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बुजुर्गों ने बदली सोच तो बढ़ गईं बेटियां
अंकित चौहान/ अमर उजाला, सोनीपत
Updated Mon, 06 Mar 2017 05:45 PM IST
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जिस प्रदेश के दामन पर बेटियों को कोख में मारने का दाग लगा हुआ था। उसी प्रदेश के एक गांव ने इस दाग को केवल धोया ही नहीं, बल्कि ऐसी तस्वीर बदली कि हर कोई चौंक गया। यह सबकुछ वहां के बुजुर्गों की सोच बदलने के कारण हुआ और उसका सबसे बड़ा श्रेय पांच साल पहले गांव की बागड़ौर संभालने वाली बुजुर्ग महिला सरपंच को जाता है। जिसने अशिक्षित होने के बाद भी रूढ़ीवादी सोच से खुद बाहर निकलकर लोगों को नई राह दिखाई और उस गांव में आज बेटों से ज्यादा बेटियां हैं।
बेटियों को बढ़ावा देने के लिए भले ही पूरे हरियाणा की सोच बदली हो, लेकिन सोनीपत जिले के राई गांव के बुजुर्गों ने जितनी तेजी से अपनी सोच को बदलकर बेटियों को बढ़ावा दिया है। ऐसा प्रदेश में किसी भी जगह नहीं हुआ है और यह कोई आम आदमी नहीं, बल्कि खुद सरकार के आंकड़े भी बोलते हैं।
वहां एक समय ऐसा था कि 2005 तक 1000 लड़कों के मुकाबले के केवल 760 लड़कियां होती थी, जो छह साल में बढ़कर लगभग 825 तक पहुंच गया, लेकिन जिस तरह से आबादी बढ़ रही थी, उसके अनुसार बेटियों की संख्या में यह बढ़ोतरी ना के बराबर थी।
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उसी दौरान गांव की सरपंची की कमान अशिक्षित बुजुर्ग महिला कमला देवी ने संभाली और सरकार की ओर से उनको गांव के लिंगानुपात के बारे में बताया गया। कमला देवी ने तभी बेटियों को कोख में मारने की रूढ़ीवादी सोच को बदलने का बीड़ा उठा लिया और खुद बुजुर्ग लोगों के बीच जाकर बेटियों के प्रति उनकी सोच बदली।
लोगों को बताया गया कि बेटियां भी गांव की तस्वीर बदल सकती है और वह अपने साथ ही उन बेटियों की मिसाल लोगों को देती थी जो पढ़-लिखकर आगे बढ़ गई और परिवार को मेहनत के बल पर गरीबी से उभारा।
उसका ही परिणाम है कि आज गांव में जहां 1000 लड़के है तो वहीं 1205 लड़कियां है। गांव में हुए इस बदलाव के कारण ही सरकार ने पंचायत का सम्मान भी किया और उस सम्मान कार्यक्रम में हर कोई अपनी बेटियों को लेकर पहुंचा। 7 हजार से ज्यादा की आबादी वाले गांव में यह बदलाव कोई कम नहीं है, क्योंकि जिस गांव में लिंगानुपात एक साल में 5-10 प्रतिशत तक बढ़ता था, वहां वह बदलाव 100 गुणा तक पहुंच गया।
सोच अच्छी हो तो हर काम होता है
गांव की सोच बदलने वाली सरपंच रही कमला देवी कहती है कि अगर सोच अच्छी होती है तो हर काम हो सकता है। वह कहती है कि मैंने अपने ही घर से शुरुआत की ओर कभी बेटों को गर्भ में जांच नहीं कराने दी, जिसका यह असर है कि मेरे ही घर में चार पोते व पांच पोतियां हैं। क्योंकि जब दूसरों को बदलने निकले तो पहले खुद को बदलना पड़ता है और उसके बाद उस बदलाव का असर भी दिखाई देता है। मैंने केवल बेटियां बढ़ाने के लिए ही नहीं कहा था, बल्कि उनको पढ़ाने के लिए भी कहा था और आज हमारे यहां हर घर के बेटी पढ़ती है।
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बेटियों को बढ़ावा देने के लिए भले ही पूरे हरियाणा की सोच बदली हो, लेकिन सोनीपत जिले के राई गांव के बुजुर्गों ने जितनी तेजी से अपनी सोच को बदलकर बेटियों को बढ़ावा दिया है। ऐसा प्रदेश में किसी भी जगह नहीं हुआ है और यह कोई आम आदमी नहीं, बल्कि खुद सरकार के आंकड़े भी बोलते हैं।
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वहां एक समय ऐसा था कि 2005 तक 1000 लड़कों के मुकाबले के केवल 760 लड़कियां होती थी, जो छह साल में बढ़कर लगभग 825 तक पहुंच गया, लेकिन जिस तरह से आबादी बढ़ रही थी, उसके अनुसार बेटियों की संख्या में यह बढ़ोतरी ना के बराबर थी।
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उसी दौरान गांव की सरपंची की कमान अशिक्षित बुजुर्ग महिला कमला देवी ने संभाली और सरकार की ओर से उनको गांव के लिंगानुपात के बारे में बताया गया। कमला देवी ने तभी बेटियों को कोख में मारने की रूढ़ीवादी सोच को बदलने का बीड़ा उठा लिया और खुद बुजुर्ग लोगों के बीच जाकर बेटियों के प्रति उनकी सोच बदली।
लोगों को बताया गया कि बेटियां भी गांव की तस्वीर बदल सकती है और वह अपने साथ ही उन बेटियों की मिसाल लोगों को देती थी जो पढ़-लिखकर आगे बढ़ गई और परिवार को मेहनत के बल पर गरीबी से उभारा।
उसका ही परिणाम है कि आज गांव में जहां 1000 लड़के है तो वहीं 1205 लड़कियां है। गांव में हुए इस बदलाव के कारण ही सरकार ने पंचायत का सम्मान भी किया और उस सम्मान कार्यक्रम में हर कोई अपनी बेटियों को लेकर पहुंचा। 7 हजार से ज्यादा की आबादी वाले गांव में यह बदलाव कोई कम नहीं है, क्योंकि जिस गांव में लिंगानुपात एक साल में 5-10 प्रतिशत तक बढ़ता था, वहां वह बदलाव 100 गुणा तक पहुंच गया।
सोच अच्छी हो तो हर काम होता है
गांव की सोच बदलने वाली सरपंच रही कमला देवी कहती है कि अगर सोच अच्छी होती है तो हर काम हो सकता है। वह कहती है कि मैंने अपने ही घर से शुरुआत की ओर कभी बेटों को गर्भ में जांच नहीं कराने दी, जिसका यह असर है कि मेरे ही घर में चार पोते व पांच पोतियां हैं। क्योंकि जब दूसरों को बदलने निकले तो पहले खुद को बदलना पड़ता है और उसके बाद उस बदलाव का असर भी दिखाई देता है। मैंने केवल बेटियां बढ़ाने के लिए ही नहीं कहा था, बल्कि उनको पढ़ाने के लिए भी कहा था और आज हमारे यहां हर घर के बेटी पढ़ती है।