कूपन से चंदे पर लगाम जरूरी: चुनाव आयोग
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राजनीतिक पार्टियां दस से बीस रुपये की छोटी रकम के कूपन बेचकर चंदे के तौर पर बड़ी कमाई करती हैं। पार्टियां ये कूपन खुद छापती हैं। कितने कूपन छापने हैं या कूपनों का मूल्य कितना होगा, इसकी कोई सीमा नहीं है। चुनाव आयोग ने कूपन की बिक्री के जरिये चंदे पाने की राजनीतिक पार्टियों के तौर तरीकों पर सवाल उठाते हुए यह बात कही है।
आयोग चाहता है कि केंद्र सरकार इस पर लगाम लगाने और प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के लिए कदम उठाए। चुनाव आयोग ने प्रस्ताव किया है कि राजनीतिक दल छोटी से बड़ी रकम देने वाले सभी दाताओं की जानकारी सार्वजनिक करें। आयोग ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आधार पर राजनीतिक दलों को यह जानकारी मुहैया करानी चाहिए। चुनावी चंदे पर नजर रखने वाली संस्था एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) भी कई बार रिपोर्ट दे चुकी है कि राजनीतिक दलों को चंदे का आधे से ज्यादा हिस्सा कूपनों के जरिये मिलता है।
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के 1996 के कॉमन कॉज ए रजिस्टर्ड सोसायटी बनाम भारत सरकार और अन्य मामले के संबंध में दिए आदेश का जिक्र किया है। साथ ही चुनाव आयोग ने इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट की सिफारिशों को भी आधार बनाया है। आयोग ने कहा है कि उसने फरवरी 2010 में संस्थान को राजनीतिक दलों के खातों की अकाउंटिंग और ऑडिटिंग के बारे में सिफारिशें मांगी थी। संस्थान ने भी सिफारिश की थी कि कूपन की बिक्री से मिलने वाली राशि को विस्तार से बताया जाना चाहिए।
'रकम नकद के रूप में चंदे के तौर पर नहीं लेने के कदम से कुछ फर्क तो पड़ेगा'
एडीआर संस्था के प्रमुख मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) अनिल वर्मा ने अमर उजाला से कहा कि दो हजार रुपये से ज्यादा की रकम नकद के रूप में चंदे के तौर पर नहीं लेने के कदम से कुछ फर्क तो पड़ेगा। मगर जब तक राजनीतिक दलों को दान देने वाले की जानकारी सार्वजनिक करने को नहीं कहा जाएगा, तब तक पारदर्शिता के पैमाने पर सरकार और राजनीतिक दलों की नीयत पर सवाल उठते रहेंगे। कूपन के जरिये दान देने वालों की जानकारी जब सार्वजनिक होगी, तभी पारदर्शिता का पैमाना पूरा होगा।
वर्मा कहते हैं कि चुनावी बांड के जरिये चंदा देने का तरीका तो पारदर्शिता की अवधारणा के बिल्कुल विपरीत है, क्योंकि इसमें भी दाताओं की पहचान छिपाई जाती है। कौन दान दे रहा है, इसके बारे में बैंक, राजनीतिक दल और खुद दान देने वाला ही जानता है। बाकी कोई नहीं जानता है।