आजादी के 60 साल बाद भी नहीं बदला ये गांव, बाल विवाह को तैयार हैं कई नाबालिग
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हिंदू विवाह अधिनियम 1956 द्वारा बाल विवाह को गैरकानूनी करार दिए हुए 60 साल हो गए, लेकिन संभल तहसील के भूड़ इलाके के गांवों में अभी भी पांचवीं-आठवीं में पढ़ने वाले बच्चों की शादियां करा दी जाती हैं। हर साल 10-15 बाल विवाह होते हैं। इस साल भी कुछ नाबालिकों की शादियां तय हैं। तैयारी चल रही है। लगन खुलने का इंतजार है।
हैरत की बात यह है कि इस गैरकानूनी शादियों में मां-बाप, बड़े-बुजुर्गों सभी की सहमति होती है। कोई विरोध नहीं करता। ग्रामीण बताते हैं यहां तो यही परंपरा है, जब रिश्ता मिल जाए तब शादी कर लो। उम्र कितनी है इस पर यहां ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता। हाल के वर्षों में सिर्फ इतना फर्क आया है कि पहले जहां 10-12 वर्ष की आयु में विवाह हो जाया करते थे अब 14-16 वर्ष की उम्र में विवाह हो रहे हैं। केशोपुर भंडी में बीते साल चार बाल विवाह हुए हैं।
पहली कशोपुर भंडी के 14 वर्ष के एक किशोर की इसी वर्ष शादी हुई है। शादी में बड़े बुजुर्ग बाराती थे पर किसी ने कोई आपत्ति नहीं की। क्योंकि इसे गांव वाले परंपरा मानते हैं। दूसरी केशोपुर भंडी में 17 वर्ष की उम्र में एक किशोर का हाल में ही रिश्ता तय किया गया है। इसमें लड़की वाले ने दहेज में बाइक पहले ही दी है। शादी गंगा स्नान के बाद होगी। इसमें लड़का और लड़की दोनों ही नाबालिग हैं।तीसरी अझरा गांव में 16 वर्ष के लड़के की शादी 15 वर्ष की लड़की से शादी हुई।
गांव के 200-250 लोग शादी में शरीक हुए। शादी क्यों हुई? इस सवाल पर गांव वालों ने बताया कि एक व्यक्ति की पत्नी का अचानक देहांत हो गया। उसने बेटे की शादी करके घरेलू काम के लिए बहू बुला ली। इसके बाद अझरा गांव में हाल में ही 14 वर्ष की लड़की और 16 वर्ष के लड़के की शादी हुई है। क्योंकि चार बेटियां थीं। पिता चाहते थे कि जल्दी से जल्दी सबकी शादी हो जाए। इसलिए उन्होंने उम्र के बारे में कोई ध्यान नहीं दिया। यह भी पता लगा है कि चारों की चार बेटियां अनपढ़ हैं। जबकि हिंदू विवाह अधिनियम 1956 के अनुसार वर की उम्र कम से कम 21 और वधू की 18 साल होनी चाहिए।
बाल विवाह के ये हैं कारण
जिन गांवों में बाल विवाह के मामले सामने आ रहे हैं, वहां आमतौर पर लोगों का पढ़ाई लिखाई के प्रति रूझान नहीं है। केशोपुर भंडी में चार और अझरा में दो बाल विवाह इसी वर्ष हुए हैं। तीन हजार की आबादी वाले केशोपुर गांव में शिक्षा का स्तर कैसा रहा है इसको सिर्फ इतने से समझ सकते हैं कि गांव में कोई भी सरकारी नौकरी में नहीं है।
एक शिक्षामित्र कमल सिंह को शिक्षक पद पर समायोजित किया गया है। आठवीं कक्षा के बाद यहां बेटियों को पढ़ाने में कोई रुचि नहीं है। अशिक्षा के चलते बाल विवाह अधिक होते हैं। दूसरी वजह गरीबी की है। वहीं गांव की महिलाओं से जब बाल विवाह के संबंध में बातचीत की गई तो उनका कहना था कि जमाना बदल गया है।
अब शादी ब्याह की बातें बच्चे 12-14 वर्ष में ही जानने लगते हैं। बच्चों के बिगड़ने का अंदेशा रहता है, इसलिए जितनी जल्दी शादी हो जाए उतना ही अच्छा है। गांव के लोगों ने बताया कि यदि एक वर्ष के अंदर हुई शादियों का रिकार्ड निकलवा लिया जाए तो 18 वर्ष और 21 वर्ष की उम्र का मानक कम ही शादियों में पूरा हुआ होगा।