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4 Years of Galwan: चीन ने बार-बार तोड़ा देश का भरोसा, अब प्रोपेगेंडा फैला कर सेना के मनोबल को तोड़ने की साजिश

Sat, 15 Jun 2024 04:54 AM IST
Harendra Chaudhary हरेंद्र चौधरी
Updated Sat, 15 Jun 2024 04:54 AM IST
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सार
4 Years of Galwan: पूर्वी लद्दाख में भारत-चीन के बीच हुए खूनी संघर्ष को चार साल पूरे हो रहे हैं। गलवान झड़प में सबसे बड़ा नुकसान भरोसे का हुआ है। जिसे 1962 में चीन के साथ युद्ध के बाद दोबारा हासिल करने में दशकों लग गए थे।
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How much has the situation changed after four years of India-China Galwan conflict
गलवान संघर्ष के चार साल - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

15 जून 2020 को पूर्वी लद्दाख में भारत-चीन के बीच हुए खूनी संघर्ष को चार साल पूरे हो रहे हैं। दोनों देशों के बीच रिश्ते तनावपूर्ण बने हुए हैं। दोनों देशों के बीच गतिरोध कितने गहरे स्तर पर पहुंच चुका है इसका अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि नरेंद्र मोदी ने जब अपने तीसरे कार्यकाल के लिए शपथ ग्रहण ली, तो पुतिन-बाइडन समेत दुनियाभर के राष्ट्राध्यक्षों ने उन्हें बधाई दी, लेकिन चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बधाई तक नहीं दी। वहीं मोदी 2.0 से शुरू हुआ यह गतिरोध मोदी 3.0 में भी जारी रहने वाला है, क्योंकि चीन किसी भी हालत में एलएसी पर अप्रैल 2020 से पहले वाली स्थिति पर लौटने के लिए तैयार नहीं है, जिसकी भारत हमेशा से ही मांग करता रहा है। 



चीन ने भरोसा तोड़ा
सेना से रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल वीआर भूषण का मानना है कि गलवान झड़प में सबसे बड़ा नुकसान भरोसे का हुआ है। जिसे 1962 में चीन के साथ युद्ध के बाद दोबारा हासिल करने में दशकों लग गए थे। डोकलाम में भी 73 दिनों के गतिरोध के बाद हालात सामान्य हो गए थे और संबंध पटरी पर आ गए थे। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भारत दौरे भी उसके बाद खूब हुए। लगा कि अब दोनों देश मिल कर संबंध बहाली पर काम करेंगे और आर्थिक तौर पर मजबूत होंगे। लेकिन 2020 की गर्मियों में हुई उस झड़प के बाद से भारत और चीन के बीच कम से कम 21 दौर की कमांडर स्तर की वार्ता और 13 दौर की विदेश स्तर की वार्ताएं हो चुकी हैं। जिसके बाद पांच टकराव बिंदुओं पर सैनिकों की वापसी संभव हो पाई, जिनमें पैंगोंग त्सो के उत्तरी और दक्षिणी किनारे, गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स क्षेत्र में पेट्रोलिंग पॉइंट्स 15 और 17ए, और गलवान घाटी। लेकिन दो अहम जगहों को लेकर अभी भी गतिरोध बरकार है। इनमें देपसांग प्लेंस या देपसांग मैदानी क्षेत्र भी शामिल है, जिसके उत्तर में भारत का एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड (एएलजी) दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) स्थित है। इसके अलावा आईपीएस पीडी नित्या की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत पूर्वी लद्दाख में 65 पेट्रोलिंग प्वाइंट्स में से 26 गंवा चुका है। हालांकि हर वार्ता के बाद चीन के जो भी बयान आए वे झूठे ही साबित हुए, जिनमें वह दोनों देशों के बीच संबंध 'सामान्य' बनाने की बात करता था। 


सेनाएं गलवान में सामान्य बेस पोजीशन से आगे 
देश के विदेश मंत्री एस जयशंकर के मुताबिक 1962 की जंग के बाद 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने चीन की यात्रा की। इसका उद्देश्य स्पष्ट था कि चीन और भारत संबंधों को सामान्य बनाएंगे। यात्रा का उद्देश्य सीमा विवादों पर चर्चा करने के साथ-साथ सीमा पर शांति बनाए रखना था। लेकिन 2020 में चीनियों ने इस समझौते को तोड़ दिया। भारत कोविड-19 लॉकडाउन में था, ऐसे समय पर चीन ने सीमा पर बड़ी संख्या में सेना तैनात कर दी। जिसके बाद भारत ने भी चीन की तैनाती का कड़ा जवाब दिया। पिछले चार साल से सेनाएं गलवान में सामान्य बेस पोजीशन से आगे तैनात हैं। एलएसी पर यह तैनाती असामान्य है। तनाव को देखते हुए, भारतीय नागरिक के रूप में हमें देश की सुरक्षा की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। चीन के साथ संघर्ष आर्थिक चुनौती भी है। 

भारत-चीन के बीच युद्ध का खतरा
हाल ही में रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट (RUSI) ने एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें कहा गया था कि पूर्वी लद्दाख में दूसरे भारत-चीन युद्ध का खतरा मंडरा रहा है, और उनका अनुमान है कि 2025 से 2030 के बीच कभी भी यह संघर्ष छिड़ सकता है। इंटरनेशनल पॉलिटिकल रिस्क एनालिटिक्स के संस्थापक और अध्यक्ष, लेखक समीर टाटा के मुताबिक, "पूर्वी लद्दाख ही एकमात्र ऐसी जगह है, जहां से चीन के काशगर पर हमला किया जा सकता है। यह चीन के पश्चिमी प्रांत शिनजियांग में स्थित महत्वपूर्ण ऊर्जा केंद्र है। चीन की ऊर्जा सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण स्तंभ ईरान के तेल और गैस क्षेत्रों को काशगर से जोड़ने वाली योजनाबद्ध भूमि-आधारित पाइपलाइन है, जो चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) के माध्यम से पाकिस्तान से होकर गुजरती है।"

पूर्व प्रमुख जनरल नरवणे बोले- चीन के लिए सीपीईसी जरूरी 
भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख जनरल एमएम नरवणे ने भी एक साक्षात्कार में माना था कि पूर्वी लद्दाख और काराकोरम दर्रा चीन की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा हैं क्योंकि वे उनके सीपीईसी प्रोजेक्ट के लिए महत्वपूर्ण हैं। "लेकिन अगर चीनियों को लगता है कि हम सीपीईसी या पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर या तिब्बत में उन्हें काटने की स्थिति में हैं, तो यह 1962 (भारत और चीन के बीच पहले युद्ध का वर्ष) के बाद से एक बड़ा बदलाव है।"

माउंटेन वारफेयर में कोई छोटा-बड़ा नहीं
जनरल नरवणे ने दावा किया कि गलवान में हुई झड़प दोनों देशों के बीच एक महत्वपूर्ण घटना साबित हुई। उन्होंने कहा कि गलवान में हुई झड़पों के साथ ही भारत ने अपनी झिझक छोड़ दी और अब भारत के नेतृत्व, चीन के लिए इधर-उधर के शब्दों का इस्तेमाल करने के बजाय उसका नाम लेकर उसका उल्लेख करते हैं। वह कहते हैं, 2020 की संघर्ष के बाद पूर्वी लद्दाख में बड़े पैमाने पर सेना की तैनाती की गई। हम भी उतने ही मजबूत हैं। वहीं भारत-चीन को सीधे टक्कर दे रहा है। माउंटेन वारफेयर में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता। वह आगे कहते हैं कि सच तो यह है कि गलवान में हालात स्थिर हैं। चीनी उस क्षेत्र में कुछ नहीं कर सकते, क्योंकि वहां भारतीय सेना की तादाद बहुत अधिक है। न केवल थल सेना बल्कि वायु सेना को भी वहां डिप्लॉय किया गया है। वहां बहुत सारे सर्विलांस सिस्टम लगाई गए हैं, इसलिए वहां अब चीन, भारत को पीछे धकलने के बारे में सोच भी नहीं सकता। 

चीन ने शुरू की प्रोपेगेंडा वार
वहीं गलवान संघर्ष के बाद एक नई चीज देखने को मिली, जो उससे पहले नहीं होती थी। चीन ने प्रोपेगेंडा वार शुरू कर दी। यहां तक कि गलवान संघर्ष में मारे गए चीनी सैनिकों की मौत को लेकर भी झूठ बोला। सोशल मीडिया पर चीन ने यह नैरेटिव फैलाया कि इस संघर्ष में उसके केवल पांच सैनिक मारे गए, जबकि हकीकत में उसके 40 सैनिकों की मौत हुई थी। यहां तक कि ऑस्ट्रेलियाई मीडिया ने भी इसकी पुष्टि की थी। गलवान के बाद से चीन ने सरकारी मीडिया सहित पूरा प्रचार तंत्र खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करने में झोंक रखा है। 

प्रोपेगेंडा फैला कर भारत को कमजोर करने की साजिश
सेना से रिटायर्ड कर्नल अनुपम बताते हैं कि चीन की इस प्रोपेगेंडा वार का उद्देश्य भारतीय मनोबल को कमजोर करना है। चीन एक मनोवैज्ञानिक युद्ध लड़ रहा है, जो बॉर्डर पर नहीं बल्कि सोशल मीडिया के माध्यम से लड़ा जा रहा है। वह भारत सेना के फैसलों पर दबाव डालना चाहता है औ उनमें व्यवधान पैदा करना चाहता है। वह आगे कहते हैं कि जवाब में, भारत ने अपनी सुरक्षा को मजबूत करने के लिए कई रणनीतिक उपाय किए। इसमें रक्षा खर्च में बढ़ोतरी, एडवांस हथियारों की खरीद में तेजी और निगरानी क्षमताओं में वृद्धि शामिल थी। भारत ने अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के साथ गठबंधन को मजबूत करने की भी कोशिश की। अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिल कर क्वॉड बनाया, जो उसकी बदलती रणनीति का संकेत देता है।  

चीन को भी झेलना पड़ा नुकसान
रिटायर्ड मेजर जनरल डीपी सिंह कहते हैं, गलवान के बाद से चीन ने सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक रूप से बहुत कुछ खो दिया है। दूसरी ओर, इसने भारत को प्रतिरोध को मजबूत करने के लिए प्रेरित किया। सैन्य रूप से, 43 सैनिकों की जान गंवाने के अलावा, चीन को उनके परिवारों के गुस्से का सामना करना पड़ा। साथ, ही पीएलए को एलएसी पर स्थायी रूप से 50,000 अतिरिक्त सैनिकों को तैनात करने के लिए मजबूर होना पड़ा, जो पिछले 60 वर्षों में नहीं हुआ था। चीन को सुपर हाई एल्टीट्यूड्स इलाके में जान-माल के भारी नुकसान के साथ पीएलए के सैनिकों के स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं से भी जूझना पड़ा। सुपर हाई एल्टीट्यूड्स इलाके में सैनिकों के रहने के लिए बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप करना पड़ा। वहीं चीन को भर्ती संबंधी चुनौतियों से भी जूझना पड़ रहा है, यहां तक कि तिब्बतियों की भर्ती करनी पड़ रही है। वह कहते हैं कि चीन को इस अनुचित मूर्खतापूर्ण कार्रवाई का आत्मनिरीक्षण करना चाहिए और अप्रैल 2020 की यथास्थिति पर वापस लौटना चाहिए।  

पूर्वी लद्दाख में 70,000 से अधिक सैनिक
एतिहासिक रूप से, चीन-भारत के संबंध शुरू से ही तनावपूर्ण रहे हैं, जिसकी जड़ लंबे समय से चल रहा सीमा विवाद है। 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा, जो दोनों देशों के बीच वास्तविक सीमा है, ने जबरदस्त सैन्य तैनाती देखी है, जो पाकिस्तान के साथ नियंत्रण रेखा पर की गई तैनाती के लगभग बराबर है। एलएसी के साथ नदियां, झीलें और बर्फ से ढके पहाड़ ऐसे हालात पैदा करते हैं, जहां दोनों पक्षों के सैनिक कई जगहों पर आमने-सामने आ जाते हैं, जिससे टकराव बढ़ता है।

चीन के आक्रामक रुख के जवाब में पिछले कुछ सालों में भारत ने उत्तरी, मध्य और पूर्वी क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट किया है। साथ ही, भारत ने पूर्वी लद्दाख में 70,000 से अधिक सैनिक, करीब 100 बख्तरबंद टैंक और करीब 330 बीएमपी पैदल सेना के लड़ाकू वाहनों के साथ-साथ रडार सिस्टम, आर्टिलरी गन और अन्य हथियार सिस्टम तैनात किए हैं।

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