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सरकार गरीबी मापने के बजाए गरीबी दूर करने का करेगी प्रयास

Sat, 19 Mar 2016 03:36 AM IST
राजीव जायसवाल/ अमर उजाला, नई दिल्ली
राजीव जायसवाल/ अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sat, 19 Mar 2016 03:36 AM IST
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government will try to away poverty  from country  rather than measure poverty
- फोटो : Reuters

मोदी सरकार गरीबी रेखा की परिभाषा तय करने के बजाए गरीबी खत्म करने पर जोर देना चाहती है। सरकार एक ऐसी नीति बनाने पर विचार कर रही है, जिसमें लाभार्थियों को सरकारी मदद के रूप में राशन के गेहूं, चीनी और चावल के बदले आधार नंबर के जरिए नगद रुपया उनके बैंक खातों में  पहुंचाया जा सके। इससे सब्सिडी की चोरी पर तो लगाम लगेगी ही, सत्तारूढ़ भाजपा सरकार को इसका भरपूर राजनीतिक फायदा भी मिलेगा।

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सरकारी सूत्रों के अनुसार इस योजना को अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव से पहले लागू किया जा सकता है। संसद आधार बिल को मनी बिल की तरह पास कर ही चुकी है और अब सिर्फ राष्ट्रपति की मुहर लगना बाकी है।
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एक उच्च पदस्थ सरकारी अधिकारी के अनुसार मोदी सरकार पिछली सरकार की तरह गरीबी रेखा तय करने में समय बर्बाद नहीं करना चाहती है, बल्कि वह गरीबी हटाने के कार्यक्रमों को जोर-शोर से लागू करना चाहती है। पिछली सरकार में तेंदुलकर समिति द्वारा तैयार की गई गरीबी रेखा के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में एक दिन में 27 रुपये से कम कमाने वाले व्यक्ति को गरीबी रेखा से नीचे माना गया था। उसी तरह शहरी क्षेत्रों में 33 रुपये प्रति दिन से कम कमाने वाले को गरीब माना गया था।
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हालांकि विपक्ष की आलोचना के बाद रंगराजन समिति द्वारा इसे थोड़ा बढ़ा कर गांवों के लिए 32 रुपये प्रति दिन आमदनी और शहरों के लिए 47 रुपये प्रति दिन आमदनी तय किया गया। इसकी वजह से तत्कालीन सरकार की काफी किरकिरी हुई थी। लोगों का मानना था कि गरीबी की ये परिभाषा सही नहीं है और इतनी कम आमदनी में किसी का गुजारा होना संभव नहीं है। इसी आलोचना से बचने के लिए मोदी सरकार जरूरत की वस्तुओं को सिर्फ  गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों तक सीमित नहीं रखना चाहती है और इसे उन परिवारों को भी देना चाहती है जो गरीबी रेखा के थोड़े ऊपर तो हैं लेकिन जरूरतमंद हैं।

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