ट्रंप प्रशासन को समझाने के लिए न्यूयार्क जाएगा प्रतिनिधिमंडल
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एचबी-1 वीजा पर ट्रंप प्रशासन के रवैये से सहमा भारतीय उद्योग जगत अब इसके निदान के लिए अपने प्रतिनिधिमंडल को अमेरिका भेजेगा। जहां वह अमेरिकी सांसदों को एचबी-1 वीजा पर लागू होने वाले प्रस्तावित कड़े कानूनों के बारे में भारतीय कंपनियों की समस्याओं से रूबरू कराएगा।
टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार नेशनल एसोसिएशन ऑफ सॉफ्टवेयर ऐंड सर्विसेज कंपनीज (नॉसकॉम) के चीफ आर चंद्रशेखर ने बताया कि 20 फरवरी को वाशिंगटन जाने वाले प्रतिनिधिमंडल में शीर्ष भारतीय आईटी कंपिनयों के सीईओ शामिल रहेंगे।
बता दें कि टीसीएस और इन्फोसिस जैसी शीर्ष भारतीय आईटी कंपनियों का सिस्टम ही ऐसा है कि अमेरिकी ग्राहकों के साथ काम करने के लिए उन्हें अपने विदेशी कामगारों को शामिल करना ही पड़ता है। बताया जा रहा है कि राष्ट्रपति ट्रंप नए वीजा प्रोग्राम के ड्राफ्ट पर काम कर रहे हैं।
एप्पल और विप्रो जैसी कंपनियां भी होंगी प्रभावित
अब वीजा पर पाबंदियों से एप्पल जैसी अमेरिकी और विप्रो जैसी भारतीय कंपनियों की भर्ती प्रक्रिया भी प्रभावित होगी। वहीं एचबी- 1 वीजा के प्रस्तावित नियमों में अमेरिका में काम कर रही कंपनियों को विदेशी कामगारों को नौकरियां देने की प्रक्रिया इतनी कड़ी होने वाली है कि अब उन्हें नौकरियां देना आसान नहीं होगा।
अमेरिकी कंपनियों को अब बहुत ज्यादा तनख्वाह पर बाहर से आने वाले कामगारों को नौकरियां देनी होंगी। जाहिर है इससे बचने के लिए फिर उन्हें अमेरिकी युवाओं को ही नौकरी में प्राथमिकता देनी होगी।
चंद्रशेखर ने बताया कि हम अमेरिकी प्रशासन और नए सांसदों के सामने इस बात को रखेंगे की एचबी-1 वीजा पर प्रस्तावित शर्तों से अमेरिका को क्या खोना पड़ सकता है। चार दिवसीय यात्रा पर अमेरिका जाने वाले प्रतिनिधिमंडल के सदस्य चंद्रशेखर ने बताया कि इस संबंध में हम अपनी सरकार से इन चिंताओं को पहले ही साझा कर चुके हैं।
अमेरिकी संसद में पेश किया गया है एचबी-1 वीजा पर नया बिल
बता दें कि एक डेमोक्रेट सांसद जोए लोफग्रीन ने कुछ दिन पहले ही अमेरिकी सांसदों में एचबी-1 वीजा पर अमेरिकी संसद में एक बिल पेश किया था जिसमें अमेरिका में नौकरी के लिए आने वाले विदेशी कामगारों के लिए कम से कम वेतन 130000 डॉलर करने का प्रस्ताव किया गया था। जबकि अभी तक अमेरिकी कंपनियां 60 हजार डॉलर पर विदेशी कामगारों को नौकरी दे सकती हैं।
ट्रंप प्रशासन इस लिमिट को बढ़ाकर दोगुनी से ज्यादा करना चाहता है जिससे अमेरिकी कंपनियों के लिए बाहर से आने वाले युवाओं को नौकरी देना मुश्किल हो जाए और मजबूरी में उन्हें अमेरिकी युवाओं को नौकरी में प्राथमिकता देना पड़े।
हालांकि अमेरिकी प्रशासन के रूख को देखते हुए भारतीय कंपनियों के सीईओज एक आपातकालीन प्लान पर भी काम कर रहे हैं जिससे उनकी कार्यक्षमता प्रभावित न हो। वैसे उम्मीद इस बात की भी है कि जून में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच होने वाली बातचीत में भी इस मुद्दे पर चर्चा हो।