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क्या माओवादी संगठन अंतिम सांसें ले रहा है?

Mon, 30 Apr 2018 03:11 PM IST
बीबीसी, हिंदी
बीबीसी, हिंदी Updated Mon, 30 Apr 2018 03:11 PM IST
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Is the Maoist organization taking the last breath

महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में 35 से ज्यादा संदिग्ध माओवादियों को कथित मुठभेड़ में मारने के पुलिस के दावे के बाद यह कहा जाने लगा है कि महाराष्ट्र में माओवादियों का संगठन अब अंतिम सांस ले रहा है। यह दावा पखवाड़े भर पहले ही देश के गृह सचिव के उस दावे का विस्तार माना जा सकता है जिसमें कहा गया है कि पूरे देश में माओवादी हिंसा में पिछले साल भर में भारी कमी आई है। लेकिन गढ़चिरौली मुठभेड़ और गृह सचिव के दावों से अलग आंकड़े बताते हैं कि माओवादियों के गढ़ कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में माओवादी हिंसा घटने की बजाए और बढ़ गई है।

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माओवादियों के मारे जाने को कैसे देखें?
सरकार भले देश भर में पिछले साल भर में माओवादी हिंसा में कमी का दावा कर रही हो, लेकिन इस हिंसा का केंद्र माने जाने वाले छत्तीसगढ़ में माओवादी हिंसा में मौत के आंकड़े लगातार बढ़ते जा रहे हैं। यहां तक कि पिछले पांच सालों में सर्वाधिक मौतें 2017 में ही हुई हैं।
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गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2015 में माओवादी हिंसा में 101 लोग मारे गए थे और 2016 में मौत का आंकड़ा 107 तक पहुंचा, लेकिन अगले साल यानी 2017 में माओवादी हिंसा में सर्वाधिक मौतें हुईं और यह आंकड़ा 130 तक पहुंच गया।
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2016 में सुरक्षाबलों के 38 जवान मारे गए थे, लेकिन अगले ही साल यानी 2017 में सुरक्षा बल के 60 जवानों को माओवादी हमलों में अपनी जान गंवानी पड़ी। छत्तीसगढ़ की माओवादी हिंसा में गहराते मौत के इन आंकड़ों को लेकर पुलिस अधिकारियों के पास अपने दावे हैं।

छत्तीसगढ़ में नक्सल ऑपरेशन की कमान संभाल रहे विशेष पुलिस महानिदेशक, डीएम अवस्थी का कहना है कि 2017 में सीआरपीएफ पर माओवादी हमले की दो बड़ी घटनाए हुई थीं। 10 मार्च को सुकमा जिले के भेज्जी में सीआरपीएफ़ के 12 जवान और 24 अप्रैल को सुकमा ज़िले के ही बुर्कापाल में सीआरपीएफ़ के 25 जवान माओवादी हमले में मारे गए थे।

अवस्थी कहते हैं, "इन दो घटनाओं को छोड़ दें तो हमने माओवादियों के साथ आमने-सामने की लड़ाई लड़ी है और माओवादियों को पीछे धकेला है। आप अगर आंकड़ों में देखेंगे तो 2017 और 2018 में बड़ी संख्या में माओवादियों के बड़े कैडर या तो मारे गए हैं या गिरफ्तार किए गए हैं। माओवादियों के बड़े कैडर के मारे जाने को एक सफलता के तौर पर देखा जाना चाहिए।"

डीएम अवस्थी का दावा है कि माओवादियों ने सड़क निर्माण जैसे काम में लगे लोगों को निशाना बनाया या फिर माओवादी आंदोलन का रास्ता छोड़ चुके लोगों को मारा है, जिन पर उन्हें मुखबिर होने का शक़ था। इस कारण भी आम लोगों की मौत के आंकड़े थोड़े अधिक हैं।

'आंकड़ों से माओवाद कमज़ोर या मज़बूत नहीं'
लेकिन विधायक और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष भूपेश बघेल का कहना है कि राज्य सरकार माओवादियों पर लगाम लगाने में पूरी तरह से असफल साबित हुई है। उनका कहना है कि पिछले 15 सालों में माओवाद और बढ़ा है।

बघेल कहते हैं, "केंद्र सरकार ने इस महीने माओवाद प्रभावित देश के 126 जिलों में से 44 जिलों को माओवाद मुक्त क्षेत्र घोषित कर दिया है, लेकिन इनमें बस्तर का एक भी ज़िला शामिल नहीं है। उलटे इस बार माओवादी प्रभावित ज़िलों में मुख्यमंत्री रमन सिंह के गृह ज़िले कबीरधाम को शामिल करना पड़ा है। इसे आप माओवाद का घटना कहेंगे या बढ़ना?"

हालांकि वरिष्ठ पत्रकार और माओवादी मामलों के जानकार रुचिर गर्ग हिंसा की घटनाओं और मौत के आंकड़ों से माओवादी आंदोलन को कमज़ोर या मज़बूत ठहराए जाने के पक्ष में नहीं हैं। रुचिर गर्ग का मानना है कि छत्तीसगढ़ में माओवादियों पर सुरक्षाबलों का दबाव बढ़ा है और सुरक्षाबल कई ऐसे इलाकों को दोबारा हासिल करने में सफल रहे हैं, जहां माओवादी प्रभावशाली थे।

'विकास की प्राथमिकता तय करनी होगी'
रुचिर गर्ग कहते हैं, "माओवादी आंदोलन की स्थिति को जानने के लिए हमें यह देखने की ज़रूरत है कि माओवादियों की सैन्य ताक़त कितनी है? जिन सुरक्षाबलों से वे लड़ाई लड़ रहे हैं, उनके मुकाबले उनकी कंपनियां, उनके हथियार कैसे हैं? सांगठनिक स्तर पर देखें तो उनकी सेंट्रल कमेटी है, पोलित ब्यूरो है, ज़िलेवार संगठन हैं, ये किस तरह से कार्यरत हैं? क्या ये छिन्न-भिन्न हो गई हैं? उनकी आर्थिक स्थिति कैसी है? संसाधनों के मामले में वे कैसे हैं?"

दूसरी ओर मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल की छत्तीसगढ़ ईकाई के अध्यक्ष डॉक्टर लाखन सिंह मानते हैं कि माओवादी आंदोलन के कमज़ोर होने की घोषणा को चुनावी तैयारी की तरह देखा जाना चाहिए।लाखन सिंह कहते हैं, "चुनाव के दिन पास आ रहे हैं, इसलिए सरकार पर दबाव है कि वह घोषणा करे कि सब कुछ बेहतर है, तेज़ी से विकास हो रहा है, राष्ट्र की प्रगति हो रही है, माओवाद ख़त्म हो गया है। सरकार को अगर सच में माओवाद को ख़त्म करना है तो हमें विकास की अपनी अवधारणा को बदलना होगा, विकास की प्राथमिकता तय करनी होगी।"


फिलहाल तो विकास की प्राथमिकता जैसी बयानों के बीच छत्तीसगढ़ का एक बड़ा हिस्सा माओवादियों और सुरक्षाबलों की लड़ाई का केंद्र बना हुआ है और दोनों ही तरफ़ से हिंसा के आंकड़ों के गणित में जोड़-घटाव जारी है।

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