एक्सप्लेनर: पार्टी में फूट पड़े तो कैसे तय होता है किसे मिलेगा नाम-निशान, टीएमसी से पहले कब-कब मचा ऐसा घमासान?
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विस्तार
पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर विवाद गहरा गया है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट और बागी गुट के बीच जारी खींचतान अब चुनाव आयोग तक पहुंच चुकी है। 17 सितंबर को आयोग ने अंतरिम आदेश में दोनों गुटों को आगामी उपचुनाव में 'ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' नाम और उसके आरक्षित 'फूल और घास' चुनाव चिह्न के इस्तेमाल से रोक दिया।
ममता बनर्जी ने आयोग के इस फैसले पर नाराजगी जताते हुए इसे असंवैधानिक बताया। दोनों गुटों को आगामी उपचुनाव के लिए अलग नाम और चुनाव चिह्न आवंटित किया गया है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि यह अंतरिम व्यवस्था अंतिम निर्णय होने तक लागू रहेगी।
ऐसे में आइए जानते हैं कि टीएमसी में विवाद कैसे शुरू हुआ? चुनाव आयोग ने क्या फैसला लिया? चुनाव चिह्न का आवंटन कौन करता है? चुनाव चिह्न को लेकर नियम क्या कहते हैं? चुनाव चिह्न जब्त करने का नियम क्या है? चुनाव आयोग कैसे तय करता है कि चुनाव चिह्न किसे मिलेगा? चुनाव चिह्न को लेकर राजनीतिक पार्टियों में कब-कब हुई लड़ाई?
टीएमसी में विवाद कैसे शुरू हुआ?
तृणमूल कांग्रेस में विभाजन की स्थिति मई में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद सामने आई। 3 जून को 58 बागी विधायकों ने पार्टी के विधायी दल पर अपना दावा पेश किया और ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुना। विधानसभा अध्यक्ष ने भी इस दावे को मान्यता दी। इसके बाद बागी गुट ने पार्टी के संगठन और नेतृत्व पर भी अपना दावा पेश कर दिया।
22 जून को ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट ने ममता बनर्जी को हटाकर अरूप रॉय को पार्टी का अध्यक्ष घोषित किया और समानांतर संगठनात्मक ढांचा पेश किया। यह टीएमसी के 28 साल के इतिहास में पहली बड़ी टूट के रूप में सामने आया।
इसके बाद दोनों गुटों ने खुद को असली टीएमसी बताते हुए पार्टी के संगठन, नाम और चुनाव चिह्न पर दावा किया। मामला चुनाव आयोग पहुंचा। आयोग ने दोनों पक्षों की दलीलें और दस्तावेज सुने और 17 सितंबर को अंतरिम आदेश जारी किया।
चुनाव आयोग ने अभी क्या फैसला दिया?
आयोग ने फिलहाल किसी एक गुट को मूल टीएमसी का नाम और ‘फूल-घास’ चुनाव चिह्न नहीं दिया है। दोनों गुटों को आगामी उपचुनाव के लिए अलग नाम और फ्री सिंबल चुनने को कहा गया। इसके बाद ममता गुट को ममता अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस नाम और फुटबॉल खिलाड़ी चुनाव चिह्न मिला है। वहीं, ऋतब्रत गुट को लोकतांत्रिक तृणमूल कांग्रेस नाम और लिफाफा चुनाव चिह्न आवंटित किया है। आयोग ने कहा कि विवाद पर चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के पैरा 15 के तहत विस्तृत फैसला जरूरी है।
भारत में चुनाव चिह्नों की जरूरत क्यों पड़ी?
मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अनुसार आजादी के वक्त 1947 में देश की साक्षरता दर मात्र 14 प्रतिशत थी और महिला साक्षरता तो महज आठ प्रतिशत थी। देश की बड़ी आबादी अशिक्षित थी। मतदाताओं के लिए उम्मीदवारों और पार्टियों के नाम पढ़ पाना आसान नहीं था। ऐसे में चुनाव आयोग ने हर उम्मीदवार और पार्टी को एक अलग पहचान देने के लिए चुनाव चिह्नों की व्यवस्था की। यही वजह है कि चुनाव चिह्न भारतीय राजनीति की पहचान बन गए।
चुनाव चिह्न का आवंटन कौन करता है?
भारत में चुनाव चिह्नों का आवंटन निर्वाचन आयोग करता है। भारत निर्वाचन आयोग के अनुसार, संसद और राज्यों की विधानसभाओं के चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण संविधान द्वारा निर्वाचन आयोग को सौंपा गया है। ऐसे में लोकसभा और विधानसभा चुनावों की विश्वसनीयता बनाए रखने व चुनावों को निष्पक्ष और प्रभावी तरीके से संचालित करने के लिए चुनाव चिह्नों का निर्धारण, आरक्षण और आवंटन आवश्यक माना गया। इसी उद्देश्य से राजनीतिक दलों की मान्यता, चुनाव चिह्नों के आवंटन और उनसे जुड़े अन्य मामलों को विनियमित करने के लिए Election Symbols (Reservation and Allotment) Order, 1968 लागू किया गया। यह व्यवस्था पूरे भारत में संसदीय और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों में लागू होती है।
चुनाव चिह्न कितने प्रकार के होते हैं?
चुनाव आयोग चुनाव चिह्नों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटता है।
1. आरक्षित चुनाव चिह्न
ये चिह्न राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय मान्यता प्राप्त दलों के लिए सुरक्षित होते हैं। इन चिह्नों का इस्तेमाल कोई दूसरी पार्टी नहीं कर सकती।
उदाहरण के लिए:
- भाजपा- कमल
- कांग्रेस- हाथ
- बहुजन समाज पार्टी- हाथी (असम को छोड़कर)
- आम आदमी पार्टी- झाड़ू
2. फ्री सिंबल
जो चिह्न किसी मान्यता प्राप्त पार्टी के लिए आरक्षित नहीं हैं, वे फ्री सिंबल कहलाते हैं। इनका इस्तेमाल गैर-मान्यता प्राप्त दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों को आवंटित किया जाता है। मार्च 2021 तक चुनाव आयोग की सूची में 190 से ज्यादा फ्री सिंबल मौजूद थे। इनमें कूलर, बैलून, टूथब्रश, मिक्सर, डोरबेल, अंगूर, कटहल, केक, टॉफी और रोजमर्रा के इस्तेमाल की कई वस्तुएं शामिल हैं।
क्या कोई नई पार्टी अपनी पसंद का चिह्न मांग सकती है?
इसका जवाब है हां, जब कोई गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल चुनाव लड़ता है तो वह चुनाव आयोग को फ्री सिंबल की सूची में से अपनी पसंद के कई विकल्प दे सकता है। इसके अलावा नियम यह भी अनुमति देते हैं कि पार्टी तीन नए प्रतीकों का प्रस्ताव भी दे सकती है। इसके लिए उसे प्रतीक का डिजाइन, चित्र और प्राथमिकता क्रम आयोग को देना होता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आयोग हर मांग मान लेगा। अंतिम फैसला पूरी तरह चुनाव आयोग के हाथ में होता है।
चुनाव चिह्न जब्त करने का नियम क्या है?
जब भी पार्टियां टूटती हैं तो उनके चुनाव चिह्न पर दावे को लेकर विवाद उत्पन्न होने की संभावना रहती है। ईसीआई प्रतीक आदेश, 1968 के पैरा 15 का उपयोग करते हुए मामले पर निर्णय देता है। चुनाव आयोग के पास किसी राजनीतिक दल में इसके अधिकार से जुड़े विवाद पर चुनाव चिह्न को जब्त करने की शक्ति है। ईसीआई को 1968 के आदेश के तहत राजनीतिक दलों को पहचान देने और चिह्न आवंटित करने का भी अधिकार है।
चुनाव आयोग कैसे तय करता है कि चुनाव चिह्न किसे मिलेगा?
1968 के आदेश का पैरा 15 कहता है, 'जब आयोग संतुष्ट हो जाता है कि किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल में प्रतिद्वंद्वी वर्ग या समूह बन गए हैं और दोनों ही दल पर दावा कर रहे हैं। तब आयोग मामले के सभी उपलब्ध तथ्यों, परिस्थितियों को ध्यान में रखकर और उनके प्रतिनिधियों या सुनवाई के इच्छुक अन्य व्यक्तियों को सुनने के बाद निर्णय ले सकता है। यह निर्णय ऐसे सभी प्रतिद्वंद्वी वर्गों या समूहों पर बाध्यकारी होगा।'
चुनाव आयोग किन बातों पर करता है विचार?
- पार्टी का संविधान: पार्टी के नियम और संगठन की व्यवस्था क्या कहती है।
- संगठनात्मक ढांचा: पार्टी के संगठन में किस गुट की स्थिति मजबूत है।
- संगठनात्मक चुनाव: पार्टी में पदाधिकारियों का चुनाव किस प्रक्रिया से हुआ।
- विधायी दल का समर्थन: कितने सांसद और विधायक किस गुट के साथ हैं।
- दोनों गुटों के दस्तावेज: अपने दावे के समर्थन में दोनों पक्ष क्या रिकॉर्ड पेश करते हैं।
- मामले के तथ्य और परिस्थितियां: विवाद से जुड़े सभी उपलब्ध तथ्यों पर विचार।
- दोनों पक्षों की सुनवाई: संबंधित गुटों के प्रतिनिधियों की दलीलें सुनी जाती हैं।
यह मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय और राज्य पार्टियों के विवादों पर लागू होता है, लेकिन इनके अलावा अन्य पार्टियों में विवाद पर ईसीआई आमतौर पर प्रतिद्वंद्वी गुटों को अपने मतभेदों को आंतरिक रूप से सुलझाने या अदालत का दरवाजा खटखटाने की सलाह देता है। हालांकि, 1968 से पहले चुनाव आयोग चुनाव संचालन नियम, 1961 के तहत अधिसूचनाएं और कार्यकारी आदेश जारी करता था।
उस समूह का क्या होता है जिसे मूल पार्टी का प्रतीक नहीं मिलता?
चुनाव आयोग ने एक नया नियम पेश किया जिसके तहत पार्टी से अलग हुए समूह (उस समूह के अलावा जिसे पार्टी का प्रतीक मिला है) को खुद को एक अलग पार्टी के रूप में पंजीकृत करना होगा। इसके साथ ही गुट केवल पंजीकरण के बाद राज्य या आम चुनावों में प्रदर्शन के आधार पर राष्ट्रीय या राज्य पार्टी का दर्जा पाने का दावा कर सकता है।
चुनाव चिह्न को लेकर राजनीतिक पार्टियों में कब-कब हुई लड़ाई?
भारत में चुनाव चिह्न को लेकर राजनीति पार्टियों के बीच लड़ाई का इतिहास रहा है।
एनसीपी का मामला
एनसीपी में शरद पवार और अजित पवार गुट के बीच पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर विवाद हुआ। मामला चुनाव आयोग तक पहुंचा, जहां आयोग ने 6 फरवरी 2024 को अजित पवार गुट को असली एनसीपी माना और ‘घड़ी’ चुनाव चिह्न उसके पास रखा। शरद पवार गुट को अलग नाम ‘राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी-शरदचंद्र पवार’ और ‘तुरही बजाता आदमी’ चुनाव चिह्न दिया गया।
शिवसेना में चुनाव चिह्न की लड़ाई
जून 2022 में शिवसेना में बगावत के महीनों बाद पार्टी के प्रतीक और नाम पर नियंत्रण को लेकर एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे के बीच अदालती लड़ाई शुरू हुई थी। महाराष्ट्र में एक मान्यता प्राप्त राज्य पार्टी शिवसेना के उद्धव और शिंदे गुट 'असली' शिवसेना के रूप में मान्यता के लिए खींचतान में लगे हुए थे। जिसके बाद अक्तूबर 2022 में एक अंतरिम आदेश में चुनाव आयोग ने अस्थायी रूप से शिवसेना के चुनाव चिह्न 'धनुष और तीर' को जब्त कर दिया। एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले शिवसेना के दो गुट ढाल तलवार और मशाल को नए चुनाव चिह्न आवंटित किए। इसके बाद दोनों पक्षों ने चुनाव आयोग के सामने अपना-अपना पक्ष रखा। दोनों पक्षों के दावे की जांच के बाद आयोग ने शिंदे गुट को असली शिवसेना और चुनाव चिह्न आवंटित कर दिया।
लोक जनशक्ति पार्टी में चली चाचा-भतीजे की लड़ाई
जून 2021 में चुनाव आयोग ने लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) के 'बंगला' चुनाव चिह्न को जब्त कर लिया। तब दिवंगत राम विलास पासवान के बेटे चिराग पासवान और पशुपति कुमार पारस के नेतृत्व वाली पार्टी में दो गुट बंट गए थे। चुनाव आयोग ने दोनों गुटों को अपने प्रतीक के रूप में 'बंगला' का उपयोग करने से प्रतिबंधित कर दिया। पशुपति कुमार पारस ने छह सांसदों के साथ मिलकर चिराग पासवान के खिलाफ बगावत कर दी और चिराग को बाहर कर दिया।
एआईएडीएमके का हाल
तमिलनाडु की राजनीतिक पार्टी एआईएडीएमके में चुनाव चिह्न की लड़ाई 2016 में दिसंबर में तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता के निधन के बाद शुरू हुई। तब एआईएडीएमके के एक खेमे का नेतृत्व ओ. पन्नीरसेल्वम ने किया था और दूसरे की कमान वीके शशिकला ने था। चुनाव चिह्न को लेकर लड़ाई हुई, तो चुनाव आयोग ने इसे फ्रीज कर दिया।
अपना फैसला सुनाते हुए चुनाव आयोग ने कहा कि विवाद को खत्म करने से पहले दोनों गुट आधिकारिक प्रतीक या नाम का इस्तेमाल नहीं कर सकते। फिर मार्च 2017 में चुनाव आयोग ने दोनों गुटों को दो अलग-अलग नाम दिए। ओ पन्नीरसेल्वम के गुट को एआईएडीएमके (पुरैची थलाइवी अम्मा) नाम दिया गया, जबकि ई. पलानीस्वामी के गुट को एआईएडीएमके (अम्मा) की पहचान मिली। हालांकि, बंटवारे के छह महीने बाद अगस्त 2017 में दोनों गुटों का औपचारिक रूप से विलय हो गया।
जनता पार्टी का चिह्न वापस
जनता दल में विलय के बाद जनता पार्टी का मूल चिह्न (हल लिए किसान) को वापस ले लिया गया। विभिन्न क्षेत्रीय दलों में विभाजित होने के बाद जनता दल का मूल प्रतीक पहिया भी जब्त कर लिया गया था। 1994 में जॉर्ज फर्नांडीस और नीतीश कुमार ने पहले जनता दल से अलग होने के बाद समता पार्टी की स्थापना की। तब चुनाव आयोग ने समता पार्टी को 'जलती हुई मशाल' चुनाव चिह्न दिया था।
जब कांग्रेस हुई दो फाड़
1969 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में पहली बार बंटवारा हुआ। तीन मई 1969 को राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन की मृत्यु के बाद पार्टी के भीतर एक गुट इंदिरा गांधी के खिलाफ हो गया। के कामराज, नीलम संजीव रेड्डी, एस निजलिंगप्पा और अतुल्य घोष के नेतृत्व में कांग्रेस के पुराने नेता (सिंडिकेट गुट) के रूप में जाने जाते थे। सिंडिकेट ने रेड्डी को इस पद के लिए नामांकित किया। तब प्रधानमंत्री इंदिरा ने उपराष्ट्रपति वीवी गिरि को निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ने के लिए समर्थन जताया।
गिरि के जीतने के बाद इंदिरा को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया और पार्टी निजलिंगप्पा के नेतृत्व वाली पुरानी कांग्रेस (ओ) और इंदिरा के नेतृत्व वाली नई कांग्रेस (जे) में बंट गई। पुरानी कांग्रेस ने दो बैलों की जोड़ी के पार्टी चिह्न को बरकरार रखा, जबकि अलग हुए गुट को बछड़े के साथ गाय का प्रतीक दिया गया।
सीपीआई में बंट गए धड़े
1968 से पहले किसी पार्टी का सबसे हाई-प्रोफाइल बंटवारा 1964 में सीपीआई का था। एक अलग हुआ समूह दिसंबर 1964 में ईसीआई पहुंचा और उनसे सीपीआई (मार्क्सवादी) के रूप में मान्यता देने का आग्रह किया। उन्होंने आंध्र प्रदेश, केरल और पश्चिम बंगाल के उन सांसदों और विधायकों की सूची प्रदान की, जिन्होंने उनका समर्थन किया था। ईसीआई ने इस गुट को सीपीआई (एम) के रूप में मान्यता दी। इस दौरान आयोग ने पाया कि अलग हुए समूह का समर्थन करने वाले सांसदों और विधायकों द्वारा प्राप्त वोट तीन राज्यों में चार फीसदी से अधिक था।