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मौका मिला तो दांव लगाने से नहीं चूकेंगे देवगौड़ा

Tue, 22 May 2018 10:54 AM IST
विनोद अग्निहोत्री, नई दिल्ली
विनोद अग्निहोत्री, नई दिल्ली Updated Tue, 22 May 2018 10:54 AM IST
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HD Devgowda will not miss out on betting in Karnataka

कर्नाटक में कांग्रेस के समर्थन से अपने बेटे एचडी  कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनाने के साथ-साथ पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा ने देश की राजनीति में अपनी अगली पारी की इबारत भी लिख दी है। देवगौड़ा अब 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए विपक्षी राजनीति में वही भूमिका निभाएंगे जो 1989 में हरियाणा के दिग्गज नेता देवीलाल ने और 1996 और 2004 में माकपा के बुजुर्ग और तत्कालीन महासचिव हरिकिशन सिंह सुरजीत ने निभाई थी।

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फर्क यही है कि देवीलाल ने चुनावी जंग दूसरों के लिए लड़ी जबकि अगर दांव लगा तो देवगौड़ा खुद पर भी दांव लगा सकते हैं और देवीलाल जैसी गलती नहीं दोहराएंगे। यानी अगर 2019 में कर्नाटक की ही तरह केंद्र में भी खिचड़ी पकी तो बेटे की तरह देवगौड़ा भी अपनी वरिष्ठता और स्वीकार्यता का फायदा उठाकर एक बार फिर साउथ ब्लॉक की सीढ़ियां चढ़ने की कोशिश कर सकते हैं।
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क्या त्रिशंकु लोकसभा की स्थिति में कांग्रेस देवगौड़ा को प्रधानमंत्री बनाने को तैयार होगी इस सवाल को कांग्रेस नेता शकील अहमद, राजीव त्यागी और अभय दुबे काल्पनिक प्रश्न कहकर टाल देते हैं। पिछले लोकसभा चुनावों में कर्नाटक में अपने दल की विफलता के बाद से ही राष्ट्रीय राजनीति में हाशिए पर पड़े हरदनहल्ली डोडेगौड़ा देवगौड़ा और उनके परिवार की किस्मत अचानक जाग गई है। विधानसभा चुनावों के त्रिशंकु नतीजों की बदौलत देवगौड़ा परिवार के पास कर्नाटक की सत्ता आ गई है। कांग्रेस ने इस लालच में उसे अपने समर्थन का कंधा दिया है कि 2019 में जनता दल की बैसाखी उसे केंद्र की सत्ता तक पहुंचाएगी।
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आंकड़ों के मुताबिक कर्नाटक में कांग्रेस और जद(एस) के कुल मत प्रतिशत को अगर मिला दें तो यह करीब 58 फीसदी हो जाता है जो भाजपा को मिले 37 फीसदी से खासा ज्यादा है और इस लिहाज से कर्नाटक की 28 लोकसभा सीटों में अधिसंख्य पर इस गठबंधन की जीत की संभावना बहुत बढ़ जाती है। यही नहीं देवगौड़ा के कांग्रेस के पाले में आने से भाजपा विरोधी राजनीतिक मोर्चे में कांग्रेस को विपक्ष के एक बड़े नेता का समर्थन मिल गया है जो भाजपा विरोधी मोर्चे में कांग्रेस की बड़ी भूमिका की राह आसान करने में मददगार होगा।

1996 में केंद्र की संयुक्त मोर्चा सरकार के प्रधानमंत्री रह चुके एचडी  देवगौड़ा इस समय देश की राजनीति में बचे खुचे बुजुर्ग नेताओं में हैं। 85 वर्षीय देवगौड़ा विपक्षी नेताओं में सबसे ज्यादा लंबी राजनीतिक पारी खेल चुके हैं और प्रधानमंत्री रह चुके होने के कारण उनकी वरिष्ठता भी सबसे ऊपर है। 

देवगौड़ा को इस सारे अंतर्विरोधों के बीच संतुलन साधना होगा

HD Devgowda will not miss out on betting in Karnataka
व्यवहारिक राजनीति के महारथी देवगौड़ा के विपक्ष के सभी दिग्गज नेताओं शरद पवार, चंद्रबाबू नायडू, ममता बनर्जी, मायावती, चंद्रशेखर राव, नवीन पटनायक, शरद यादव, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव,एम करुणानिधि, सीताराम येचुरी आदि से बेहद अच्छे रिश्ते हैं। कांग्रेस से गठबंधन होने से पहले भी उनके सोनिया गांधी, गुलाम नबी आजाद, अहमद पटेल आदि से भी मधुर रिश्ते रहे हैं।
ये सारे नेता देवगौड़ा का बेहद सम्मान भी करते हैं और विपक्ष के युवा नेताओं अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, आदि भी देवगौड़ा का आदर करते हैं जबकि गठबंधन से पहले भले ही चुनाव में राहुल गांधी ने जद(एस) को भाजपा की बी टीम कहा हो, लेकिन गठबंधन के बाद से राहुल भी बेहद आदर से देवगौड़ा को संबोधित करने लगे हैं।

इस लिहाज से कर्नाटक में अपने बेटे की ताजपोशी के बाद यह बुजुर्ग वोक्कालिगा नेता केंद्रीय राजनीति में विपक्षी एकता के सूत्रधार और ध्रुव की भूमिका निभाने की तैयारी में हैं। जद(एस) के महासचिव और दिल्ली में देवगौड़ा सबसे विश्वास प्राप्त नेता दानिश अली के मुताबिक कुमारस्वामी कर्नाटक के विकास पर ध्यान देंगे और देवगौड़ा जी 2019 में केंद्र से भाजपा सरकार को बेदखल करने के लिए विपक्षी दलों को एकजुट करने का काम करेंगे। 

लेकिन सवाल है कि देवगौड़ा ये काम क्या राहुल गांधी या ममता बनर्जी, मायावती या किसी और को प्रधानमंत्री बनाने के लिए ये काम करेंगे या अपने खुद के लिए बिसात बिछाएंगे। सूत्र कहते हैं कि जब भरी दोपहर सीताराम केसरी ने एकाएक राष्ट्रपति भवन पहुंचकर संयुक्त मोर्चा सरकार से कांग्रेस का समर्थन वापस लेकर देवगौड़ा को प्रधानमंत्री की कुर्सी से बेदखल किया था, उसके बाद किसी ज्योतिषी ने उन्हें कहा था कि उनकी जन्म कुंडली में एक बार फिर प्रधामंत्री बनने का योग है। हालाकि पहले 2013 में विधानसभा चुनावों और फिर 2014 में लोकसभा चुनावों में जद(एस) की विफलता से देवगौड़ा निराश हो गए थे, लेकिन अब फिर उनकी आंखों की चमक लौट आई है। शायद उन्हें ज्योतिषी की भविष्यवाणी सच होने की उम्मीद जग गई है। 

कुमारस्वामी सरकार के गठन के बाद देवगौड़ा अब ज्यादा दिन दिल्ली में रहकर राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय होंगे। वह प्रकट तौर पर तो खुद को आगे नहीं बढ़ाएंगे बल्कि देवीलाल और सुरजीत की तर्ज पर विपक्षी राजनीति के पेंचों को सुलझाते हुए भाजपा विरोधी मोर्चे के गठन का रास्ता तैयार करेंगे। उनकी चुनौती यह है कि जहां ममता बनर्जी, मायावती, चंद्रबाबू नायडू, चंद्रशेखर राव, नवीन पटनायक का जोर गैर भाजपा गैर कांग्रेस रीजनल फ्रंट बनाने पर है, वहीं शरद पवार, लालू  प्रसाद यादव, शरद यादव, सीताराम येचुरी आदि नेता कांग्रेस के साथ मिलकर भाजपा विरोधी मोर्चा बनाने के हक में हैं।शरद पवार ने ममता बनर्जी को इस बात के लिए राजी कर लिया है कि बिना कांग्रेस के भाजपा विरोधी मोर्चे की बात निरर्थक है। 

ममता को कांग्रेस को साथ लेने में कोई एतराज नहीं है लेकिन वह कांग्रेस को नेतृत्वकारी भूमिका देने को राजी नहीं हैं। दरअसल 2019 में त्रिशुंक लोकसभा की स्थिति में ममता और मायावती के मन में भी प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा जाग उठी है।और तमाम बदवाल के बावूजूद अभी राहुल गांधी इन विपक्षी क्षत्रपों को नेता के रूप में स्वीकार नहीं हैं।

देवगौड़ा को इस सारे अंतर्विरोधों के बीच संतुलन साधना होगा। उन्हें कांग्रेस के साथ साथ विपक्षी क्षत्रपों को भी साधना होगा और भाजपा विरोधी मोर्चे को आकार देना होगा। कांग्रेस किस हद तक उनकी अहम भूमिका को मंजूर करेगी, यह भी सवाल है। हालांकि बहुत कुछ मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों के नतीजों पर भी निर्भर है। इन चुनावों के नतीजे और कांग्रेस की सफलता से उसका और राहुल गांधी का दबदबा तय होगा। देवगौड़ा कांग्रेस को भी साधे रखेंगे और विपक्षी क्षत्रपों को भी ताकि लोकसभा चुनावों के बाद अगर कांग्रेस सबसे बड़े दल क रूप में नहीं उभरती है तो उनके नाम पर सर्वसहमति बन जाए और एक बार फिर राष्ट्रपति भवन के दरबार सभागार में वह पद और गोपनीयता की शपथ ले सकें।




 
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