मोर्चा के साथ 29 सीटों पर उनकी सहमति बन चुकी है। लेकिन असली पेंच नंदीग्राम, पांशकुड़ा पश्चिम, भगवानगोला और मुरारई पर फंसा है। इन सीटों पर दोनों पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।
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अब सहयोगी की भूमिका में नहीं रहना चाहती आईएसएफ
नंदीग्राम जैसी हाई-प्रोफाइल सीट पर उम्मीदवार उतारने का फैसला बताता है कि आईएसएफ अब सिर्फ सहयोगी दल बनकर नहीं रहना चाहती, बल्कि अपनी राजनीतिक पहचान को और मजबूत करना चाहती है। सिद्दीकी ने कहा, "हमने लेफ्ट नेतृत्व को इन 4 सीटों के बारे में सूचित कर दिया है। हमें उम्मीद है कि वे इन निर्वाचन क्षेत्रों में अपने उम्मीदवार नहीं उतारेंगे, जिससे वोटों का बिखराव रोका जा सके।"
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24 परगना में शक्ति प्रदर्शन की तैयारी
बता दें कि इंडियन सेक्युलर फ्रंट ने सबसे ज्यादा ध्यान दक्षिण और उत्तर 24 परगना जिलों पर केंद्रित किया है। पार्टी ने इन दोनों जिलों में 8-8 यानी कुल 16 सीटों पर उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है। पिछले चुनाव में नौशाद सिद्दीकी ने भानगढ़ सीट जीतकर सबको चौंका दिया था। इस बार भी इंडियन सेक्युलर फ्रंट का मुख्य आधार यही इलाके हैं। इन सीटों पर अल्पसंख्यक और दलित मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं।
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दो चरणों में होगा फैसला
पश्चिम बंगाल की 294 सदस्यीय विधानसभा के लिए चुनावी बिगुल बज चुका है। राज्य में इस बार मुकाबला दो चरणों में सिमटा हुआ है। पहले चरण का मतदान 23 अप्रैल को होगा, जबकि दूसरे और अंतिम चरण की वोटिंग 29 अप्रैल को तय की गई है। नतीजे 4 मई को सामने आएंगे।
बताते चलें कि इंडियन सेक्युलर फ्रंट का यह कदम तृणमूल कांग्रेस के लिए चिंता का सबब बन सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ISF का मजबूत होना सीधे तौर पर ममता बनर्जी के पारंपरिक वोट बैंक में सेंधमारी होगा। अब देखना यह है कि लेफ्ट और इंडियन सेक्युलर फ्रंट का यह 'खट्टा-मीठा' रिश्ता धरातल पर कितना सफल हो पाता है।