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Explainer: क्या है कफ सिरप को लेकर आया नया नियम; नई गाइडलाइन की जरूरत क्यों पड़ी?

Wed, 17 Jun 2026 06:27 PM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Wed, 17 Jun 2026 06:27 PM IST
सार

सरकार ने कफ सिरप की बिक्री के नियम सख्त कर दिए हैं। अब छोटे गांवों में भी कफ सिरप केवल लाइसेंस प्राप्त फार्मेसी से ही बेचा जा सकेगा। दूषित कफ सिरप से बच्चों की मौत के मामलों के बाद यह कदम दवाओं की गुणवत्ता, मरीजों की सुरक्षा और नियामकीय निगरानी मजबूत करने के लिए उठाया गया है। आखिर क्या है नया नियम और किन मामलों को देखते हुए इसकी जरूरत पड़ी? आइए विस्तार से जानते हैं। 

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India's New Cough Syrup Rule, What Has Changed and Why Was It Introduced?
सरकार का नया नियम - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

अगर आप खांसी की दवा लेने के लिए सीधे दुकान पर चले जाते हैं, तो अब ऐसा करना आसान नहीं होगा। केंद्र सरकार ने कफ सिरप की बिक्री को लेकर नियम सख्त कर दिए हैं। नए नियमों के तहत अब 1,000 से कम आबादी वाले गांवों में भी कफ सिरप केवल लाइसेंस प्राप्त फार्मेसी से ही बेची जा सकेगी। सरकार का कहना है कि यह कदम सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा और दवाओं की गुणवत्ता पर निगरानी मजबूत करने के लिए उठाया गया है।

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यह फैसला ऐसे समय आया है कुछ समय से भारत में बने कफ सिरप विवादों के केंद्र में रहे हैं। पिछले मध्य प्रदेश में दूषित कफ सिरप पीने के बाद कई बच्चों की मौत का मामला भी सामने आया था। आइए जानते हैं कि सरकार का नया नियम क्या है? इससे क्या बदलेगा? पहले का नियम क्या था? स्वास्थ्य विशेषज्ञों का क्या कहना है? देश में कफ सिरफ से जुड़े क्या मामले देखने को मिले? 

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सरकार की नई गाइडलाइन क्या कहती है?

सरकार ने कफ सिरप को सख्त रेगुलेटरी निगरानी में लाने के लिए कुछ नियमों में बदलाव किया है। इसका मकसद कफ सिरप समेत सिरप-बेस्ड दवाओं को सख्त रेगुलेटरी निगरानी में लाना है। 

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  • मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि पहले 1,000 से कम आबादी वाले गांवों में कुछ नियमों में छूट के साथ कफ सिरप बेचने की इजाजत थी। अब यह छूट अब नहीं मिलेगी। 
  •  छोटे गांवों में कफ सिरप की बिक्री और वितरण अब केवल ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 और उसके तहत बने नियमों के अनुसार लाइसेंस प्राप्त फार्मेसियों के माध्यम से ही किया जा सकेगा।
  • यह बदलाव आधिकारिक गजट में प्रकाशित 'ड्रग्स (पांचवां संशोधन) नियम, 2026' के माध्यम से अधिसूचित किया गया है।
  • गौरतलब है कि यह कदम सरकार द्वारा पिछले साल दिसंबर में जारी उस ड्राफ्ट नोटिफिकेशन के बाद उठाया गया है, जिसमें स्टेकहोल्डर्स से आपत्तियां और सुझाव मांगे गए थे। 
  • स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा, इस कदम से कफ सिरप के जिम्मेदार वितरण और बिक्री को बढ़ावा मिलने और देश भर में रेगुलेटरी मानकों का बेहतर पालन सुनिश्चित होने की उम्मीद है।
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क्या कहते हैं स्वास्थ्य विशेषज्ञ?

अमर उजाला से बातचीत में ग्रेटर नोएडा स्थित एक निजी अस्पताल में एमडी, इंटरनल मेडिसिन डॉ श्रेय श्रीवास्तव कहते हैं,

''मैं केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के इस फैसले का स्वागत करता हूं, जिसमें कफ सिरप को 'शेड्यूल-के' से हटा लिया गया है। इन दवाओं के लिए अब डॉक्टर का प्रिस्क्रिप्शन जरूरी होगा। इससे लोग बिना डॉक्टरी सलाह के दवा लेने से बचेंगे और दवाओं का सही व सुरक्षित इस्तेमाल बढ़ेगा। यह फैसला इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि मध्य प्रदेश और राजस्थान से ऐसी खबरें सामने आई थीं, जिसमें दूषित कफ सिरप पीने के बाद कई बच्चों की किडनी फेल होने से मौत हो गई थी। जांच में पाया गया कि इन सिरपों में 48.6% डायइथिलीन ग्लाइकोल (DEG) मिला था, जबकि इसकी सुरक्षित सीमा केवल 0.1% है। इसी तरह के मामलों में गाम्बिया में 70 और उज्बेकिस्तान में 18 बच्चों की जान जा चुकी है। ऐसे में मरीजों की सुरक्षा बढ़ाने और दवाओं की गुणवत्ता व नियमन को मजबूत करने की दिशा में यह सरकार का एक सराहनीय और स्वागतयोग्य कदम है।''

क्यों उठाया गया यह कदम? 

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार 2022 के बाद से भारत में निर्मित कफ सिरप अफ्रीका और मध्य एशिया में 140 से अधिक बच्चों की मौतों से जुड़ी पाई गई हैं, जिससे दुनिया की "फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड" के रूप में भारत की छवि को झटका लगा। अक्तूबर 2025 में मध्य प्रदेश में भी एक कथित दूषित कफ सिरप से जुड़े मामले में 20 से ज्यादा बच्चों की मौत की खबर सामने आई थी।

इन घटनाओं के बाद सरकार ने कफ सिरप निर्माण इकाइयों पर निगरानी बढ़ाई। केंद्रीय औषधि नियामक (CDSCO) के अनुसार फरवरी तक देश के करीब 90% कफ सिरप निर्माताओं का निरीक्षण किया जा चुका था और नियमों का पालन नहीं करने वाली इकाइयों के खिलाफ कार्रवाई भी की गई।

गुरुग्राम के सीके बिड़ला अस्पताल के डॉक्टर तुषार तयाल का कहना है कि भारत में बड़ी संख्या में लोग लंबे समय तक खांसी होने पर बिना डॉक्टर की सलाह के खुद ही दवा लेना शुरू कर देते हैं। उनके मुताबिक गुणवत्ता और सुरक्षा से जुड़े हालिया मामलों को देखते हुए कफ सिरप की बिक्री पर सख्त निगरानी जरूरी हो गई थी। इससे दवाओं के गलत इस्तेमाल को रोकने और मरीजों की सुरक्षा बढ़ाने में मदद मिलेगी।

मध्य प्रदेश में क्या हुआ था?

पिछले साल अक्तूबर में मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा, बैतूल और आसपास के क्षेत्रों में कई बच्चे अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। जांच में पाया गया कि जिन बच्चों ने एक विशेष कफ सिरप का सेवन किया था, उनमें तीव्र किडनी फेल्योर और मल्टी ऑर्गन फेल्योर के लक्षण विकसित हुए। बाद में जांच एजेंसियों ने पाया कि संबंधित सिरप में डायइथिलीन ग्लाइकोल (DEG) की मात्रा अत्यधिक थी। इस कप सिरफ के सेवन से 20 से अधिक बच्चों की मौत हुई थी। 

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार भारतीय अधिकारियों द्वारा कराई गई प्रयोगशाला जांच में कम-से-कम एक ब्रांडेड कफ सिरप में डायइथिलीन ग्लाइकोल (DEG) की अत्यधिक मात्रा पाई गई, जबकि कुछ अन्य सिरप के नमूनों में भी इसके अंश मिले थे। इसके बाद राज्य और केंद्रीय औषधि नियामकों ने संबंधित बैच को बाजार से वापस मंगाने (रिकॉल) का आदेश दिया और जांच पूरी होने तक संबंधित कंपनी के उत्पादन पर रोक लगा दी। मामले में आपराधिक जांच भी शुरू की गई थी।

क्या पहले भी इस तरह के मामले सामने आए?

2019-20 (जम्मू-कश्मीर): दूषित कफ सिरप पीने से कम से कम 12 बच्चों की मौत हुई।
2022 (गाम्बिया): भारतीय निर्मित कफ सिरप से जुड़े मामले में 70 बच्चों की मौत हुई।
2022-23 (उज्बेकिस्तान): भारतीय कफ सिरप के सेवन के बाद 18 बच्चों की मौत की खबर सामने आई।

क्या है डायइथिलीन ग्लाइकोल (DEG)?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, डायइथिलीन ग्लाइकोल (DEG) और एथिलीन ग्लाइकोल (EG) ऐसे औद्योगिक रसायन हैं जिनका इस्तेमाल आमतौर पर सॉल्वेंट और एंटीफ्रीज के रूप में किया जाता है। ये पदार्थ बेहद जहरीले होते हैं और थोड़ी मात्रा में भी बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं। शरीर में पहुंचने के बाद ये किडनी, लिवर और नर्वस सिस्टम को गंभीर नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे कई मामलों में मल्टी-ऑर्गन फेल्योर तक हो सकता है।

दूषित कफ सिरप त्रासदी के पीछे पांच बड़ी खामियां

ब्रिटेन स्थित सेंटर फॉर पेस्टिसाइड सुसाइड प्रिवेंशन (CPSP) की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश जैसी घटनाएं किसी एक गलती का नतीजा नहीं होतीं। रिपोर्ट में दवा निर्माण और निगरानी प्रणाली की पांच प्रमुख कमियों की पहचान की गई थी।

1. कच्चे माल में मिलावट या संदूषण
कफ सिरप बनाने में इस्तेमाल होने वाली ग्लिसरीन जैसी सामग्री यदि डायइथिलीन ग्लाइकोल (DEG) से दूषित हो या उसकी जगह घटिया पदार्थ का इस्तेमाल किया जाए, तो पूरी दवा जहरीली बन सकती है। बैच स्तर पर सख्त जांच नहीं होने पर यह खतरा और बढ़ जाता है।

2. गुणवत्ता परीक्षण में कमी
कई निर्माता कच्चे माल और तैयार उत्पादों की स्वतंत्र जांच कराने के बजाय सप्लायर के प्रमाण पत्रों पर निर्भर रहते हैं। कुछ मामलों में प्रयोगशालाओं की क्षमता या निगरानी भी पर्याप्त नहीं होती, जिससे दूषित दवाएं बाजार तक पहुंच जाती हैं।

3. नियामकीय निगरानी की कमजोरी
रिपोर्ट के मुताबिक कई देशों में दवा संबंधी कानून तो मौजूद हैं, लेकिन निरीक्षण, त्वरित लैब जांच और उत्पादों की ट्रेसेबिलिटी सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं होते। इससे नियमों का प्रभावी पालन नहीं हो पाता।

4. अनियमित वितरण व्यवस्था
जब दवाएं लाइसेंस प्राप्त फार्मेसी के बजाय गैर-नियंत्रित दुकानों या अनौपचारिक नेटवर्क के माध्यम से बेची जाती हैं, तब संदिग्ध उत्पादों को बाजार से वापस मंगाना (रिकॉल) और प्रभावित मरीजों तक पहुंचना बेहद मुश्किल हो जाता है।

5. लागत घटाने से बढ़ता है जोखिम
रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ मामलों में लागत कम करने के लिए सस्ते कच्चे माल, कमजोर गुणवत्ता नियंत्रण और अपर्याप्त परीक्षण का सहारा लिया जाता है। इससे कंपनियों का खर्च तो कम हो सकता है, लेकिन मरीजों की जान जोखिम में पड़ जाती है।

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