{"_id":"67064255d52e6437a90de0b6","slug":"haryana-44-years-twice-jat-state-president-bjp-returns-becomes-master-of-social-engineering-2024-10-09","type":"story","status":"publish","title_hn":"Haryana: 44 साल, दो बार जाट प्रदेशाध्यक्ष; कामयाबी नहीं तो 75-25 पर लौटी भाजपा, बनी सोशल इंजीनियरिंग की मास्टर","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
Haryana: 44 साल, दो बार जाट प्रदेशाध्यक्ष; कामयाबी नहीं तो 75-25 पर लौटी भाजपा, बनी सोशल इंजीनियरिंग की मास्टर
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
BJP
- फोटो :
Amar Ujala
विस्तार
हरियाणा के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने हैट्रिक लगाकर खुद को 'सोशल इंजीनियरिंग' की मास्टर साबित कर दिया है। लोकसभा चुनाव के नतीजों से पार्टी ने बहुत कुछ सीखा। वजह, मनोहरलाल खट्टर को बदलने के बावजूद कांग्रेस पार्टी ने दस में से पांच सीटें, भाजपा से छीन ली थी। इसके बाद भाजपा ने नए सिरे से अपनी 'सोशल इंजीनियरिंग' पर काम प्रारंभ किया। ब्राह्मण समुदाय से आने वाले मोहन लाल बड़ौली को भाजपा का प्रदेशाध्यक्ष बना दिया गया।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, लोकसभा चुनाव में भाजपा इस बात को अच्छे से समझ चुकी थी कि उसे जाट समुदाय का समर्थन नहीं मिलेगा। विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा ने जिस नई सोशल इंजीनियरिंग का खाका तैयार किया, उसमें गैर जाट फार्मूले पर फोकस किया गया। भाजपा '75-25' के समीकरण पर काम करने लगी। कांग्रेस पार्टी, इस समीकरण को समझने से चूक गई। उसने केवल जाट समुदाय यानी 25 फीसदी वोटर पर अपना फोकस बनाए रखा। इसके अलावा करीब 18 फीसदी दलित समुदाय को कांग्रेस पार्टी ने बिना किसी मेहनत के अपना समझ लिया। भाजपा ने प्रदेश के 75 फीसदी वोटरों को केंद्र में रख अपनी रणनीति तैयार की। उसमें दलित व पिछड़े वर्गों के वोटरों पर विशेष ध्यान दिया। नतीजा, भाजपा तीसरी बार सत्ता में लौटी।
बता दें कि लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा को सबसे बड़ी चुनौती 'एंटी-इनकम्बेंसी' से जूझना पड़ा था। चुनाव से कुछ माह पहले ही मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को बदल गया। उनकी जगह पर पिछड़े वर्ग से आने वाले नायब सैनी को सीएम पद की कमान सौंपी गई। साढ़े चार साल तक चला भाजपा और जजपा का गठबंधन टूट गया। कांग्रेस पार्टी ने लोकसभा चुनाव में भाजपा की इस कमजोरी का भरपूर फायदा उठाया। पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने भाजपा को घेरने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। इसका परिणाम लोकसभा चुनाव में देखने को मिला। कांग्रेस पार्टी ने 2019 में प्रदेश की सभी दस लोकसभा सीटें जीतने वाली भाजपा से 2024 में पांच सीटें छीन ली। इसके बाद भाजपा, नई 'सोशल इंजीनियरिंग' तैयार कर 75:25 पर आगे बढ़ने लगी।
विधानसभा चुनाव में भाजपा ने गैर जाट मतदाता, जो कुल आबादी का लगभग 75 प्रतिशत हैं, उन पर फोकस करने की रणनीति बनाई। दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी, अति उत्साह में थी। उसे यह लग रहा था कि वे खट्टर सरकार के प्रति 'एंटी-इनकम्बेंसी' को विधानसभा चुनाव में भुनाएगी। भाजपा ने लोकसभा चुनाव में मिले वोटों का विश्लेषण किया। उसमें मालूम हुआ कि भाजपा को लेकर जाट समुदाय में तगड़ी नाराजगी रही है। वोटिंग में भी यह नाराजगी देखने को मिली। प्रदेश में गैर जाट मतदाता, जो कुल आबादी का लगभग 75 प्रतिशत हैं, भाजपा ने उस पर ही फोकस करने का निर्णय लिया। ब्राह्मण समुदाय से आने वाले मोहनलाल बड़ौली को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंप दी गई। प्रदेश की राजनीति के जानकार रविंद्र कुमार ने बताया, विधानसभा चुनाव में भाजपा, गैर जाट वोटरों पर ही फोकस करती रही। लोकसभा चुनाव से पहले पिछड़े वर्ग से आने वाले नायब सैनी को मुख्यमंत्री बनाया गया था। चुनाव के बाद ब्राह्मण समुदाय के नेता मोहनलाल बड़ौली को प्रदेशाध्यक्ष बना दिया गया। यहां पर भाजपा ने साफ कर दिया कि वह अब 75:25 पर ही फोकस करेगी।
2014 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने प्रदेश में अपने दम पर सरकार बनाई थी। पंजाबी समुदाय से आने वाले मनोहर लाल खट्टर को मुख्यमंत्री बनाया गया। इससे पहले कांग्रेस के भूपेंद्र सिंह हुड्डा लगातार दस साल तक प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे थे। उस वक्त रामबिलास शर्मा, भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष थे। चुनाव में जीत के बाद पार्टी ने रणनीति बदली और जाट समुदाय से आने वाले सुभाष बराला को प्रदेशाध्यक्ष बना दिया गया। उस वक्त पार्टी, जाटों को नाराज नहीं करना चाहती थी। ये अलग बात है कि हरियाणा की सत्ता में आने से पहले भाजपा को लेकर यही कहा जाता था कि यह गैर जाट वर्ग की पार्टी है। उस वक्त प्रदेश का जाट वोटर, ज्यादातर भूपेंद्र सिंह हुड्डा के पक्ष में शिफ्ट हो चुका था।
पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा से पहले यह वोट बैंक, चौटाला परिवार के पक्ष में रहा था। राजनीतिक जानकार, रविंद्र कुमार बताते हैं, प्रदेश की सियासत दो ही वर्गों में विभाजित रही है। भले ही प्रदेश में सत्ता किसी की भी रही हो, लेकिन जाट और गैर जाट, राजनीति के केंद्र में रहे हैं। भाजपा को तो शुरु से ही गैर जाटों की पार्टी माना जाता रहा है। हरियाणा में यह कहावत आम रही है कि भाजपा, शहर वालों की पार्टी है। इसी के चलते 1980 से लेकर अब तक, भाजपा के अधिकांश प्रदेशाध्यक्ष, गैर जाट ही रहे हैं।
सबसे पहले डॉ. कमला वर्मा को प्रदेशाध्यक्ष पद की कमान सौंपी गई। उसके बाद 1984 में डॉ. सूरजभान एक वर्ष के लिए इस पद पर आसीन हुए। डॉ. मंगलसेन ने 1986 में यह पद संभाला। वे करीब चार वर्ष तक प्रदेशाध्यक्ष रहे। 1990 में रामबिलास शर्मा को तीन साल के लिए अध्यक्ष बनाया गया। उनके बाद रमेश जोशी ने यह पद संभाला। 1998 में ओमप्रकाश ग्रोवर और 2000 में रतनलाल कटारिया, प्रदेशाध्यक्ष बनाए गए।
2003 में गणेशीलाल को इस पद पर नियुक्त किया गया। उक्त नेता, गैर जाट थे। साल 2006 में जाट समुदाय के ओमप्रकाश धनखड़ को भाजपा का प्रदेशाध्यक्ष बनाया गया था। उसके बाद 2009 में गैर जाट कृष्णपाल गुर्जर को इस पद की कमान सौंपी गई। 2013 में रामबिलास शर्मा को पार्टी अध्यक्ष बनाया गया। वे करीब दो वर्ष तक इस पद पर रहे थे। सरकार में शिक्षा मंत्री बनने के बाद उन्होंने यह पद छोड़ दिया। जाट समुदाय से आने वाले सुभाष बराला को प्रदेश भाजपा की कमान सौंपी गई। वे पांच वर्ष से कुछ ज्यादा समय तक इस पद पर रहे।
2020 में दोबारा से ओमप्रकाश धनखड़ को प्रदेशाध्यक्ष बनाया गया। गत वर्ष नायब सैनी को प्रदेशाध्यक्ष की कमान सौंपी गई। 1980 से लेकर अब तक के इतिहास पर नजर डालें तो सुभाष बराला व ओमप्रकाश धनखड़, ये दो जाट नेता ही भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष पद पर रहे हैं। बतौर रविंद्र कुमार, लोकसभा चुनाव के नतीजों ने साफ कर दिया था कि हरियाणा में भाजपा को जाट समुदाय का समर्थन नहीं मिलेगा। इसी के चलते पार्टी को अपनी पहले वाली सोशल इंजीनियरिंग पर वापस लौटना पड़ा। यानी गैर जाटों पर फोकस किया गया।
जिस वर्ग यानी गैर जाटों को भाजपा अपना बताने का दावा करती है, उसकी संख्या करीब 75 प्रतिशत है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने पूरी तरह से जाट समुदाय का समर्थन हासिल किया। जाट वोटों पर अपना हक जताने वाली इनेलो और जजपा, को नकार दिया गया। पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा, मौजूदा समय में एक मात्र जाट नेता के तौर पर स्थापित हुए हैं। हालांकि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को केवल जाट समुदाय का ही नहीं, बल्कि गैर जाट वोटरों का भी समर्थन हासिल था। विशेषकर एससी समुदाय के लोगों ने कांग्रेस को वोट दिया। दूसरे समुदाय के लोग भी कांग्रेस के पक्ष में खड़े हुए नजर आए। भाजपा ने लोकसभा चुनाव में जाट समुदाय के वोट हासिल करने के लिए तमाम प्रयास किए, मगर उसे समर्थन नहीं मिल सका।
लोकसभा चुनाव के बाद जिस तरह से भाजपा ने पूर्व सीएम मनोहर लाल खट्टर को केंद्र में केबिनेट मंत्री बनाया, उससे पहले नायब सैनी को मुख्यमंत्री बनाना और अब मोहनलाल बड़ौली को प्रदेशाध्यक्ष के पद पर बैठाना, ये सब बातें इशारा कर रही थी कि भाजपा 2014 से पहले वाली मूल सोशल इंजीनियरिंग के सहारे ही विधानसभा चुनाव में उतरेगी। खट्टर के जरिए पंजाबी समुदाय को साधा गया है तो नायब सैनी के जरिए पिछड़े एवं एससी मतदाताओं को संदेश दिया गया है। मोहन लाल बड़ौली को अध्यक्ष बनाकर पार्टी ने यह बताने का प्रयास किया कि विधानसभा चुनाव में उसका फोकस गैर जाट समुदाय के वोटरों पर ही रहेगा।