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भारत में कच्चे तेल का स्टोरेज, LPG का क्यों नहीं: खाना पकाने वाली गैस के भंडारण में क्या समस्या, कैसे होगा हल?
Sat, 21 Mar 2026 12:25 PM IST
Kirtivardhan Mishra
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: Kirtivardhan Mishra
Updated Sat, 21 Mar 2026 12:25 PM IST
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सार
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भारत में एलपीजी संकट के हल पर मंथन।
- फोटो :
अमर उजाला/AI
विस्तार
पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू हुए अब 20 दिन से ज्यादा हो चुके हैं। इस बीच अमेरिका-इस्राइल के ईरान पर हमलों और तेहरान की जवाबी कार्रवाई के चलते स्थितियां लगातार खराब हुई हैं। ईरान ने अपने खिलाफ छेड़े गए युद्ध के जवाब में इस्राइल से लेकर पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य ठिकानों तक को निशाना बनाया है। साथ ही खाड़ी देशों को बाहरी दुनिया से जोड़ने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य को भी बंद कर दिया है, जिससे भारत समेत पूरी दुनिया की कच्चे तेल और गैस की सप्लाई पर असर पड़ा है। भारत के लिए इस जंग में सबसे बड़ा संकट लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) का आया है। युद्ध के चलते देश की एलपीजी सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हुई है और इस गैस की आपूर्ति और मांग में अंतर बना हुआ है, जबकि सरकार का कहना है कि भारत के पास कच्चा तेल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर भारत को पश्चिम एशिया संघर्ष के बीच कच्चे तेल के मुकाबले एलपीजी की इतनी कमी क्यों हुई है? कच्चे तेल की तरह ही क्या भारत में लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस के भंडारण की सुविधा है? अगर है तो कितनी? भारत में एलपीजी सप्लाई बढ़ने के बाद भी इसका भंडारण क्यों नहीं बढ़ाया गया? एलपीजी के मौजूदा संकट के बीच भारत की आगे की क्या योजना हो सकती है? आइये जानते हैं...
ये भी पढ़ें: LPG: 'अफवाहों पर विश्वास न करें, अपने सिलिंडर की डोर स्टेप डिलिवरी का इंतजार करें'; एलपीजी संकट पर सरकार
ईरान संघर्ष के बीच भारत में एलपीजी की कमी क्यों?
भारत में कच्चे तेल के मुकाबले एलपीजी की कमी के पीछे मुख्य कारण भंडारण क्षमता, रणनीतिक भंडार की कमी और तकनीकी चुनौतियां हैं।ये भी पढ़ें: LPG: 'अफवाहों पर विश्वास न करें, अपने सिलिंडर की डोर स्टेप डिलिवरी का इंतजार करें'; एलपीजी संकट पर सरकार
- भारत ने समय के साथ अपने कच्चे तेल की खरीद के स्रोतों को बढ़ाया है। मौजूदा समय में भारत पश्चिम एशियाई देशों के साथ करीब 40 देशों से कच्चे तेल का आयात करता है।
- इसके अलावा भारत के पास कच्चे तेल की अच्छी-खासी भंडारण क्षमता है, जो कि पेट्रोल-डीजल की भंडारण क्षमता से इतर है।
- एलपीजी के लिए भारत अब तक पश्चिम एशियाई देशों पर ही निर्भर रहा है। भारत जो कुल एलपीजी आयात करता है, उसके 90% तक के लिए इसी क्षेत्र पर निर्भर है।
- एलपीजी के मामले में भारत के पास अब तक पर्याप्त भंडारण क्षमता नहीं है। देश में विदेश से निर्बाध आपूर्ति के जरिए ही अधिकतर उपभोक्ताओं को एलपीजी पहुंचाई जाती है।
भारत में एलपीजी के भंडारण की क्या और कितनी सुविधा?
भारत ने ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पाडुर में कच्चे तेल का रणनीतिक भंडार बनाए हैं। वाणिज्यिक स्टॉक और इस भंडार को मिलाकर भारत के पास कच्चे तेल के लिए लगभग 74 दिनों का कवर मौजूद है। इसके उलट एलपीजी के लिए देश में ऐसा कोई राष्ट्रीय बफर या रणनीतिक भंडार नहीं है। भारत का कुल एलपीजी भंडारण केवल कागजों पर लगभग 22 दिनों का है (जिसमें बॉटलिंग प्लांट का 4-7 दिनों का स्टॉक शामिल है), जो कि आपूर्ति रुकने की स्थिति में लंबे समय तक काम नहीं आ सकता।बिना भंडारण के भी कैसे अब तक निर्बाध रही एलपीजी सप्लाई?
भारत का 33 करोड़ घरों तक गैस पहुंचाने वाला एलपीजी वितरण तंत्र जस्ट-इन-टाइम मॉडल पर काम करता है, जो बिना रुके लगातार होने वाली आपूर्ति पर निर्भर है। भारत अपनी 60-65% एलपीजी आयात करता है, और इसका 80 से 90% हिस्सा पश्चिम एशिया के देशों, जैसे- सऊदी अरब, कतर, यूएई, आदि से होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए आता है। ऐसे में अब होर्मुज का बंद होना भारत के लिए समस्या बन गया है।
अमेरिका और इस्राइल के ईरान के साथ चल रहे संघर्ष ने इस अहम समुद्री मार्ग से होने वाली शिपिंग को बाधित कर दिया है। चूंकि एलपीजी के मामले में जहाजों का लगातार आना जरूरी है, इसलिए बीमा लागत बढ़ने, जहाजों की कतार लगने और परिवहन में देरी होने के कारण देश में एलपीजी की कमी दिखने लगी है, जबकि कच्चे तेल के बड़े बफर के कारण उस पर ऐसा तुरंत असर नहीं पड़ा है। इसी संकट को देखते हुए भारत सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम लागू कर रिफाइनरियों को आदेश दिया है कि वे अन्य पेट्रोकेमिकल उत्पादों के बजाय एलपीजी उत्पादन को अधिकतम करें।
क्यों भारत के पास एलपीजी की भंडारण सुविधा विकसित नहीं?
भौतिक, रासायनिक और तकनीकी चुनौतियां
भारत के कच्चे तेल की भंडारण क्षमता बनाने और एलपीजी के लिए ऐसी कोई सुविधा विकसित न करने की एक वजह इनसे जुड़ा विज्ञान भी है। विशेषज्ञों के मुताबिक, कच्चे तेल को प्राकृतिक या भूमिगत गुफाओं में आसानी से स्टोर किया जा सकता है। इसके उलट, एलपीजी (जो प्रोपेन और ब्यूटेन का दबाव में किया गया मिश्रण है) को स्टोर करने के लिए महंगे उच्च-दबाव या क्रायोजेनिक सुविधाओं की आवश्यकता होती है। दबाव में होने वाले बदलावों की वजह से एलपीजी काफी संवेदनशील रहती है। इसके चलते इसे जमीन में स्थित नमक की गुफाओं में भी भंडार में रखना कठिन है, क्योंकि भारी दबाव से इन गुफाओं का आकार बिगड़ने का खतरा रहता है।भारी लागत का सिरदर्द
राष्ट्रीय स्तर पर एलपीजी का रणनीतिक भंडार बनाना एक बहुत ही पूंजी-गहन इंजीनियरिंग चुनौती है। विशेष भंडारण टैंकों, पाइपलाइनों और सुरक्षा प्रणालियों पर भारी निवेश की आवश्यकता होती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, सिर्फ कुछ दिनों के बैकअप के लिए एलपीजी रिजर्व बनाने में ही कई अरब अमेरिकी डॉलर का खर्च आ सकता है। एक समर्पित एलपीजी रिजर्व स्थापित करना बफर प्रदान कर सकता है, लेकिन ऐसे भंडार महंगे हैं और केवल सीमित समय के लिए ही मांग को पूरा कर सकते हैं।"ये भी पढ़ें: क्या है भारत के एलपीजी संकट का स्वदेशी हल?: 2020 से अटकी योजना बन सकती है संजीवनी, जानें कैसे और कितने समय में
एलपीजी के मौजूदा संकट के बीच भारत की आगे की क्या योजना हो सकती है?
भारत सरकार मौजूदा एलपीजी संकट से निपटने और भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सिर्फ संकट प्रबंधन तक सीमित न रहकर संरचनात्मक और दीर्घकालिक योजनाओं पर काम कर रही है। विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं के अनुसार, भारत की आगे की रणनीति को अल्पकालिक (तीन वर्ष तक) और दीर्घकालिक (चार-15 वर्ष) दो हिस्सों में बांटा जा सकता है।अल्पकालिक योजनाएं (3 वर्ष के अंदर): आपूर्ति और बुनियादी ढांचे को मजबूत करना
आयात स्रोतों में विविधता लाने का कदम: पेशेवर सेवा फर्म ग्रांट थार्न्टन भारत में पार्टनर सौरव मित्रा के मुताबिक, सरकार होर्मुज जलडमरूमध्य और पश्चिम एशिया पर अपनी अत्यधिक निर्भरता (लगभग 90%) को घटाकर 50% तक लाने का लक्ष्य रख सकती है। इसके लिए अमेरिका, नॉर्वे, अल्जीरिया, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों से आयात बढ़ाया जा सकता है। इसी दिशा में भारत ने अमेरिका से 2.2 मिलियन टन प्रति वर्ष एलपीजी आयात करने का एक ऐतिहासिक समझौता किया है, जो देश के कुल आयात का लगभग 10% होगा।
अस्थायी भंडारण और बफर का निर्माण: विशेषज्ञ ने बताया कि सरकार आयात टर्मिनलों पर अनिवार्य रूप से बफर क्षमता (जैसे कुल क्षमता का 10%) विकसित कर 40-45 दिनों का एक अस्थायी कूटनीतिक भंडार तैयार करने पर विचार कर सकती है। इसके अलावा, बड़े पोतों का उपयोग करके समुद्र में तैरने वाले भंडारण केंद्र (फ्लोटिंग स्टोरेज) की क्षमता बढ़ाई जा सकती है।
दीर्घकालिक योजनाएं (चार-15 साल): संरचनात्मक बदलाव और आत्मनिर्भरता
- मित्रा के मुताबिक, कच्चे तेल की तर्ज पर, एलपीजी के लिए भी भूमिगत गुफाओं और बड़े रेफ्रिजरेटेड स्टोरेज बनाए जा सकते हैं, जिनमें 60-90 दिनों की खपत के बराबर एलपीजी का भंडार रखा जा सके।
- उन्होंने कहा कि देश की रिफाइनरियों में एडवांस्ड गैस रिकवरी (एजीआर) जैसी नई तकनीकों को लागू किया जा सकता है। इससे रिफाइनरी के अन्य रासायनिक प्रक्रियाओं में बर्बाद होने वाली गैस को एलपीजी के रूप में वापस प्राप्त किया जा सकेगा।
- इसके अलावा भारतीय ऊर्जा कंपनियां विदेश में एलपीजी-समृद्ध गैस परियोजनाओं में हिस्सेदारी खरीद सकती हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में उथल-पुथल के समय भी भारत के पास गैस का अपना सुरक्षित स्रोत मौजूद रहेंगे।
- विशेषज्ञों का कहना है कि रसोई गैस के रूप में एलपीजी पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने के लिए बिजली आधारित कुकिंग और पीएनजी ग्रिड का विस्तार सरकार की तरफ से शुरू किया जा चुका है।
- ग्रामीण और दुर्गम इलाकों में बायो-गैस, बायो-एलपीजी और असम जैसे क्षेत्रों में चल रहे मेथनॉल-आधारित कुकिंग प्रोजेक्ट्स को बड़े पैमाने पर लागू करने को लेकर तैयारियां की जा रही हैं।
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