Shiv Sena Rift: शिंदे गुट को ही चुनाव आयोग ने क्यों दिया तीर-कमान, कैसे मिला बागियों को शिवसेना का नाम?
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विस्तार
चुनाव आयोग ने शिवसेना के दो गुटों में जारी पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न की लड़ाई पर फैसला सुना दिया है। आयोग ने पार्टी का नाम और चुनाव निशान शिंदे गुट को दे दिया है। आयोग ने 78 पेज के आदेश में पूरे विवाद के बारे में विस्तार में बताते हुए कहा कि शिंदे गुट के पास ज्यादा समर्थन है।
आइये जानते हैं आयोग ने अपने फैसले में क्या-क्या कहा है? शिंदे गुट को किस आधार पर पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न दिया है? आयोग के फैसले पर एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे ने क्या कहा? क्या पहले भी इस तरह के बागी गुटों को पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न मिला है?
आयोग ने अपने फैसले में क्या-क्या कहा है?
- चुनाव आयोग ने अपने फैसले में कहा कि सुनवाई के दौरान आयोग ने पाया कि शिवसेना का मौजूदा संविधान अलोकतांत्रिक है। बिना किसी चुनाव के पार्टी के पदाधिकारियों को अलोकतांत्रिक रूप से नियुक्त करके इसे विकृत कर दिया गया है। आयोग ने अपने आदेश में कहा कि चुनाव आयोग ने पाया कि शिवसेना के संविधान मं 2018 में बदलाव किया गया, लेकिन इसकी कोई जानकारी चुनाव आयोग को नहीं दी गई। ऐसे में ये बदलाव लागू नहीं होते हैं।
- चुनाव आयोग ने यह भी देखा कि 1999 में चुनाव आयोग द्वारा शिवसेना के मूल संविधान के अलोकतांत्रिक मानदंडों को स्वीकार नहीं किया गया था। इन अलोकतांत्रिक मानदंड़ों को गुप्त तरीके से वापस लाया गया। इसकी वजह से पार्टी एक जागीर के समान हो गई।
शिंदे गुट को किस आधार पर पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न दिया है?
चुनाव आयोग ने अपने आदेश में कहा कि आयोग ने पाया कि शिंदे गुट के पास 40 विधायकों का समर्थन है। इसके साथ ही शिंदे गुट ने पार्टी के कुल 47,82,440 वोट में से 36,57,327 वोट का समर्थन हासिल किया। जो कुल संख्या का करीब 76 फीसदी है। वहीं, उद्धव गुट के पास कुल 55 में केवल 15 विधायकों के साथ 11,25,113 वोट का समर्थन है। संख्या बल में ज्यादा समर्थन के आधार पर शिंदे गुट को शिवसेना का नाम और चुनाव निशान दे दिया गया।
आयोग के फैसले पर एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे गुट ने क्या कहा?
एकनाथ शिंदे ने आयोग के फैसले पर कहा, 'चुनाव आयोग के फैसले का मैं स्वागत करता हूं। यह बाला साहेब ठाकरे और आनंद दिघे के विचारों की जीत हैं। यह सत्य की जीत है। मैं चुनाव आयोग को धन्यवाद कहता हूं।' वहीं, उद्धव गुट की ओर से संजय राउत ने ट्वीट किया। राउत ने आरोप लगाया कि देश तानाशाही की ओर बढ़ रहा है। पटकथा पहले से लिखी जा चुकी थी। जनता हमारे साथ है। परिणाम हमारे पक्ष में होगा।
शिंदे गुट के किस नियम से मिला तीर-कमान?
1968 का इलेक्शन सिंबल्स (रिजर्वेशन एंड अलॉटमेंट) ऑर्डर चुनाव आयोग (ईसी) को किसी पार्टी के चुनाव चिह्न पर फैसला लेने की छूट देता है। चुनाव चिह्न किसे मिलेगा, इसका फैसला करने के लिए निर्वाचन आयोग पूरी तरह स्वतंत्र है। इस नियम के मुताबिक, "चुनाव आयोग एक ही पार्टी में दो विपक्षी धड़ों की बात को पूरी तरह सुनता है, सभी तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करता है। इसके बाद चुनाव आयोग ने दोनों धड़ों के प्रतिनिधियों की बात सुनी। दोनों पक्षों से अपने-अपने दावे के पक्ष में दस्तावेज चुनाव आयोग को दिए। इसके बाद चुनाव चिह्न शिंदे गुट को दिए जाने का फैसला चुनाव आयोग ने सुनाया।"
भारतीय राजनीति के पुराने उदाहरण क्या कहते हैं?
पार्टियों में इस तरह की लड़ाई के कई उदाहरण हैं। कभी लड़ाई कुछ महीने में खत्म हो गई तो कभी ये वर्षों चली। कभी चुनाव आयोग ने बागी गुट को असली पार्टी माना। कभी बागी गुट को पार्टी और सिंबल दिया। कभी दोनों गुटों को नया सिंबल मिला। ऐसे कई उदाहरण हैं जिनमें बगावत होने पर पार्टी उस धड़े के पास गई जिसके पास ज्यादा विधायकों और सासंदों का समर्थन था। जैसे- 1969 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पार्टी से निकाला गया तब उनके धड़े को कांग्रेस आर नाम मिला। 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा की पार्टी को दो बैल की जगह गाय और बछड़ा चुनाव चिह्न मिला। बाद में इंदिरा का धड़ा ही असली कांग्रेस के रूप में स्थापित हुआ। इसी तरह 1995 में एन चन्द्रबाबू नायडू, 2016 में अखिलेश यादव की बगावत की। बगावत के वक्त इन लोगों के पास ज्यादातर विधायकों का समर्थन था। मामला चुनाव आयोग में जाने पर इन्हें ही पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न मिला।