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Explainer: ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट से कैसे बदलेगा समुद्री अर्थशास्त्र, इस परियोजना का क्यों हो रहा विरोध?

Mon, 22 Jun 2026 07:08 PM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Mon, 22 Jun 2026 07:08 PM IST
सार

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट भारत की समुद्री ताकत, व्यापारिक महत्वाकांक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने की एक बड़ी योजना है। सरकार इसे हिंद महासागर में भारत की रणनीतिक स्थिति मजबूत करने और चीन की बढ़ती मौजूदगी का जवाब मान रही है। वहीं विपक्ष और पर्यावरणविदों का कहना है कि इस विकास की कीमत जंगलों, कोरल रीफ और आदिवासी समुदायों को चुकानी पड़ सकती है। आइए जानते हैं कि सरकार और विपक्ष इसे लेकर क्या-क्या दावें कर रही हैं।

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How Will the Great Nicobar Project Reshape Maritime Economics, and Why Is It Facing Opposition?
ग्रेट निकोबार परियोजना - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

भारत सरकार जिस ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को 21वीं सदी का सबसे बड़ा द्वीपीय इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट बता रही है, उसे लेकर पर्यावरणविदों, आदिवासी अधिकार समूहों और विपक्षी दलों ने सवाल खड़े किए हैं। सरकार इसे राष्ट्रीय सुरक्षा, समुद्री व्यापार और आर्थिक विकास के लिए जरूरी बता रही है, जबकि आलोचकों का कहना है कि यह प्रोजेक्ट पर्यावरण और आदिवासी समुदायों पर भारी पड़ सकता है।

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आइए जानते हैं कि क्या है ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट? सरकार इसे लेकर क्या दावा कर रही है? विपक्ष क्यों विरोध कर रहा है? राहुल गांधी ने सरकार पर क्या आरोप लगाए? क्या यह प्रोजेक्ट वास्तव में हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव का जवाब है? म्यांमार के 'कोको द्वीप' से इस प्रोजेक्ट का क्या कनेक्शन है? 

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ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट क्या है?

भारत सरकार 'द्वीपों के समग्र विकास' कार्यक्रम के तहत ग्रेट निकोबार द्वीप को एक वैश्विक समुद्री और व्यापारिक हब में बदलना चाहती है। इस मेगा-प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत करीब 72,000 करोड़ से 82,000 करोड़ रुपये है और इसे 166.10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र (द्वीप का करीब 16% हिस्सा) में विकसित किया जाएगा। कुछ अनुमानों के अनुसार इसकी लागत 92,000 करोड़ रुपये तक जा सकती है।

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इसमें मुख्य रूप से चार बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर बनाए जाएंगे:

  • कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT): गैलाथिया बे में 14.2 मिलियन TEU क्षमता का एक विशाल अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह बनेगा।
  • ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट: सैन्य और नागरिक उपयोग के लिए एक नया हवाई अड्डा बनेगा, जिसकी क्षमता सालाना 1 करोड़ यात्रियों को संभालने की होगी। 
  • पावर प्लांट: 450 एमवीए क्षमता का गैस और सौर ऊर्जा संयंत्र लगाया जाएगा।
  • इंटीग्रेटेड टाउनशिप: एक नया शहर बसाया जाएगा, जहां भविष्य में 3.36 लाख से 6.5 लाख लोगों को बसाने की योजना है।




यह प्रोजेक्ट भारत के लिए क्यों है अहम? 

सरकार के अनुसार भारत के पास बड़े जहाजों के लिए पर्याप्त गहरे पानी वाले बंदरगाह नहीं हैं। इसकी वजह से भारतीय कार्गो का बड़ा हिस्सा कोलंबो, सिंगापुर और क्लैंग जैसे विदेशी बंदरगाहों के जरिए ट्रांसशिपमेंट होता है, जिससे भारत को राजस्व का नुकसान उठाना पड़ता है। सरकार ने यह भी बताया है कि म्यांमार, चीन और श्रीलंका पहले से ही गहरे पानी वाले बंदरगाह विकसित कर रहे हैं ताकि इस समुद्री व्यापार को अपनी ओर आकर्षित किया जा सके।

यहीं से इस परियोजना का चीन एंगल सामने आता है। सरकार का तर्क है कि अगर भारत ने समय रहते अपनी ट्रांसशिपमेंट क्षमता विकसित नहीं की तो क्षेत्रीय समुद्री व्यापार में उसकी हिस्सेदारी सीमित रह सकती है। ग्रेट निकोबार में प्रस्तावित इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT) को इसी चुनौती का जवाब माना जा रहा है।

क्यों है इस द्वीप की भौगोलिक स्थिति अहम?

गैलेथिया बे में बनने वाला यह पोर्ट दुनिया के प्रमुख ईस्ट-वेस्ट अंतरराष्ट्रीय शिपिंग रूट से केवल 40 नॉटिकल मील की दूरी पर स्थित है और यहां 20 मीटर से अधिक प्राकृतिक गहराई उपलब्ध है। यही वजह है कि इसे ट्रांसशिपमेंट और गेटवे कार्गो आकर्षित करने के लिए रणनीतिक रूप से उपयुक्त माना गया है।

सरकार का दावा है कि यह परियोजना भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, सामरिक और रक्षा उपस्थिति को मजबूत करेगी, द्वीपों की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाएगी और क्षेत्र के समग्र विकास को गति देगी। बंदरगाह का विकास केवल आर्थिक उद्देश्य नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक जरूरतों से भी जुड़ा हुआ है।

चीन की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' नीति क्या है?

भारत की इस आक्रामक सामरिक नीति के पीछे चीन की बढ़ती घेराबंदी मुख्य कारण है। चीन लंबे समय से भारत को घेरने के लिए 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' रणनीति पर काम कर रहा है, जिसके तहत वह श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों में बंदरगाह बना रहा है।  इसके तहत चीन ने भारत के आसपास कई बंदरगाहों और समुद्री सुविधाओं में निवेश किया है। इनमें शामिल है...

  • पाकिस्तान में ग्वादर पोर्ट
  • श्रीलंका में हंबनटोटा पोर्ट
  • म्यांमार में क्याउकफ्यू पोर्ट
  • जिबूती में सैन्य अड्डा

म्यांमार के 'कोको द्वीप' से इस प्रोजेक्ट का क्या कनेक्शन है?

भारत के लिए सबसे तत्काल खतरा म्यांमार का 'ग्रेट कोको द्वीप' है, जो भारत के उत्तरी लैंडफॉल द्वीप से मात्र 35 किमी दूर है। सैटेलाइट इमेजरी से यह खुलासा हुआ है कि चीन की मदद से म्यांमार ने वहां अपना सैन्यीकरण तेज कर दिया है, रनवे को 2,300 मीटर तक बढ़ा लिया है और नए रडार स्टेशन स्थापित कर लिए हैं। इससे चीन बंगाल की खाड़ी में भारतीय नौसेना पर आसानी से नजर रख सकता है। इसी खतरे को बेअसर करने के लिए ग्रेट निकोबार को भारत के 'रिवर्स पर्ल' के रूप में विकसित किया जा रहा है, ताकि अंडमान सागर और 'मलक्का जलडमरूमध्य' के पास भारतीय नौसेना की मजबूत उपस्थिति दर्ज की जा सके।

मलक्का जलडमरूमध्य वैश्विक व्यापार के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन चीन के लिए इसकी अहमियत और भी ज्यादा है। चीन अपने कच्चे तेल के लगभग 80 प्रतिशत आयात और अपने कुल व्यापार के करीब दो-तिहाई हिस्से के लिए इसी समुद्री मार्ग पर निर्भर है। 

इस प्रोजेक्ट को लेकर क्या विवाद है?

ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना को लेकर कांग्रेस लगातार सवाल उठा रही है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने केंद्रीय बंदरगाह, पोत परिवहन एवं जलमार्ग मंत्री सर्वानंद सोनोवाल को पत्र लिखा है। इस पत्र में जयराम रमेश ने परियोजना के तहत बनने वाले ट्रांसशिपमेंट पोर्ट के विकास को लेकर कई स्पष्टीकरण मांगे हैं। उन्होंने यह भी पूछा कि परियोजना में निजी क्षेत्र की न्यूनतम हिस्सेदारी 55 प्रतिशत निर्धारित की गई है, तो क्या 100 प्रतिशत निजी स्वामित्व की अनुमति होगी, या फिर सार्वजनिक संस्थाओं के लिए भी न्यूनतम हिस्सेदारी तय की गई है? 

राहुल गांधी ने कोरल रीफ को लेकर क्या दावा किया?

राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी का दावा है कि परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए आधिकारिक मानचित्रों में ऐसे बदलाव किए गए, जिनसे पर्यावरणीय नियमों की बाधाएं कम होती दिखाई देती हैं। कांग्रेस के अनुसार, 2020 के आधिकारिक मानचित्र में ग्रेट निकोबार द्वीप के दक्षिणी और पश्चिमी तटीय क्षेत्रों, खासकर गैलेथिया बे, के आसपास व्यापक प्रवाल भित्तियां (कोरल रीफ) दर्ज थीं। इसी क्षेत्र में प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल विकसित किया जाना है। पार्टी का आरोप है कि 2021 में जारी संशोधित मानचित्र में इन प्रवाल भित्तियों को समुद्र के दूसरे हिस्से में दिखाया गया, जहां उनका प्राकृतिक रूप से मौजूद होना संभव नहीं माना जाता। कांग्रेस का कहना है कि इस बदलाव ने परियोजना के लिए रास्ता आसान बना दिया।

कांग्रेस ने यह भी दावा किया है कि 2020 के मानचित्र में लगभग पूरा द्वीप CRZ-IA (कोस्टल रेगुलेशन जोन-IA) श्रेणी में था, जहां बंदरगाह जैसे बड़े निर्माण कार्यों पर कड़े प्रतिबंध लागू होते हैं। लेकिन 2021 के संशोधित मानचित्र में गैलेथिया बे को इस श्रेणी से बाहर दिखाया गया। पार्टी का आरोप है कि इस पुनर्वर्गीकरण के जरिए परियोजना को नियामकीय मंजूरी दिलाने का मार्ग प्रशस्त किया गया।

कांग्रेस का कहना है कि यह कोई सामान्य पारिस्थितिकीय या वैज्ञानिक अपडेट नहीं था, बल्कि पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को दरकिनार करने के लिए किया गया प्रशासनिक बदलाव था। पार्टी ने आरोप लगाया है कि जब पर्यावरणीय वास्तविकताएं परियोजना के रास्ते में बाधा बनीं, तो उन्हें दस्तावेजों में ही बदल दिया गया।

विपक्ष और पर्यावरणविद क्यों कर रहे विरोध?


1. जंगलों की कटाई
प्रोजेक्ट के लिए लगभग 49.86 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र का उपयोग किया जाएगा। दस्तावेज के अनुसार इस क्षेत्र में लगभग 18.65 लाख पेड़ हैं, जिनमें से अधिकतम 7.11 लाख पेड़ काटे जा सकते हैं।

विपक्ष और पर्यावरण समूहों का तर्क है कि ग्रेट निकोबार दुनिया के सबसे संवेदनशील जैव विविधता क्षेत्रों में से एक है। इतने बड़े पैमाने पर वन कटाई से दुर्लभ प्रजातियों और पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंच सकता है।

2. आदिवासी समुदायों पर खतरे की आशंका
ग्रेट निकोबार में मुख्य रूप से दो आदिवासी समुदाय रहते हैं:

  • शोम्पेन
  • निकोबारी

सरकार का दावा है कि किसी भी आदिवासी समुदाय को विस्थापित नहीं किया जाएगा और ट्राइबल रिजर्व क्षेत्र में कुल मिलाकर 3.9 वर्ग किलोमीटर की शुद्ध बढ़ोतरी होगी। लेकिन आलोचकों का कहना है कि भले ही प्रत्यक्ष विस्थापन न हो, लेकिन बड़े पैमाने पर निर्माण, बाहरी आबादी का आगमन और शहरीकरण इन समुदायों की जीवनशैली और सांस्कृतिक पहचान को प्रभावित कर सकता है।

3. भूकंप और सुनामी का खतरा
2004 की विनाशकारी हिंद महासागर सुनामी का केंद्र इसी क्षेत्र के आसपास था। ग्रेट निकोबार भूकंप और चक्रवात की दृष्टि से अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है। सरकार ने इसके लिए विशेष जोखिम मूल्यांकन और आपदा प्रबंधन योजना तैयार की है। फिर भी आलोचक सवाल उठा रहे हैं कि क्या इतने बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश के लिए यह स्थान सुरक्षित है।

सरकार इस प्रोजेक्ट को लेकर क्या-क्या दावे कर रही हैं?

सरकार का कहना है कि:

  • प्रोजेक्ट को EIA 2006 के तहत पर्यावरणीय मंजूरी मिली है।
  • 42 विशेष पर्यावरणीय शर्तें लागू की गई हैं।
  • प्रदूषण, जैव विविधता और आदिवासी कल्याण की निगरानी के लिए अलग-अलग समितियां बनाई गई हैं।
  • भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII), जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ZSI) समेत कई संस्थानों ने अध्ययन किया है।
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