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होमी जहांगीर भाभा ना होते तो कैसा होता भारत?
बीबीसी हिंदी
Updated Sat, 27 Jan 2018 11:50 AM IST
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- फोटो : BBC
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भारत के वैज्ञानिक सर सीवी रमन के मुंह से अपने वैज्ञानिक दोस्तों के लिए तारीफ के शब्द मुश्किल से निकलते थे। सिवाए एक अपवाद को छोड़ कर। होमी जहांगीर भाभा। रमन उन्हें भारत का लियोनार्डो डी विंची कहा करते थे।
अक्सर डबल ब्रेस्ट सूट पहनने वाले भाभा की वैज्ञानिक विषयों के साथ-साथ संगीत, नृत्य, पुस्तकों और चित्रकला में बराबर की रुचि थी। वैज्ञानिकों को भाषण देते हुए तो आपने देखा होगा लेकिन अपने साथियों का पोर्ट्रेट या स्केच बनाते हुए शायद नहीं।
आर्काइवल रिसोर्सेज फर कंटेम्परेरी हिस्ट्री की संस्थापक और भाभा पर किताब लिखने वाली इंदिरा चौधरी कहती हैं, "मृणालिनी साराबाई ने मुझे बताया था कि भाभा ने उनके दो स्केच बनाए थे। यहां तक कि हुसैन का भी स्केच भाभा ने बनाया था।''
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''जब हुसैन की पहली प्रदर्शनी मुम्बई में हुई थी तो भाभा ने ही उसका उद्घाटन किया था। जब भी बॉम्बे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स की प्रदर्शनी होती थी तो भाभा जरूर आते थे और वहां से अपनी संस्था के लिए पेंटिंग्स और मूर्तियां खरीदते थे।"
जाने-माने वैज्ञानिक प्रोफेसर यशपाल ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च में अपने करियर के शुरू के दिनों में होमी भाभा के साथ काम किया था। उन्होंने कहा था कि 57 साल की छोटी सी उम्र में भाभा ने जितना कुछ हासिल किया, उसका दूसरा कोई उदाहरण नहीं मिलता।
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अक्सर डबल ब्रेस्ट सूट पहनने वाले भाभा की वैज्ञानिक विषयों के साथ-साथ संगीत, नृत्य, पुस्तकों और चित्रकला में बराबर की रुचि थी। वैज्ञानिकों को भाषण देते हुए तो आपने देखा होगा लेकिन अपने साथियों का पोर्ट्रेट या स्केच बनाते हुए शायद नहीं।
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आर्काइवल रिसोर्सेज फर कंटेम्परेरी हिस्ट्री की संस्थापक और भाभा पर किताब लिखने वाली इंदिरा चौधरी कहती हैं, "मृणालिनी साराबाई ने मुझे बताया था कि भाभा ने उनके दो स्केच बनाए थे। यहां तक कि हुसैन का भी स्केच भाभा ने बनाया था।''
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''जब हुसैन की पहली प्रदर्शनी मुम्बई में हुई थी तो भाभा ने ही उसका उद्घाटन किया था। जब भी बॉम्बे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स की प्रदर्शनी होती थी तो भाभा जरूर आते थे और वहां से अपनी संस्था के लिए पेंटिंग्स और मूर्तियां खरीदते थे।"
जाने-माने वैज्ञानिक प्रोफेसर यशपाल ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च में अपने करियर के शुरू के दिनों में होमी भाभा के साथ काम किया था। उन्होंने कहा था कि 57 साल की छोटी सी उम्र में भाभा ने जितना कुछ हासिल किया, उसका दूसरा कोई उदाहरण नहीं मिलता।
नेहरू और भाभा
- फोटो : BBC
यशपाल ने बताया था, "संगीत में उनकी बहुत रुचि थी। चाहे वो भारतीय संगीत हो या पश्चिमी शास्त्रीय संगीत। किस पेंटिंग को कहां टांगा जाए और कैसे टांगा जाए। फर्नीचर कैसा बनना है। हर चीज के बारे में बहुत गहराई से वह सोचते थे। टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च में हर बुधवार को एकेडमिक कॉन्फ्रेंस होती थी और भाभा ने शायद ही कोई कोलोकियम (एकेडमिक कॉन्फ्रेंस) मिस किया हो। इस दौरान वह सबसे मिलते थे और जानने की कोशिश करते थे कि क्या हो रहा है और क्या नहीं हो रहा है।"
होमी भाभा जवाहरलाल नेहरू के काफी नजदीक थे और दुनिया के उन चुनिंदा लोगों में से थे जो उन्हें भाई कहकर पुकारते थे।
इंदिरा चौधरी कहती हैं, "नेहरू को सिर्फ दो लोग भाई कहते थे। एक थे जयप्रकाश नारायण और दूसरे होमी भाभा। हमारे आर्काइव में इंदिरा गांधी का एक भाषण है जिसमें वह कहती हैं कि नेहरू को भाभा अक्सर देर रात में फोन करते थे और नेहरू हमेशा उनसे बात करने के लिए समय निकालते थे। एक अंग्रेज वैज्ञानिक थे पैट्रिक बैंकेट जो डीआरडीओ के सलाहकार होते थे। उनका कहना था कि नेहरू को बौद्धिक कंपनी बहुत पसंद थी और होमी भाभा से वह कंपनी उन्हें मिला करती थी।"
भाभा का सोचने का दाएरा काफी विस्तृत था। वो वर्तमान के साथ-साथ आने वाले समय की जरूरतों को भी उतना ही महत्व देते थे।
होमी भाभा जवाहरलाल नेहरू के काफी नजदीक थे और दुनिया के उन चुनिंदा लोगों में से थे जो उन्हें भाई कहकर पुकारते थे।
इंदिरा चौधरी कहती हैं, "नेहरू को सिर्फ दो लोग भाई कहते थे। एक थे जयप्रकाश नारायण और दूसरे होमी भाभा। हमारे आर्काइव में इंदिरा गांधी का एक भाषण है जिसमें वह कहती हैं कि नेहरू को भाभा अक्सर देर रात में फोन करते थे और नेहरू हमेशा उनसे बात करने के लिए समय निकालते थे। एक अंग्रेज वैज्ञानिक थे पैट्रिक बैंकेट जो डीआरडीओ के सलाहकार होते थे। उनका कहना था कि नेहरू को बौद्धिक कंपनी बहुत पसंद थी और होमी भाभा से वह कंपनी उन्हें मिला करती थी।"
भाभा का सोचने का दाएरा काफी विस्तृत था। वो वर्तमान के साथ-साथ आने वाले समय की जरूरतों को भी उतना ही महत्व देते थे।
टीआईएफ़आर
- फोटो : BBC
जाने-माने वैज्ञानिक प्रोफेसर एमजीके मेनन एक दिलचस्प कस्सा सुनाया करते थे, "एक बार मैं उनके साथ देहरादून गया था। उस समय पंडित नेहरू वहां रुके हुए थे। एक बार हम सर्किट हाउस के भवन से निकलकर उसके ड्राइव वे पर चलने लगे। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या आप इस ड्राइव वे के दोनों तरफ लगे पेड़ों को पहचानते हैं। मैंने कहा इनका नाम स्टरफूलिया अमाटा है।"
प्रोफेसर मेनन ने बताया था, "भाभा बोले मैं इसी तरह के पेड़ ट्रॉम्बे के अपने सेंट्रल एवेन्यू में लगाने वाला हूं। मैंने कहा होमी आपको पता है इन पेड़ों को बड़ा होने में कितना समय लगता है। उन्होंने पूछा कितना? मैंने कहा कम से कम सौ साल। उन्होंने कहा इससे क्या मतलब। हम नहीं रहेंगे। तुम नहीं रहोगे लेकिन वृक्ष तो रहेंगे और आने वाले लोग इन्हें देखेंगे जैसे हम इस सर्किट हाउस में इन पेड़ों को देख रहे हैं। मुझे ये देखकर बहुत अच्छा लगा कि वो आगे के बारे में सोच रहे थे न कि अपने लिए।"
प्रोफेसर मेनन ने बताया था, "भाभा बोले मैं इसी तरह के पेड़ ट्रॉम्बे के अपने सेंट्रल एवेन्यू में लगाने वाला हूं। मैंने कहा होमी आपको पता है इन पेड़ों को बड़ा होने में कितना समय लगता है। उन्होंने पूछा कितना? मैंने कहा कम से कम सौ साल। उन्होंने कहा इससे क्या मतलब। हम नहीं रहेंगे। तुम नहीं रहोगे लेकिन वृक्ष तो रहेंगे और आने वाले लोग इन्हें देखेंगे जैसे हम इस सर्किट हाउस में इन पेड़ों को देख रहे हैं। मुझे ये देखकर बहुत अच्छा लगा कि वो आगे के बारे में सोच रहे थे न कि अपने लिए।"
साठ साल पहले पेड़ों का ट्रांसप्लांट
भाभा को जुनून की हद तक बागवानी का शौक था। टीआईएफआर और बार्क की सुंदर हरियाली का श्रेय उन्हीं को दिया जाता है।
इंदिरा चौधरी कहती हैं, "टीआईएफआर में एक गार्डेन है जिसका नाम है अमीबा गार्डेन। वो अमीबा की शक्ल में है। उस पूरे गार्डेन को उन्होंने अपने ऑफिस में देखकर तीन फीट शिफ्ट किया था क्योंकि उन्हें वह अच्छा नहीं लग रहा था। उन्हें परफेक्शन चाहिए था। भाभा ने सभी बड़े-बड़े पेड़ों को ट्रांसप्लांट किया। एक भी पेड़ को काटा नहीं। पहले पेड़ लगाए गए और फिर बिल्डिंग बनाई गई। मुझे ये चीज इसलिए याद आ रही है क्योंकि बेंगलुरु में मेट्रो बनाने के लिए हजारों पेड़ काट डाले गए। सालों पहले भाभा ने सोचा था कि पेड़ों को काटने के बजाए ट्रांसप्लांट किया जा सकता है।"
खाने के शौकन भाभा
भाभा लीक से हटकर चलने में यकन रखते थे। वाकपटुता में उनका कोई सानी नहीं था और न ही आडंबर में उनका यकीन था।
इंदिरा गांधी के वैज्ञानिक सलाहकार रहे प्रोफेसर अशोक पार्थसारथी कहते हैं, "जब वो 1950 से 1966 तक परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष थे, तब वो भारत सरकार के सचिव भी हुआ करते थे। वो कभी भी अपने चपरासी को अपना ब्रीफकेस उठाने नहीं देते थे। खुद उसे लेकर चलते थे जो कि बाद में विक्रम साराभाई भी किया करते थे। वो हमेशा कहते थे कि पहले मैं वैज्ञानिक हूं और उसके बाद परमाणु ऊर्जा आयोग का अध्यक्ष। एक बार वो किसी सेमिनार में भाषण दे रहे थे तो सवाल जवाब के समय एक जूनियर वैज्ञानिक ने उनसे एक मुश्किल सवाल पूछा। भाभा को ये कहने में कोई शर्म नहीं आई कि अभी इस सवाल का जवाब उनके पास नहीं है। मैं कुछ दिन सोच कर इसका जवाब दूंगा।"
बहुत कम लोगों को पता है कि होमी भाभा खाने के बहुत शौकन थे। इंदिरा चौधरी याद करती हैं कि परमाणु वैज्ञानिक एमएस श्रीनिवासन ने उनसे बताया कि एक बार वॉशिंगटन यात्रा के दौरान भाभा का पेट खराब हो गया। डॉक्टर ने उन्हे सिर्फ दही खाने की सलाह दी। भाभा ने पहले पूरा ग्रेप फ्रूट खाया, पोच्ड अंडों, कॉफी और टोस्ट पर हाथ साफ किया और फिर जाकर दही मंगवाई और वो भी दो बार और ये तब जब उनका पेट खराब था।
भाभा को जुनून की हद तक बागवानी का शौक था। टीआईएफआर और बार्क की सुंदर हरियाली का श्रेय उन्हीं को दिया जाता है।
इंदिरा चौधरी कहती हैं, "टीआईएफआर में एक गार्डेन है जिसका नाम है अमीबा गार्डेन। वो अमीबा की शक्ल में है। उस पूरे गार्डेन को उन्होंने अपने ऑफिस में देखकर तीन फीट शिफ्ट किया था क्योंकि उन्हें वह अच्छा नहीं लग रहा था। उन्हें परफेक्शन चाहिए था। भाभा ने सभी बड़े-बड़े पेड़ों को ट्रांसप्लांट किया। एक भी पेड़ को काटा नहीं। पहले पेड़ लगाए गए और फिर बिल्डिंग बनाई गई। मुझे ये चीज इसलिए याद आ रही है क्योंकि बेंगलुरु में मेट्रो बनाने के लिए हजारों पेड़ काट डाले गए। सालों पहले भाभा ने सोचा था कि पेड़ों को काटने के बजाए ट्रांसप्लांट किया जा सकता है।"
खाने के शौकन भाभा
भाभा लीक से हटकर चलने में यकन रखते थे। वाकपटुता में उनका कोई सानी नहीं था और न ही आडंबर में उनका यकीन था।
इंदिरा गांधी के वैज्ञानिक सलाहकार रहे प्रोफेसर अशोक पार्थसारथी कहते हैं, "जब वो 1950 से 1966 तक परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष थे, तब वो भारत सरकार के सचिव भी हुआ करते थे। वो कभी भी अपने चपरासी को अपना ब्रीफकेस उठाने नहीं देते थे। खुद उसे लेकर चलते थे जो कि बाद में विक्रम साराभाई भी किया करते थे। वो हमेशा कहते थे कि पहले मैं वैज्ञानिक हूं और उसके बाद परमाणु ऊर्जा आयोग का अध्यक्ष। एक बार वो किसी सेमिनार में भाषण दे रहे थे तो सवाल जवाब के समय एक जूनियर वैज्ञानिक ने उनसे एक मुश्किल सवाल पूछा। भाभा को ये कहने में कोई शर्म नहीं आई कि अभी इस सवाल का जवाब उनके पास नहीं है। मैं कुछ दिन सोच कर इसका जवाब दूंगा।"
बहुत कम लोगों को पता है कि होमी भाभा खाने के बहुत शौकन थे। इंदिरा चौधरी याद करती हैं कि परमाणु वैज्ञानिक एमएस श्रीनिवासन ने उनसे बताया कि एक बार वॉशिंगटन यात्रा के दौरान भाभा का पेट खराब हो गया। डॉक्टर ने उन्हे सिर्फ दही खाने की सलाह दी। भाभा ने पहले पूरा ग्रेप फ्रूट खाया, पोच्ड अंडों, कॉफी और टोस्ट पर हाथ साफ किया और फिर जाकर दही मंगवाई और वो भी दो बार और ये तब जब उनका पेट खराब था।
नोबेल के लिए नामांकन
भाभा का एक कुत्ता हुआ करता था। उसके बहुत लंबे कान होते थे जिसे वो क्यूपिड कहकर पुकारते थे और रोज उसे सड़क पर घुमाने ले जाते थे। जैसे ही भाभा घर लौटते थे वो कुत्ता दौड़कर उनके पास आकर उनके पैर चाटता था। जब भाभा का एक विमान दुर्घटना में निधन हुआ तो उस कुत्ते ने पूरे एक महीने तक कुछ नहीं खाया।
रोज डॉक्टर आकर उसे दवाई देते थे लेकिन वो कुत्ता सिर्फ पानी पिया करता था और खाने को हाथ नहीं लगाता था। वो ज्यादा दिनों तक जीवित नहीं रह पाया। भाभा भी इंसान थे। हर इंसान पूरी तरह परफेक्ट नहीं होता। भाभा भी इसके अपवाद नहीं थे। उनकी सिर्फ एक कमी थी कि वो वक्त के पाबंद नहीं थे।
इंदिरा चौधरी कहतीं हैं, "हर इंसान में कुछ अच्छे गुण होते हैं तो कुछ बुरे। बहुत लोग बताते हैं कि उन्हें समय का कोई ध्यान नहीं रहता था। जो लोग उनसे मिलने का अप्वॉयमेंट लेते थे वो इंतजार करते रहते थे। यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु एजेंसी, वियना में वह कभी-कभी बैठकों में बहुत देर से आते थे। उन लोगों ने इसका इलाज ये निकाला था कि वह मीटिंग से आधा घंटा पहले ही उसके होने की घोषणा करते थे ताकि भाभा के देर से आने का बहाना न मिल पाए।"
भाभा को पांच बार भौतिकी के नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया। भाभा के जीवन की कहानी आधुनिक भारत के निर्माण की कहानी भी है।
उनको श्रद्धांजलि देते हुए जेआरडी टाटा ने कहा था, "होमी भाभा उन तीन महान हस्तियों में से एक हैं जिन्हें मुझे इस दुनिया में जानने का सौभाग्य मिला है। इनमें से एक थे जवाहरलाल नेहरू, दूसरे थे महात्मा गांधी और तीसरे थे होमी भाभा। होमी न सिर्फ एक महान गणितज्ञ और वैज्ञानिक थे बल्कि एक महान इंजीनियर, निर्माता और उद्यानकर्मी भी थे। इसके अलावा वो एक कलाकार भी थे। वास्तव में जितने भी लोगों को मैंने जाना है और उनमें ये दो लोग भी शामिल हैं जिनका मैंने जिक्र किया है, उनमें से होमी अकेले शख्स हैं। जिन्हें 'संपूर्ण इंसान' कहा जा सकता है।"
भाभा का एक कुत्ता हुआ करता था। उसके बहुत लंबे कान होते थे जिसे वो क्यूपिड कहकर पुकारते थे और रोज उसे सड़क पर घुमाने ले जाते थे। जैसे ही भाभा घर लौटते थे वो कुत्ता दौड़कर उनके पास आकर उनके पैर चाटता था। जब भाभा का एक विमान दुर्घटना में निधन हुआ तो उस कुत्ते ने पूरे एक महीने तक कुछ नहीं खाया।
रोज डॉक्टर आकर उसे दवाई देते थे लेकिन वो कुत्ता सिर्फ पानी पिया करता था और खाने को हाथ नहीं लगाता था। वो ज्यादा दिनों तक जीवित नहीं रह पाया। भाभा भी इंसान थे। हर इंसान पूरी तरह परफेक्ट नहीं होता। भाभा भी इसके अपवाद नहीं थे। उनकी सिर्फ एक कमी थी कि वो वक्त के पाबंद नहीं थे।
इंदिरा चौधरी कहतीं हैं, "हर इंसान में कुछ अच्छे गुण होते हैं तो कुछ बुरे। बहुत लोग बताते हैं कि उन्हें समय का कोई ध्यान नहीं रहता था। जो लोग उनसे मिलने का अप्वॉयमेंट लेते थे वो इंतजार करते रहते थे। यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु एजेंसी, वियना में वह कभी-कभी बैठकों में बहुत देर से आते थे। उन लोगों ने इसका इलाज ये निकाला था कि वह मीटिंग से आधा घंटा पहले ही उसके होने की घोषणा करते थे ताकि भाभा के देर से आने का बहाना न मिल पाए।"
भाभा को पांच बार भौतिकी के नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया। भाभा के जीवन की कहानी आधुनिक भारत के निर्माण की कहानी भी है।
उनको श्रद्धांजलि देते हुए जेआरडी टाटा ने कहा था, "होमी भाभा उन तीन महान हस्तियों में से एक हैं जिन्हें मुझे इस दुनिया में जानने का सौभाग्य मिला है। इनमें से एक थे जवाहरलाल नेहरू, दूसरे थे महात्मा गांधी और तीसरे थे होमी भाभा। होमी न सिर्फ एक महान गणितज्ञ और वैज्ञानिक थे बल्कि एक महान इंजीनियर, निर्माता और उद्यानकर्मी भी थे। इसके अलावा वो एक कलाकार भी थे। वास्तव में जितने भी लोगों को मैंने जाना है और उनमें ये दो लोग भी शामिल हैं जिनका मैंने जिक्र किया है, उनमें से होमी अकेले शख्स हैं। जिन्हें 'संपूर्ण इंसान' कहा जा सकता है।"