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Supreme Court: 'रेवड़ी कल्चर' पर DMK की दलील- कल्याणकारी योजनाएं कमजोर वर्गों के उत्थान के लिए, ये मुफ्त नहीं

Sat, 20 Aug 2022 07:55 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Sat, 20 Aug 2022 07:55 PM IST
सार

इससे पहले बुधवार को राजनीतक दलों के मुफ्त चुनावी वादों (रेवड़ी कल्चर) पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की थी। कोर्ट ने कहा था कि राजनीतिक दलों को लोगों से वादा करने से नहीं रोका जा सकता। सवाल इस बात का है कि सरकारी धन का किस तरह से इस्तेमाल किया जाए।

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DMK TO Supreme Court Welfare schemes help in uplift of weaker sections cannot be termed Freebies
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव में फ्री के वादों पर मची सियासत के बीच द्रमुक ने कहा है कि कल्याणकारी योजनाएं कमजोर वर्गों के उत्थान में मदद करती हैं। इन्हें 'मुफ्त' नहीं कहा जा सकता। चुनाव के दौरान मुफ्त का वादा करने के लिए राजनीतिक दलों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करने वाली वकील अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर याचिका का विरोध करते हुए द्रमुक ने ये बयान दिया है। 

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द्रमुक ने उच्चतम न्यायालय में कहा कि वकील अश्विनी उपाध्याय की याचिका "राजनीति से प्रेरित" है। उन्होंने याचिकाकर्ता पर राजनीतिक दल से संबंध होने के आरोप भी लगाए। द्रमुक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पी विल्सन द्वारा दायर की गई दलीलों में कहा गया है कि कल्याणकारी योजना को 'फ्रीबी' के रूप में वर्गीकृत करने के लिए लागू किए जाने वाले मानदंड इतने कठोर नहीं हो सकते कि सरकार द्वारा अपने नागरिकों को प्रदान की जाने वाली प्रत्येक सेवा को फ्रीबी कहा जा सके।
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डीएमके ने अपनी दलील में कहा है कि केंद्र सरकार विदेशी कंपनियों को टैक्स में छूट दे रही है, प्रभावशाली उद्योगपतियों के कर्ज की माफी की जा रही है। याचिकाकर्ता भारत को समाजवादी देश से पूंजीवादी देश में बदलने की कोशिश कर रहा है और जनहित याचिका राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के उद्देश्यों को विफल कर देगी। 
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इससे पहले बुधवार को राजनीतक दलों के मुफ्त चुनावी वादों (रेवड़ी कल्चर) पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की थी। कोर्ट ने कहा था कि राजनीतिक दलों को लोगों से वादा करने से नहीं रोका जा सकता। सवाल इस बात का है कि सरकारी धन का किस तरह से इस्तेमाल किया जाए। अदालत ने कहा कि "फ्रीबी" शब्द को वास्तविक कल्याणकारी उपायों के साथ भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए।


सुप्रीम कोर्ट ने 25 जनवरी को अधिवक्ता अश्विनी कुमार दुबे के माध्यम से दायर जनहित याचिका पर केंद्र और चुनाव आयोग से जवाब मांगा था, जिसमें चुनाव से पहले 'मुफ्त के वादे' करने वाली राजनीतिक पार्टी के चुनाव निशान को जब्त करने या उसे रद्द करने का निर्देश देने की मांग की गई थी। 

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