{"_id":"5839fd7e4f1c1b313513d1a1","slug":"harivansh-rai-bachchan-birthday-special","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"जयंती विशेषः दशकों पहले बच्चन ने की थी साहित्य में एसएमएस की शुरुआत","category":{"title":"India News","title_hn":"भारत","slug":"india-news"}}
जयंती विशेषः दशकों पहले बच्चन ने की थी साहित्य में एसएमएस की शुरुआत
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Sun, 27 Nov 2016 02:54 AM IST
विज्ञापन
फाइल फोटोः हरिवंश राय बच्चन
- फोटो : Social Media
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
‘मधुशाला’ जैसी कालजयी रचना के प्रणेता और हिन्दी कविता के लब्ध प्रतिष्ठित हस्ताक्षर हरिवंश राय बच्चन तमाम खूबियों के मालिक थे। व्हाट्सअप, मेल और एसएमएस के दौर में भले ही अब अक्षरों ने शब्दों की जगह ले ली है, बच्चन जी ने इस प्रयोग की शुरुआत तकरीबन सात-आठ दशक पहले ही की थी। वह अपने प्रियजनों के पत्रों में इसी शैली का इस्तेमाल करते थे।
प्रिय गो. ‘प’ के लिए ‘ध’ का अर्थ आप भले ही न समझ पाएं लेकिन उनके प्रिय कवि और निबंधकर गोपीकृष्ण ‘गोपेश’ समझ लेते थे कि गो का मतलब गोपेश और ‘प’ के लिए ‘ध’ यानी पत्र के लिए धन्यवाद। इसी तरह धर्मयुग के लिए ध.यु, शुभकामनाओं के लिए शु.का. आदि।
गोपेश जी की बेटी और वरिष्ठ कथा लेखिका प्रो.अनीता गोपेश कहती हैं, पिता के नाम उनके जाने कितने पत्र आए। मेरे लिए तो उनके पत्र कथक की तिहाइयों जैसे थे। मुझे उनके पत्रों की भाषा और लिपि लयात्मक लगती है। डाकिए से उनका पत्र लेकर हवा में लहराती हुई जब घर के भीतर लाकर पापा को देती और कहती, ‘प्रिय गो. प. के लिए ध.’ तो पापा समझ जाते थे किसका पत्र है।
विज्ञापन
एक बार उन्होंने जब बच्चन जी से यह बात कही तो वह सहजता से बोले, ‘अच्छा तो है, उसने साहित्य में संगीत ढूंढ लिया है।’ अमिताभ के मुंबई में बस जाने के बाद बच्चन जी ने भी जब दिल्ली से बोरिया-बिस्तर बांधकर मुंबई का रुख किया तो लिखा, ‘यमुना तट से सागर तीरे’ और पापा समझ गए कि बच्चन जी दिल्ली से मुंबई पहुंच गए।
वरिष्ठ कवि-पत्रकार अजामिल कहते हैं, बच्चन जी की खूबी थी कि वह प्रत्येक पत्र का जवाब जरूर देते थे। वह उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे, जो पत्रों में चंद शब्दों में बड़ी-बड़ी बातें, सुख-दुख और सुझाव साझा कर लेते थे। वह इतने विनम्र थे कि मेरे एक पत्र के जवाब में उन्होंने सलीके से त्रुटि सुधार करते हुए लिखा, जहां तक मुझे पता है और यह कहते हुए सही शब्द की जानकारी दी।
कई टाइपिस्ट होने के बावजूद वह स्वयं ही पत्रों का जवाब देते और ज्यादातर पोस्टकार्ड ही भेजते थे। सुपरिचित गीतकार यश मालवीय कहते हैं, बच्चन जी के संबोधन में भी एक लयात्मकता और आत्मीयता होती थी, यह पिता को लिखे पत्रों में साफ दिखता है।
विज्ञापन
प्रिय गो. ‘प’ के लिए ‘ध’ का अर्थ आप भले ही न समझ पाएं लेकिन उनके प्रिय कवि और निबंधकर गोपीकृष्ण ‘गोपेश’ समझ लेते थे कि गो का मतलब गोपेश और ‘प’ के लिए ‘ध’ यानी पत्र के लिए धन्यवाद। इसी तरह धर्मयुग के लिए ध.यु, शुभकामनाओं के लिए शु.का. आदि।
विज्ञापन
गोपेश जी की बेटी और वरिष्ठ कथा लेखिका प्रो.अनीता गोपेश कहती हैं, पिता के नाम उनके जाने कितने पत्र आए। मेरे लिए तो उनके पत्र कथक की तिहाइयों जैसे थे। मुझे उनके पत्रों की भाषा और लिपि लयात्मक लगती है। डाकिए से उनका पत्र लेकर हवा में लहराती हुई जब घर के भीतर लाकर पापा को देती और कहती, ‘प्रिय गो. प. के लिए ध.’ तो पापा समझ जाते थे किसका पत्र है।
विज्ञापन
एक बार उन्होंने जब बच्चन जी से यह बात कही तो वह सहजता से बोले, ‘अच्छा तो है, उसने साहित्य में संगीत ढूंढ लिया है।’ अमिताभ के मुंबई में बस जाने के बाद बच्चन जी ने भी जब दिल्ली से बोरिया-बिस्तर बांधकर मुंबई का रुख किया तो लिखा, ‘यमुना तट से सागर तीरे’ और पापा समझ गए कि बच्चन जी दिल्ली से मुंबई पहुंच गए।
वरिष्ठ कवि-पत्रकार अजामिल कहते हैं, बच्चन जी की खूबी थी कि वह प्रत्येक पत्र का जवाब जरूर देते थे। वह उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे, जो पत्रों में चंद शब्दों में बड़ी-बड़ी बातें, सुख-दुख और सुझाव साझा कर लेते थे। वह इतने विनम्र थे कि मेरे एक पत्र के जवाब में उन्होंने सलीके से त्रुटि सुधार करते हुए लिखा, जहां तक मुझे पता है और यह कहते हुए सही शब्द की जानकारी दी।
कई टाइपिस्ट होने के बावजूद वह स्वयं ही पत्रों का जवाब देते और ज्यादातर पोस्टकार्ड ही भेजते थे। सुपरिचित गीतकार यश मालवीय कहते हैं, बच्चन जी के संबोधन में भी एक लयात्मकता और आत्मीयता होती थी, यह पिता को लिखे पत्रों में साफ दिखता है।
‘जो बीत गई सो बात गई’
हरिवंश राय बच्चन, अपनी पत्नी और बेटे के साथ
- फोटो : Social Media
‘जीवन में वह था एक कुसुम, थे उस पर नित्य निछावर तुम, वह सूख गया तो सूख गया, मधुवन की छाती को देखो, सूखी कितनी इसकी कलियां, मुर्झाई कितनी वल्लरियां, जो मुर्झाई फिर कहां खिली, पर बोलो सूखे फूलों पर कब मधुवन शोर मचाता है, जो बीत गई सो बात गई।’
हिन्दी साहित्य के अद्भुत चितेरे हरिवंश राय ‘बच्चन’ की यह पंक्तियां उनके अपने ही गांव बाबूपट्टी पर सटीक बैठती हैं। आज बच्चन की जयंती है और अपनों के बीच वे पराए से दिखते हैं। गांव में कहीं कोई शोर नहीं, न ही चर्चा। हां, जब बात निकलती है तो लोग जरूर कहते हैं, हां...., मधुशाला! बच्चन तो हमारे ही गांव के थे। यहां नई पीढ़ी ने ‘बच्चन’ को पढ़ा तो नहीं, उनका नाम जरूर सुना है।
प्रतापगढ़ में रानीगंज का बाबूपट्टी गांव बाकी दूसरे गांवों जैसा ही है। दोपहर करीब 12 बजे का समय। लोग रोज की तरह अपने कामों में लगे थे। गांव में गांधी चबूतरा चौराहे के पास चाय-पान की दुकान पर चंद लोग गप्पे लड़ा रहे थे। कहीं कोई ऐसा आभास नहीं कि आज का दिन गांव के लिए कुछ खास है। बच्चन के जन्मदिन को लेकर न कोई तैयारी, न कोई चर्चा। दुकान पर बैठे लोगों से जब ‘मधुशाला’ पर चर्चा हुई तो एक-एक कर लोग पास आते गए।
नई पीढ़ी में अधिकांश को यह नहीं पता था कि मधुशाला क्या है। इतना जरूर कहा कि इसे हरिवंश राय बच्चन ने लिखा है और वे हमारे ही गांव के थे। लोगों को जमा देख पूर्व प्रधान पंकज शुक्ला भी चले आए। बोले, मधुशाला तो नहीं पढ़ी, लेकिन बच्चनजी की आत्मकथा ‘क्या भूलूं क्या याद करूं’ पूरी पढ़ी है। उसमें गांव का जिक्र है।
हिन्दी साहित्य के अद्भुत चितेरे हरिवंश राय ‘बच्चन’ की यह पंक्तियां उनके अपने ही गांव बाबूपट्टी पर सटीक बैठती हैं। आज बच्चन की जयंती है और अपनों के बीच वे पराए से दिखते हैं। गांव में कहीं कोई शोर नहीं, न ही चर्चा। हां, जब बात निकलती है तो लोग जरूर कहते हैं, हां...., मधुशाला! बच्चन तो हमारे ही गांव के थे। यहां नई पीढ़ी ने ‘बच्चन’ को पढ़ा तो नहीं, उनका नाम जरूर सुना है।
प्रतापगढ़ में रानीगंज का बाबूपट्टी गांव बाकी दूसरे गांवों जैसा ही है। दोपहर करीब 12 बजे का समय। लोग रोज की तरह अपने कामों में लगे थे। गांव में गांधी चबूतरा चौराहे के पास चाय-पान की दुकान पर चंद लोग गप्पे लड़ा रहे थे। कहीं कोई ऐसा आभास नहीं कि आज का दिन गांव के लिए कुछ खास है। बच्चन के जन्मदिन को लेकर न कोई तैयारी, न कोई चर्चा। दुकान पर बैठे लोगों से जब ‘मधुशाला’ पर चर्चा हुई तो एक-एक कर लोग पास आते गए।
नई पीढ़ी में अधिकांश को यह नहीं पता था कि मधुशाला क्या है। इतना जरूर कहा कि इसे हरिवंश राय बच्चन ने लिखा है और वे हमारे ही गांव के थे। लोगों को जमा देख पूर्व प्रधान पंकज शुक्ला भी चले आए। बोले, मधुशाला तो नहीं पढ़ी, लेकिन बच्चनजी की आत्मकथा ‘क्या भूलूं क्या याद करूं’ पूरी पढ़ी है। उसमें गांव का जिक्र है।
पुरनियों के जेहन में जिंदा हैं ‘बच्चन’
हरिवंश राय बच्चन के बेटे हैं अमिताभ
आगे बढ़ने पर राजेश कुमार सरोज मिले। पूछने पर कहा, ‘मधुशाला’ के बारे में तो पीने वाले ही बेहतर ढंग से बता पाएंगे। गांव के ही अभिताभ श्रीवास्तव ने खुद को बच्चन का पट्टीदार बताया और चार पंक्तियां भी सुनाईं। बोले, बाबा से सुनने को मिला था कि हरिवंशजी पहली बार 12 साल की उम्र में किसी की शादी में और दूसरी बार चार साल बाद 16 साल की उम्र में गांव आए थे।
थोड़ी दूरी पर सुनील श्रीवास्तव मिले। वह भी खुद को बच्चनजी का पट्टीदार बताने लगे। ‘मधुशाला’ के बारे में पूछने पर बोले, ज्यादा तो नहीं पता, लेकिन हाईस्कूल का पाठ्यक्रम देखेंगे तो इसके बारे में जानकारी हो जाएगी। कुछ ऐसा ही जवाब चंडीसहाय मिश्र ने दिया। बोले, ‘मधुशाला’ की लाइनें तो याद नहीं हैं, लेकिन बच्चनजी ने समाज की वेदनाओं को देखते हुए यह किताब लिखी थी।
अमिताभ के चुनाव में मिले थे बाबूजी से
बाबूपट्टी गांव के नीम चौरा के पास राजेंद्र श्रीवास्तव मिले। वह भी खुद को बच्चनजी का पट्टीदार बताने लगे। बोले, 1985 में जब अमिताभ बच्चन इलाहाबाद से चुनाव लड़े थे, तब बाबूजी से मुलाकात हुई थी। तब मैं इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ता था। उसी दौरान हरिवंशजी इलाहाबाद आए और सर्किट हाउस में रुके। गांव से आए शारदा चाचा के साथ मैं उनसे मिलने के लिए सर्किट हाउस गया। पहले दिन मुलाकात नहीं हो पाई और लौटना पड़ा।
दूसरे दिन हम लोगों ने बाबूपट्टी लिखकर चिट्ठी भेजी। इस पर हरिवंशजी ने तुरंत अंदर बुलवा लिया। अमिताभ बच्चन उस समय प्रचार में निकले हुए थे। करीब 15 मिनट उनसे बात हुई। बाबूजी हमें रोक रहे थे कि अमित आ रहा है, मुलाकात कर लो, लेकिन शारदाजी फिर आने की बात कहकर निकल गए। बाबूजी ने चुनाव बाद बाबूपट्टी आने का वादा किया था, लेकिन किन्हीं कारणों से वह नहीं आ सके।
अंताक्षरी में गाई जाती थी ‘मधुशाला’
पोस्टमास्टर के पद से रिटायर हुए 76 साल के आशाराम मिश्र घर के दरवाजे के सामने कुर्सी लगाकर बैठे थे। ‘मधुशाला’ के बारे में पूछने पर पांच पंक्तियां पढ़कर सुनाईं। कहा, मधुशाला में बच्चनजी के आध्यात्मिक विचार हैं। जब हम लोग छठवीं-सातवीं कक्षा में पढ़ते थे तो अंताक्षरी में ‘मधुशाला’ गाई जाती थी।
तंज भी, रंज भी
बच्चनजी और ‘मधुशाला’ का जिक्र छेड़ने के बाद ग्रामीण उत्साह से भर जाते, लेकिन जयंती पर शासन की तरफ से कोई आयोजन न होने, पुस्तकालय भवन के बदहाल होने को लेकर रंज भी था। हर कोई बच्चनजी के बारे में सुनना और कुछ कहना चाहता था। थोड़े रंज से बोले, गांव के बारे में जानकारी जुटाने कभी लोग दिल्ली से चले आते हैं तो कभी लखनऊ और इलाहाबाद से, मगर होता कुछ नहीं है। हर साल बस यही जानकारी जुटाने का क्रम लगा रहता है।
बच्चनजी के नाम से कोई संपत्ति नहीं
बाबूपट्टी हरिवंश राय बच्चन का गांव जरूर है, लेकिन यहां उनकी कोई पैतृक चल-अचल संपत्ति नहीं है। ग्रामीणों की मानें तो उनके पैतृक निवास स्थान पर पुस्तकालय भवन बन गया है। इसके अलावा और कोई जमीन उनके नाम से नहीं है। सरकारी कागजों में भी उनके नाम से कोई जमीन दर्ज नहीं है।
थोड़ी दूरी पर सुनील श्रीवास्तव मिले। वह भी खुद को बच्चनजी का पट्टीदार बताने लगे। ‘मधुशाला’ के बारे में पूछने पर बोले, ज्यादा तो नहीं पता, लेकिन हाईस्कूल का पाठ्यक्रम देखेंगे तो इसके बारे में जानकारी हो जाएगी। कुछ ऐसा ही जवाब चंडीसहाय मिश्र ने दिया। बोले, ‘मधुशाला’ की लाइनें तो याद नहीं हैं, लेकिन बच्चनजी ने समाज की वेदनाओं को देखते हुए यह किताब लिखी थी।
अमिताभ के चुनाव में मिले थे बाबूजी से
बाबूपट्टी गांव के नीम चौरा के पास राजेंद्र श्रीवास्तव मिले। वह भी खुद को बच्चनजी का पट्टीदार बताने लगे। बोले, 1985 में जब अमिताभ बच्चन इलाहाबाद से चुनाव लड़े थे, तब बाबूजी से मुलाकात हुई थी। तब मैं इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ता था। उसी दौरान हरिवंशजी इलाहाबाद आए और सर्किट हाउस में रुके। गांव से आए शारदा चाचा के साथ मैं उनसे मिलने के लिए सर्किट हाउस गया। पहले दिन मुलाकात नहीं हो पाई और लौटना पड़ा।
दूसरे दिन हम लोगों ने बाबूपट्टी लिखकर चिट्ठी भेजी। इस पर हरिवंशजी ने तुरंत अंदर बुलवा लिया। अमिताभ बच्चन उस समय प्रचार में निकले हुए थे। करीब 15 मिनट उनसे बात हुई। बाबूजी हमें रोक रहे थे कि अमित आ रहा है, मुलाकात कर लो, लेकिन शारदाजी फिर आने की बात कहकर निकल गए। बाबूजी ने चुनाव बाद बाबूपट्टी आने का वादा किया था, लेकिन किन्हीं कारणों से वह नहीं आ सके।
अंताक्षरी में गाई जाती थी ‘मधुशाला’
पोस्टमास्टर के पद से रिटायर हुए 76 साल के आशाराम मिश्र घर के दरवाजे के सामने कुर्सी लगाकर बैठे थे। ‘मधुशाला’ के बारे में पूछने पर पांच पंक्तियां पढ़कर सुनाईं। कहा, मधुशाला में बच्चनजी के आध्यात्मिक विचार हैं। जब हम लोग छठवीं-सातवीं कक्षा में पढ़ते थे तो अंताक्षरी में ‘मधुशाला’ गाई जाती थी।
तंज भी, रंज भी
बच्चनजी और ‘मधुशाला’ का जिक्र छेड़ने के बाद ग्रामीण उत्साह से भर जाते, लेकिन जयंती पर शासन की तरफ से कोई आयोजन न होने, पुस्तकालय भवन के बदहाल होने को लेकर रंज भी था। हर कोई बच्चनजी के बारे में सुनना और कुछ कहना चाहता था। थोड़े रंज से बोले, गांव के बारे में जानकारी जुटाने कभी लोग दिल्ली से चले आते हैं तो कभी लखनऊ और इलाहाबाद से, मगर होता कुछ नहीं है। हर साल बस यही जानकारी जुटाने का क्रम लगा रहता है।
बच्चनजी के नाम से कोई संपत्ति नहीं
बाबूपट्टी हरिवंश राय बच्चन का गांव जरूर है, लेकिन यहां उनकी कोई पैतृक चल-अचल संपत्ति नहीं है। ग्रामीणों की मानें तो उनके पैतृक निवास स्थान पर पुस्तकालय भवन बन गया है। इसके अलावा और कोई जमीन उनके नाम से नहीं है। सरकारी कागजों में भी उनके नाम से कोई जमीन दर्ज नहीं है।
पूरे जोश से गाकर सुनाई ‘मधुशाला’
फाइलः हरिवंश राय बच्चन
- फोटो : Social Media
बाबूपट्टी गांव के मनमोहनलाल श्रीवास्तव 65 साल के हैं और मात्र आठवीं तक पढ़े हैं। कामधाम के सिलसिले में पंजाब में रहते हैं। इन दिनों गांव आए हुए हैं। जब ‘मधुशाला’ पर चर्चा सुनी तो खुद ही पास आ गए। सुर-लय-ताल मिलाकर मधुशाला की आठ-दस पक्तियां गाकर सुनाईं। कहा, हरिवंशजी हमारे पूर्वज थे। बाप-दादा से उनके बारे में सुना था।
‘मास्टर चाचा’ से हमेशा होती थी चिट्ठी-पत्री
हरिवंश राय ‘बच्चन’ भले ही अपने गांव बाबूपट्टी सिर्फ दो ही बार आ सके, लेकिन यहां के रहने वाले शारदा प्रसाद श्रीवास्तव से उनका संपर्क बराबर बना रहा। अंग्रेजी के अध्यापक रहे शारदा प्रसाद अक्सर बाबूजी को चिट्ठियां भेजते थे। इसी के माध्यम से हालचाल भी होता था। उधर से भी सप्ताह भर बाद चिट्ठियों को जवाब आता था। शारदा प्रसाद हरिवंशजी के सारे पत्र एक बाक्स में इकट्ठा करते। 22 नवंबर 2008 को उनके निधन के बाद सारे पत्र भी इधर-उधर हो गए।
उनके भतीजे अमिताभ श्रीवास्तव ने किसी तरह एक पत्र ढूंढकर दिखाया, जो अमिताभ बच्चन की एक्जीक्यूटिव सेक्रेटरी रोजी सिंह की तरफ से भेजा गया था। यह पत्र फरवरी 1998 का था। जिसमें हरिवंशजी के हवाले से शारदा प्रसाद को संबोधित करते हुए लिखा गया था कि नए साल पर आपकी तरफ से बच्चनजी को भेजा शुभकामना संदेश प्राप्त हुआ है। इसके लिए आपको धन्यवाद।
स्वास्थ्य कारणों से बच्चनजी स्वयं आपको पत्र नहीं लिख पा रहे हैं। उनकी तरफ से हम आपको धन्यवाद देते हैं। ‘मधुशाला’ के बारे में चर्चा के दौरान बाबूपट्टी गांव के लोग शारदा प्रसाद को भी याद कर रहे थे। सबका कहना था कि मास्टर चाचा होते तो एक-एक चीज बताते।
‘मास्टर चाचा’ से हमेशा होती थी चिट्ठी-पत्री
हरिवंश राय ‘बच्चन’ भले ही अपने गांव बाबूपट्टी सिर्फ दो ही बार आ सके, लेकिन यहां के रहने वाले शारदा प्रसाद श्रीवास्तव से उनका संपर्क बराबर बना रहा। अंग्रेजी के अध्यापक रहे शारदा प्रसाद अक्सर बाबूजी को चिट्ठियां भेजते थे। इसी के माध्यम से हालचाल भी होता था। उधर से भी सप्ताह भर बाद चिट्ठियों को जवाब आता था। शारदा प्रसाद हरिवंशजी के सारे पत्र एक बाक्स में इकट्ठा करते। 22 नवंबर 2008 को उनके निधन के बाद सारे पत्र भी इधर-उधर हो गए।
उनके भतीजे अमिताभ श्रीवास्तव ने किसी तरह एक पत्र ढूंढकर दिखाया, जो अमिताभ बच्चन की एक्जीक्यूटिव सेक्रेटरी रोजी सिंह की तरफ से भेजा गया था। यह पत्र फरवरी 1998 का था। जिसमें हरिवंशजी के हवाले से शारदा प्रसाद को संबोधित करते हुए लिखा गया था कि नए साल पर आपकी तरफ से बच्चनजी को भेजा शुभकामना संदेश प्राप्त हुआ है। इसके लिए आपको धन्यवाद।
स्वास्थ्य कारणों से बच्चनजी स्वयं आपको पत्र नहीं लिख पा रहे हैं। उनकी तरफ से हम आपको धन्यवाद देते हैं। ‘मधुशाला’ के बारे में चर्चा के दौरान बाबूपट्टी गांव के लोग शारदा प्रसाद को भी याद कर रहे थे। सबका कहना था कि मास्टर चाचा होते तो एक-एक चीज बताते।