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निष्क्रिय इच्छामृत्यु तो ठीक पर लिविंग विल की इजाजत नहीं : केंद्र सरकार

Wed, 11 Oct 2017 04:24 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली
ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 11 Oct 2017 04:24 AM IST
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Euthanasia is ok but living will not allow says supreme court
supreme court
केंद्र सरकार ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि वह निष्क्रिय इच्छामृत्यु (पैसिव यूथनेसिया) के पक्ष में है लेकिन वह लिविंग विल (इच्छामृत्यु की वसीहत) के खिलाफ है। सरकार ने कहा है कि लिविंग विल का दुरूपयोग संभव है। 
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केंद्र सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल पीएस नरसिंहा ने चीफ जस्टिस दिपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ केसमक्ष कहा कि सरकार ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु को लेकर बिल का मसौदा तैयार कर लिया है जिसके तहत न ठीक होने वाली बीमारी से पीड़ित मरीजों को इलाज से मना करने की इजाजत होगी। 
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हालांकि नरसिंहा ने कहा कि लिविंग विल की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। यानी लाइलाज बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति को विल (वसीहत) के जरिए इलाज को रोकने की इजाजत नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा कि इसका दुरूपयोग होगा। यह सैद्धांतिक रूप से भी सही नहीं है। 
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नरसिंहा ने कहा कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने ‘दी मेडिकल ट्रीटमेंट ऑफ टर्मिनली इल पेंसेंट(प्रोटेक्शन ऑफ पेसेंट एंड मेडिकल प्रैक्टिसनर्स) बिल’  का मसौदा तैयार कर लिया है।

निष्क्रिय इच्छामृत्यु केमामले में मेडिकल बोर्ड यह निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होगा कि मरीज से लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाया जाना चाहिए या नहीं। उन्होंने कहा कि विधि आयोग की सिफारिश के आधार पर बिल का मसौदा तैयार किया गया है।

सुनवाई के दौरान संविधान पीठ ने कहा कि जीने के अधिकार में मरने का अधिकार निहित नहीं है, लिहाजा व्यक्ति और राज्य के हितों में संतुलन जरूरी है। पीठ ने कहा कि नागरिकों को संरक्षण देना राज्य का दायित्व है। 

पीठ ने यह भी कहा कि अगर हम सम्मान के साथ मरने का अधिकार देते हैं तो क्यों नहीं मृत्यु की प्रक्रिया का सम्मान होना चाहिए। पीठ ने यह जानना चाहा कि ऐसे मामलों को डॉक्टरों की क्या जिम्मेदारी होनी चाहिए। किस स्थिति में नाइलाज बीमारी से पीड़ित मरीज के इलाज रुकवा सकता है। 

पीठ ने कहा कि ऐसा सिर्फ मेडिकल बोर्ड की सलाह पर होना चाहिए। पीठ ने कहा कि अगर हम सभी को लिविंग विल की इजाजत देते हैं तो क्या ऐसा करना नैतिक तौर पर या समाजिक तौर पर सुरक्षित होगा। 


मालूम हो कि अदालत कॉमन काउज की याचिका पर सुनवाई कर रही है। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि लाइलाज बीमारी से ग्रस्ति व्यक्ति के बारे में दूसरों को तो निर्णय लेने अधिकार है लेकिन मरीज को नहीं है। मानसिक रूप से दुरूस्त व्यक्ति को लिविंग विल का अधिकार मिलना चाहिए। सुनवाई बुधवार को भी जारी रहेगी। 
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