इन्वर्टिस यूनिवर्सिटी ने किया सुधा चंद्रन के डॉक्टर बनने का सपना साकार
- सुधा ने एक सपना देखा जो अब इन्वर्टिस इंस्टीट्यूट ने साकार किया
- टेलीविज़न की दुनिया में भी खूब पाई शोहरत
विस्तार
सुधा चंद्रन का नाम सुनते ही एक ऐसी शख्सियत की छवि मन में बनती है जिसने अपने आत्मविश्वास और लगन से किस्मत को भी मात दे दी। किस्मत ने एक दुर्घटना में उनका एक पैर तो छीन लिया पर उन्हें वो करने से रोक नहीं पाई जो उनका जुनून था। संघर्ष और सफलता के बीच सुधा ने एक सपना देखा जो अब इन्वर्टिस इंस्टीट्यूट ने साकार किया।
पांच साल की उम्र से ही सुधा चंद्रन ने नृत्य सीखना शुरू किया था और सातवें साल की उम्र में वो स्टेज प्रोग्राम करने लगीं थी। सत्रह साल की उम्र में एक दुर्घटना ने उनसे उनका एक पैर छीन लिया पर उनका हौसला नहीं छीन पाया। कृत्रिम पैर की बदौलत उन्होंने अपना नृत्य जारी रखा और सबका मन मोह लिया। उनके इस जज्बे की कहानी कई पत्रिकाओं में छपने लगी। लोग उनकी कहानी से प्रेरणा लेने लगे।
जाने-माने फिल्म निर्माता रामोजी राव की नजर उनकी कहानी पर पड़ी और उन्होंने 1984 में तेलुगू में 'मयूरी' नाम की फिल्म बना डाली। इसकी सफलता से अभिभूत होकर दो साल बाद ही रामोजी राव ने टी. रामाराव के निर्देशन में 'नाचे मयूरी' हिंदी में बनाई और पूरी दुनिया को मालूम हो गया कि सुधा ने तमाम मुश्किलों को किस तरह पीछे धकेल दिया।
टेलीविज़न की दुनिया में भी खूब पाई शोहरत
नृत्य और फिल्मों की दुनिया में तो सुधा चंद्रन ने अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई ही, साथ ही टेलीविज़न की दुनिया में भी खूब शोहरत पाई। टीवी के फेमस
सीरियल 'कहीं किसी रोज़' की रमोला सिकंद को कोई कैसे भूल सकता है। उनके इस कैरेक्टर ने सीरियलों में महिला विलेन की नई परिभाषा गढ़ी। आज भी वो नागिन सीरियल में नज़र आ रही हैं। इसके साथ साथ अगर उन्हें स्टाइल आईकॉन भी कहा जाए तो गलत नहीं होगा।
सुधा चंद्रन की कहानी ने ना सिर्फ कई लोगों को प्रेरणा दी पर इस बात पर भी पुख्ता मुहर लगाई कि अगर ठान लिया जाए तो कोई भी मुश्किल बड़ी नहीं, ज़रूरत है तो बस डटे रहने की। सुधा कभी बचपन में डॉक्टर बनने का सपना भी देखा करती थीं।
हाल ही में बरेली की इन्वर्टिस यूनिवर्सिटी ने जब उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया तो उन्होनें सबको संबोधित करते हुए कहा कि आज बचपन का एक और सपना इन्वर्टिस यूनिवर्सिटी ने पूरा कर दिया।