फेयर स्टार्ट: मासूमों के दर्द की कहानी बयां करती एक फिल्म
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उनके चेहरे और कपड़े मैले-कुचैले होते हैं, चेहरे बेशक मुरझाए लगें, लेकिन वे खिलखिलाते हुए भी नजर आ जाते हैं। वे घोर गरीबी में जन्म लेते हैं, कुपोषण का दंश झेलते हैं। वे घातक बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं। बाल मजदूरी उन्हें विरासत में मिलती है। समाज के ऐसे ही हालात के मारे बच्चों और संपन्न घरानों के बच्चों के बीच फैली असमानता को उजागर करती एक छोटी सी फिल्म 'फेयर स्टार्ट'। इसे कुछ बच्चों ने ही बनाया है। यूनिसेफ की यह फिल्म जब आई तो खूब वायरल हुई।
बेहद संवेदनशील मुद्दे पर आधारित इस फिल्म में दिखाया गया है कि हमारे आसपास कितनी असमानता व्याप्त है, लेकिन हमारी नजर नहीं जाती। फिल्म में शिक्षा, स्वच्छता, कम उम्र में शादी जैसे विषयों को बहुत ही बेहतर तरीके से पेश किया गया है।
'फेयर स्टार्ट' कार्यक्रम के साथ अमर उजाला फाउंडेशन की एक मुहिम
'फेयर स्टार्ट' में हमारे आसपास मौजूद बच्चों के बीच फैली असमानता के आंकड़ों का भी जिक्र किया गया है। बताया गया है कि देश में इस समय करीब 61 लाख बच्चे स्कूल नहीं जा पाते हैं। एक करोड़ बच्चे मजदूरी करने को विवश हैं।
करीब साढ़े तीन हजार बच्चे हर रोज दम तोड़ देते हैं, इनमें से ज्यादातर बच्चे तो पांच साल की उम्र भी पार नहीं कर कर पाते हैं।
तकरीबन 42 फीसदी आदिवासी बच्चे पनप नहीं पाते और करीब 56 करोड़ बच्चे आज भी खुले में शौच जाते हैं। बच्चों की समस्याओं पर बनी फिल्म के बाद संस्था 'फेयर स्टार्ट' नाम से ही कार्यक्रम चला रही है।