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Hindi News ›   India News ›   India China Faceoff : After all, how will India be able to recover from the Chinese web

आखिर कैसे चीन के मकड़जाल से उबर पाएगा भारत?

Thu, 23 Jul 2020 04:46 AM IST
योगेश साहू शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली।
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: योगेश साहू Updated Thu, 23 Jul 2020 04:46 AM IST
सार

  • आसान नहीं है ड्रैगन से लड़ाई, भारत के चारों तरफ बना है चीन का घेरा
  • सीरिया, इराक, अफगानिस्तान में फंसी गर्दन छुड़ाने के लिए बेताब है अमेरिका

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India China Faceoff : After all, how will India be able to recover from the Chinese web
भारत चीन गतिरोध - फोटो : iStock

विस्तार

भारत से चीन की लड़ाई बहुत आसान नहीं है। सामरिक और रणनीतिक जानकारों के मुताबिक चीन ने भारत के चारों तरफ अपने पांव पसार लिए हैं, वहीं वैश्विक पटल पर बनी अमेरिका की मोनोपॉली ने पूरी जिओपॉलिटिक्स को नए डायमेंशन में उलझा दिया है। 

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पूर्व विदेश सचिव शशांक का कहना है कि अमेरिका को एशियाई देशों में अपने हथियार, माल बेचना है। अभी तक अमेरिका किसी देश के साथ युद्ध लड़ने नहीं आया है। इसलिए इसकी संभावना काफी कम है कि सीरिया, इराक, अफगानिस्तान से अपनी गर्दन छुड़ाकर भागने को आतुर अमेरिका लद्दाख में पैर फंसाने आएगा। दूसरे अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव में कदाचित डेमोक्रेट आ गए तो अमेरिका फिर अपने नजरिए में बड़ा बदलाव ला सकता है।
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लद्दाख में सर्दी आने तक बढ़ जाएगी चुनौती
सैन्य विशेषज्ञों का मानना है एलओसी (पाकिस्तान से लगती नियंत्रण रेखा) और एलएसी (चीन से लगती वास्तविक नियंत्रण रेखा) पर लगातार सैन्य तैनाती बनाए रखना बहुत आसान नहीं है। एयर वाइस मार्शल (पूर्व) एनबी सिंह का कहना है सर्दी में हॉट स्प्रिंग, गलवां, गोगरा पोस्ट, डेपसांग, पैंगोंग क्षेत्र में तापमान माइनस से काफी नीचे जाता है। 
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इसे ध्यान में रखते हुए भारतीय सेना ने इन क्षेत्रों में जवानों के लिए बंकर, स्थाई संरचना आदि भी नहीं खड़ी की हैं। जबकि हालात सियाचिन, बेस कैंप थ्वाइस जैसे ही पैदा हो जाएंगे। इन हालात में बड़ी संख्या में सैन्य तैनाती के लिए गुणवत्ता वाले तंबू, चश्मे, जूते, हैलमेट, वर्दी आदि चाहिए। सैन्य बलों को रसद सामग्री की आपूर्ति भी बड़ी चुनौती रहेगी। इसलिए भारत-चीन के बीच में सर्दी से पहले तनाव खत्म हो जाए तो अच्छा है।

पांच राफेल, आकाश मिसाइल, 29के मिग से क्या होगा?

सैन्य सूत्रों का कहना है भारत और चीन के बीच में जिस तरह के तनाव की स्थिति बन रही है, उसमें पांच राफेल को अंबाला या पास के एयरफोर्स स्टेशन में तैनात करने से क्या होगा? आकाश मिसाइल प्रणाली या मिग 29के आदि सब केवल रक्षात्मक भूमिका में रहेंगे।

रक्षा संवाददाता रंजीत कुमार का भी कहना है कि चीन की सैन्य ताकत को कमतर नहीं आंकना चाहिए। चीन के पास पांचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमान, छोटी से लेकर लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलें, रूस से आयातित एस-400 ट्रायम्फ प्रतिरोधी वायु रक्षा प्रणाली आदि हैं।

एयर वाइस मार्शल (पूर्व) एनबी सिंह का कहना है हमारे पास आतंकवाद विरोधी कार्रवाई, तीन-चार युद्ध का अनुभव है, लेकिन मिलिट्री हार्डवेयर के मामले में चीन कमजोर नहीं है। इसलिए तीनों सेनाएं, रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और प्रधानमंत्री सभी को सही स्थिति का एहसास है।

यह सबको पता है कि चीन की सेना को पीछे धकेलने के लिए बड़े पैमाने पर संसाधन की जरूरत पड़ेगी। पूर्व विदेश सचिव शशांक तो कहते हैं कि इसके लिए अमेरिका, इस्राइल या इस स्तर के किसी देश के साथ की भी जरूरत पड़ेगी। दूसरे सैन्य टकराव की स्थिति में यदि पाकिस्तान और नेपाल की तरफ से मोर्चा खुल गया तो यह भी बड़ी चुनौती से कम नहीं होगा।

चीन लगातार दे रहा बड़े खतरे का संकेत

भारत के चारों ओर चीन का घेरा लगातार बढ़ रहा है। भारतीय अर्थव्यवस्था में भी चीन ने बड़ी पैठ बनाई है। पूर्व विदेश सचिव शशांक कहते हैं नेपाल, पाकिस्तान इस समय चीन के बड़े पक्षधर हैं। पाक अब अमेरिका पर बहुत निर्भर नहीं है। उसने चीन से संबंध प्रगाढ़ कर लिए हैं।

चीन को भी लगता है भारत और अफगानिस्तान में उसके हितों को पूरा करने में पाकिस्तान मददगार हो सकता है। श्रीलंका में हंबनटोटा पोर्ट पर चीन की कंपनियों की मौजूदगी लगातार बढ़ रही है। चीन ने म्यांमार में पैठ बढ़ाई है।

अभी तक पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह तक चीन पकड़ बना रहा था, लेकिन जिस तरह से ईरान के साथ उसने कदम बढ़ाए हैं, उससे साफ है चाबहार में मजबूत पकड़ बनाकर वह रेल नेटवर्क में भागीदार बन जाएगा। इस तरह चीन के लिए मलक्का जल डमरू क्षेत्र, मध्य एशिया तक सीधी पहुंच और व्यापारिक रूट पर निगरानी रखने की स्थिति मजबूत हो जाएगी।

पूर्व विदेश सचिव मानते हैं कि जिस तरह से चीन ने बांग्लादेश, भूटान समेत अन्य की तरफ अपना ध्यान दिया है। भूटान के साथ सीमा विवाद निबटाने में लगा है और पड़ोसी देश बांग्लादेश के चटगांव पर उसकी नजर है। शशांक कहते हैं कि बांग्लादेश में जब तक शेख हसीना हैं, तब तक सब ठीक है, लेकिन इसके बाद की भी सोचना होगा। क्योंकि चीन बड़े खतरे का लगातार संकेत दे रहा है।

रूस की निगाह चीन, तुर्की, ईरान, सीरिया पर टिकी

विदेश मामलों के जानकार कहते हैं राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की अगुआई में विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव लगातार रोड-मैप तैयार करने में लगे हैं। पिछले कुछ सालों में चीन और रूस की प्रगाढ़ता, समझ बढ़ी है। रूस ने सीरिया, ईरान में अपनी स्थिति ठीक की है।

वह तुर्की के बंदरगाह तक अपने ठिकाने का रोड-मैप तैयार कर रहा है। तुर्की का झुकाव भी उसकी तरफ है। चीन दुनिया में अपना माल बेचने और बाजार को लेकर ज्यादा गंभीरता से काम करता रहा है। इधर, अमेरिका के साथ बढ़ते रिश्ते के फेर में ईरान जैसे देश अब भारतीय हितों से कुछ-कुछ मुंह फेरने लगे हैं।

इसका एक बड़ा कारण अमेरिका, उसके द्वारा ईरान के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध का लगाया जाना है। इससे भारत की मध्य एशिया की नीति प्रभावित हो रही है। दूसरी तरफ चीन इसका फायदा उठा रहा है।

अमेरिका में बिडेन राष्ट्रपति बन गए तो?

अमेरिका में नवंबर में राष्ट्रपति चुनाव है। डेमोक्रेट उम्मीदवार अभी सर्वे में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर भारी पड़ रहे हैं। पूर्व विदेश सचिव शशांक और एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह अमेरिका में सत्ता के इस बदलाव को काफी अहम मान रहे हैं।

दोनों का मानना है अमेरिका में रिपब्लिकन के हाथ से डेमोक्रेट बिडेन के पास सत्ता जाने के बाद एक बार फिर कई नए समीकरण बनेंगे, पुराने कुछ बिगड़ेंगे। इस पर पूरी दुनिया की निगाहें हैं, इसलिए आने वाला समय जटिल हो सकता है।

अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत का गठजोड़ जरूरी

भारतीय रणनीतिकारों का मानना है बदलती परिस्थिति में अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत का क्वाड्रीलैट्रल फोरम मजबूत होना जरूरी है। हालांकि रणनीतिकारों का एक धड़ा मानता है कि अमेरिका, यूरोप जैसे देश अपने हथियारों के सौदे और बाजार पर ज्यादा केंद्रित रहते हैं।

इसलिए यह उनके हित में रहता है कि भारत जैसे देश का पाकिस्तान या चीन से तनाव बने रहे। ऐसे में भारत को उनके मिलिट्री हार्डवेयर की काफी जरूरत पड़ेगी। पिछले दो दशक से तस्वीर बदली है। इसके पहले भारत के रक्षा बाजार का सबसे ज्यादा फायदा रूस को मिल रहा था। अभी भी तीनों भारतीय सेनाओं के पास 60 प्रतिशत से अधिक मिलिट्री हार्डवेयर रूस से आयातित ही है।

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