भारत में बुरी तरह पिटा था नोटों का तुग़लकी प्रयोग
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भारत में दिल्ली सल्तनत के सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक ने पहली बार साल 1329-1330 में टोकन करेंसी चलाई थी। उन्होंने चीन के नोटों से प्रभावित होकर सोने-चांदी के सिक्कों की जगह तांबे-पीतल के सिक्के चलाए थे. उनका यह प्रयोग बुरी तरह नाकाम रहा।
इसके पहले चीन में चंगेज खां के पोते कुबलाई ख़ान (1260-1264) के शासन में 'छाओ' नामक सांकेतिक काग़ज़ी मुद्रा चलती थी। भारत में काग़ज़ का नोट सबसे पहले जनरल बैंक ऑफ बंगाल एंड बिहार ने 1773 में शुरू किया था। इसके बाद बैंक ऑफ बंगाल, बैंक ऑफ बंबई और बैंक ऑफ मद्रास ने कागजी मुद्राएं जारी की।
इन बैंकों को अपने-अपने सर्किल में नोट जारी करने के अधिकार एक चार्टर के तहत दिया गया था। बैंक ऑफ़ बंगाल की स्थापना 50 लाख रुपए की पूंजी के साथ 1806 में बैंक ऑफ कलकत्ता के रूप में की गई थी। इस बैंक की ओर से जारी नोट पर बैंक का नाम और नोट की क़ीमत (100, 250, 500 रुपए) तीन लिपियों उर्दू, बांग्ला और नागरी में छापी गई थीं।
जेम्स विल्सन ने शुरू की कागजी मुद्रा
कागजी मुद्रा अधिनियम, 1861 के साथ भारत सरकार को नोट जारी करने का एकाधिकार दिया गया। इसके साथ ही प्रेसिडेंसी बैंकों के नोट ख़त्म हो गए। भारत में सरकारी काग़ज़ी मुद्रा शुरू करने का श्रेय पहले वित्त सदस्य जेम्स विल्सन को जाता है।
उनकी असामयिक मौत के कारण भारत में सरकारी काग़ज़ी मुद्रा जारी करने का काम सैम्युल लाइंग ने संभाला। अँग्रेजी राज में कागजी मुद्रा का कामकाज टकसाल मास्टरों, महालेखाकारों और मुद्रा नियंत्रक को दिया गया।
ब्रिटिश इंडिया नोटों के पहले पर सेट रानी विक्टोरिया की तस्वीरें थीं। इसमें 10, 20, 50, 100, 1000 रुपए के नोट जारी किए गए। वर्ष 1903-1911 के बीच 5, 10, 50 और 100 रूपए के नोट रद्द कर दिए गए। पहले विश्व युद्ध के कारण वर्ष 1917 में पहली बार अंग्रेज़ राजा के चित्र वाले एक रुपए और दो रुपए आठ आने के नोट और 1923 में दस रुपए के नोट छापे गए।
1932 से छपने लगे बहुरंगी नोट
साल 1932 से नासिक के सिक्योरिटी प्रेस में पूरे भारत के लिए बहुरंगी नोट छपने लगे। अंग्रेज़ सरकार भारतीय रिज़र्व बैंक की स्थापना होने तक नोट जारी करती रही। 1 अप्रैल 1935 को भारतीय रिजर्व बैंक के केंद्रीय कार्यालय का कलकत्ता में उद्घाटन हुआ।
बंबई, मद्रास, रंगून, कराची, लाहौर और कानपुर में इसकी शाखाएं खुली। साल 1938 में जार्ज छठे के चित्र के साथ पहली बार पांच रूपए के नोट और बाद में 10 रूपए, 100 रूपए, 1,000 रूपए और 10,000 रूपए के नोट जारी किए गए।
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जापान भारत का जाली नोट छाप कर बाज़ार में न उतार दे, इसलिए नोट पर वाटरमार्क लगाया गया। इतना ही नहीं, सुरक्षा उपाय के रूप में पहली बार नोट में सुरक्षा धागा लगाया गया। भारतीय संविधान के लागू होने तक रिज़र्व बैंक से जारी अंग्रेज़ राजा की नोट ही चलते रहे। स्वतंत्र भारत में नोटों पर प्रतीकों का चयन एक महत्त्वपूर्ण बात रही है।
1987 में गांधी के चित्र के साथ जारी हुआ 500 का नोट
भारतीय नोट पर अंग्रेज़ राजा के चित्र को हटाकर महात्मा गांधी का चित्र छापने के हिसाब से डिज़ाइन बनाया गया। पर अंत में सारनाथ के सिंह और अशोक स्तंभ पर आम राय बनी। साल 1954 में दोबारा 1,000 रुपए, 5,000 रूपए और 10,000 रुपए के नोट शुरू किए गए। छठे दशक की मंदी की शुरुआत में बचत के लिहाज से 1967 में नोटों का आकार छोटा कर दिया गया।
रिजर्व बैंक ने वर्ष 1972 में 20 रुपए और 1975 में 50 रुपए के नोटों की शुरुआत की। साल 1946 के बाद 1978 में एक बार फिर बड़े नोटों का विमुद्रीकरण किया गया। अस्सी के दशक में पूरी तरह से नए नोटों के सेट जारी किए गए. इन नोटों पर भारतीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास को दिखाया गया।
इसके अलावा 20 रुपए और 10 रुपए के नोटों पर कोणार्क चक्र और मोर के चित्र छापे गए। साल 1987 में महात्मा गांधी के चित्र के साथ 500 रुपए का नोट पहली बार जारी हुआ।