संस्कृति बचाने के नाम पर मारे जा रहे ‘जारवा’ आदिवासी नवजात
- जनजाति के इलाके से 300 स्वायर मील दूर ही रहते हैं बाहरी लोग
- अलग से बसाए गए हैं ‘बफर जोन’
विस्तार
भारतीय द्वीप में अंडमान के जारवा जनजातीय इलाकों में विदेशी या बाहरी लोगों को घुसने तक पर पाबंदियां हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में बाहरी लोग इन इलाकों में न केवल घुस रहे हैं बल्कि यहां के लोगों के संपर्क में भी आ रहे हैं।
अब हालात यह हैं कि यदि नवजात एकदम काले रंग के साथ पैदा नहीं हों तो मां को डर रहता है कि कहीं उनकी औलाद को जनजाति के दूसरे लोग मार न दें। हालांकि भारत ने जारवा जनजाति की सुरक्षा के लिए उनके संपर्क लगभग पूरी दीन दुनिया से काट रखे हैं लेकिन इस दुर्लभ जनजाति के लोग बाहरी दुनिया के संपर्क में आना शुरू हो गए हैं।
यह जनजाति किसी अविवाहित या विधवा के बच्चे को मार देती है। यही नहीं बल्कि यदि बच्चा ‘जारवा’ जाति से बाहर किसी अन्य व्यक्ति से हुआ है तो उसकी भी हत्या कर दी जाती है। ऐसे कई मामले पिछले वर्षों में सामने आए हैं। लेकिन शिकायत के बावजूद हत्यारों पर कार्रवाई नहीं होती है।
हाल ही में नवंबर में एक पांच साल के बच्चे की हत्या के बाद इस जघन्य कांड के चश्मदीदों ने पुलिस को पूरी जानकारी दी, लेकिन ‘जारवा’ जाति के व्यक्ति पर कोई कार्रवाई नहीं की गई।
हालात इतने गंभीर हैं कि यदि कोई नवजात काले रंग का न होकर कुछ साफ रंग का पैदा होता है तो मां डरती है क्योंकि उसके बच्चे को बाहरी व्यक्ति के संपर्क वाला मानते हुए कोई भी ‘जारवा’ व्यक्ति हत्या कर सकता है, और उसकी कोई सुनवाई तक नहीं होगी।
सरकारी आदेश के कारण पुलिस नहीं करती कार्रवाई
ऐसे अपराधों को पुलिस द्वारा नजरअंदाज करने का बड़ा कारण जारवा जनजाति की मूलभूत पहचान को अक्षुण्य बनाए रखने के लिए सरकारी आदेश हैं। यहां पदस्थ इंस्पेक्टर रिजवान हसन के पास इस बाबत स्पष्ट आदेश हैं।
यहां के शासकीय फिजीशियन डॉ. रतन चंद्रकर ने काफी समय तक जारवा लोगों के साथ काम किया है। उन्होंने अपने एक वृतांत में लिखा है कि यह जनजाति समाज में जीन की शुद्धि को लेकर काफी जागरूक रहती है।
उन्होंने बताया कि ‘‘पिछले 12 साल के उनके कार्यकाल में करीब सात मामले ऐसे थे।’’ डॉ. रतन ने आगे लिखा कि ‘‘मैं चूंकि इस जनजाति की परम्परा को जानता हूं इसलिए मैंने कभी इसमें हस्तक्षेप नहीं किया।’’