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सबसे खुशहाल देश कैसे बना डेनमार्क? कैसी है यहां की जिंदगी?

Sat, 19 Mar 2016 12:50 PM IST
अलखराम सिंह/अमर उजाला, दिल्ली
अलखराम सिंह/अमर उजाला, दिल्ली Updated Sat, 19 Mar 2016 12:50 PM IST
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how Denmark became world's most happiest country?

कभी अपराध और हिंसा का अड्डा रहे यूरोपीय देश डेनमार्क को दुनिया के खुशहाल देशों की लिस्ट में प्रथम स्‍‌थान मिला, लेकिन क्यों? जानें डेनमार्क ने खुद को कैसे बदला इस खास रिपोर्ट में।

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जिस वजह से डेनमार्क को दुनिया का सबसे खुशहाल देश होने का खिताब मिला है उसके पीछे कोई एक वजह नहीं है। किसी भी देश को खुशहाल देशों की श्रेणी रखने से पहले कई कसौट‌ियों पर कसा जाता है। इनमें से कुछ प्रमुख कसौटी हैं- देश की जीडीपी, लोगों का स्वास्‍थ्य, नागरिकों की जीवन प्रत्याशा और सामाजिक सुरक्षा।
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जीडीपी और प्रति व्यक्ति आय में अमेरिका से डेनमार्क से काफी पीछे है इसके बावजूद भी खुशहाली में दुनिया के सभी देशों को पछाड़ दिया। आगे पढ़ें डेनमार्क का सबसे खुशहाल देश बनने की वजह।

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प्रति व्यक्ति आय में सबसे आगे है अमेरिका

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आर्थिक तौर पर अगर कोई देश दुनिया का सबसे खुशहाल देश बनता तो वह अमेरिका होता क्योंकि यहां प्रति व्यक्ति औसत आय 53,750 डॉलर पीपीपी (परचेजिंग पॉवर पैरिटी) है। जबकि डेनमार्क की प्रति व्यक्ति औसत आय 44,950 डॉलर और भारत की प्रति व्यक्ति औसत आय 5350 डॉलर है।

वहीं लोगों के स्वास्‍थ्य की बात करें तो अमेरिका औसतन 8713 डॉलर प्रति व्यक्ति खर्च करता है जबकि डेनमार्क अपने नागरिकों के स्वास्‍थ्य पर 4552 डॉलर प्रति व्यक्ति खर्च करता है वहीं भारत 60.41 डॉलर ही प्रति व्यक्ति पर खर्च करता है।

लेकिन अब सवाल यह है क‌ि अगर डेनमार्क के लोगों की आय अमेरिका के लोगों से कम है और वहां की सरकार लोगों के स्वास्‍थ्य में भी कम खर्च करती है तो वह दुनिया का सबसे खुशहाल देश कैसे बना? जवाब है डेनमार्क की सामाजिक सुरक्षा पर बनी नीतियां। आप कह सकते हैं कि सरकार की सामाजिक सहायता लोगों को खुशहाल रहने की गारंटी देती।

डेनमार्क सरकार अपने नागरिकों की सामाजिक सुरक्षा के लिए ऐसी नीतियां बनाई हैं जिससे हर कोई तनाव मुक्त रह सकता है। यहां किसी को भूखा मरने की चिंता नहीं होती। आगे पढ़ें डेनमार्क की कुछ खास सुरक्षा नीतियां।

तीन साल डेनमार्क में रहने पर मिलती है पेंशन

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जिसे बुढ़ापे की चिंता है उसके लिए डेनमार्क दुनिया का सबसे अच्छा देश हो सकता है। यहां पर 15 से 65 की उम्र के बीच में जो तीन साल तक जीवन गुजारता है उसे सरकार आजीवन पेंशन देती है। यह रही डेनमार्क की पहली सामाजिक सुरक्षा।

इसी तरह से अगर किसी को कोई बीमारी होती है तो स्वास्‍थ्य सुरक्षा योजना के तहत उसके इलाज की व्यवस्‍था होती है। इतना ही नहीं अगर किसी को आम बुखार-जुकाम जैसी भी कोई बीमारी होती है तो डेनमार्क की सरकार उसे उसकी दिहाड़ी के हिसाब से पैसे देती है। इस योजना का लाभ लेने की शर्त एक है, बीमारी के दौरान व्यक्ति अपने ऑफिस या कार्यस्‍थल में गैरहाजिर रहा हो।

डेनमार्क के हर नागरिक को सरकार शादी करने, पिता बनने और अंतिम संस्कार करने का खर्च देने के साथ ही इन कामों पर व्यक्ति का जितना समय खर्च होता है उसके हिसाब से उतने दिन का वेतन भी सरकार देती है।

नौकरी न मिलने पर मिलने पर भी मिलता है वेतन

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डेनमार्क अगर दुनिया का सबसे खुशहाल देश बना है तो उसके पीछे एक ही कारण है यहां सामाजिक सुरक्षा की नीतियां। यहां जब तक किसी को नौकरी नहीं मिलती तब तक सरकार उसका पूरा खर्च उठाती है यानी आर्थिक मदद करती है।

नौकरी मिलने के बाद स्वास्‍थ्य बीमा और जीवन बीमा की तरह नौकरी का भी बीमा होता है। नौकरी छूटने पर बीमा कंपनी आपको सैलरी देती है। इसके लिए शर्त यह है कि आप तीन साल तक नौकरी कर चुके हों और बीमा पॉलिसी लिए आपको एक साल हो गए हों। इसके बाद नौकरी छूटती है तो एक साल तक बीमा कंपनी आपको सैलरी देती हैं। बशर्ते आप नौकरी ढूंढ़ने का प्रयत्न भी करते रहें।

इन तमाम सुविधाओं के बाद 1999 में से ओल्ड एज पेंशन भी शुरू की गई जो बुढ़ापे में एक अतिरिक्त सहारा बनती है।

अन्य देशों से बेहतर है डेनमार्क की जीवन प्रत्याशा

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लाइफ एक्सपेक्टेंसी यानी जीवन प्रत्याशा। इसके तहत जन्म दर, मृत्यु दर, औसत आयु, प्रजनन दर और लिंगानुपात आता है। जीवन प्रत्याशा में भी डेनमार्क भारत और अमेरिका से आगे है।

2012 के आंकड़ों के अनुसार डेनमार्क में औसत आयु 80 साल छह महीने है और अमेरिका मे लोगों की औसत आयु 78 साल सात महीने है तो वहीं भारत में लोगों की औसत आयु 66 साल दो महीने है।

लिंगानुपात को देखें तो भारत में 1000 पुरुषों के बीच 994 महिलाएं हैं जबकि डेनमार्क में 25 से 54 उम्र के बीच में लिंगानुपात 1000 पुरुषों में 1000 महिलाएं हैं।

यही वो तमाम कारण हैं जो डेनमार्क को दुनिया का सबसे खुशहाल देश बनाते हैं।

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