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MCD Election 2022: नए परिसीमन के बाद क्या-क्या बदला, BJP- AAP और कांग्रेस में से किसे होगा फायदा?
Fri, 04 Nov 2022 05:58 PM IST
हिमांशु मिश्रा
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु मिश्रा
Updated Fri, 04 Nov 2022 05:58 PM IST
सार
परिसीमन के बदलने से चुनाव पर कितना असर होगा? इसका सबसे ज्यादा फायदा किसे होगा? भारतीय जनता पार्टी, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस में किसका पलड़ा भारी? आइए जानते हैं...
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दिल्ली एमसीडी चुनाव
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
दिल्ली में एमसीडी चुनाव (Delhi MCD Election 2022) की तारीख का एलान हो गया है। चार दिसंबर को मतदान होंगे और सात दिसबंर को नतीजों का एलान होगा। इस बार का एमसीडी चुनाव नए परिसीमन के अनुसार होगा। हाल ही में परिसीमन आयोग ने इसका एलान किया था।
ऐसे में आज हम आपको बताएंगे कि परिसीमन के बदलने से चुनाव पर कितना असर होगा? भारतीय जनता पार्टी, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस में किसकी क्या तैयारी है? आइए जानते हैं...
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ऐसे में आज हम आपको बताएंगे कि परिसीमन के बदलने से चुनाव पर कितना असर होगा? भारतीय जनता पार्टी, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस में किसकी क्या तैयारी है? आइए जानते हैं...
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पहले तीन भागों में बंटी थी एमसीडी
पहले दिल्ली नगर निगम (MCD) तीन भागों में बंटा था। उत्तरी दिल्ली, दक्षिण दिल्ली और पूर्वी दिल्ली। पिछले 15 साल से तीनों एमसीडी पर भारतीय जनता पार्टी का कब्जा है। पिछले चुनाव यानी 2017 में नॉर्थ दिल्ली में भाजपा ने 64 वार्डों पर जीत हासिल की थी। आम आदमी पार्टी को 21 और कांग्रेस को 16 वार्डों में जीत मिली थी।
इसी तरह साउथ दिल्ली में भाजपा को 70, आप को 16 और कांग्रेस को 12 वार्डों पर जीत मिली थी। ईस्ट दिल्ली के 47 वार्ड में भाजपा, 12 में आप और तीन पर कांग्रेस के उम्मीदवारों ने जीत का परचम लहराया था। 2012 के चुनाव में मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस का था। तब आम आदमी पार्टी ने चुनाव नहीं लड़ा था।
इसी साल मई में केंद्र सरकार ने तीनों एमसीडी को मिलाकर एक कर दिया है। मतलब अब दिल्ली में तीन की जगह केवल एक मेयर होगा। पहले के मुकाबले इनकी शक्तियां ज्यादा होंगी। अब एक ही मेयर पूरे दिल्ली की जिम्मेदारी संभालेगा। यही नहीं, परिसीमन बदलने के साथ-साथ वार्डों की संख्या भी कम कर दी गई। पहले उत्तरी और दक्षिणी दिल्ली में 104-104 पार्षद की सीटें थीं, जबकि पूर्वी दिल्ली में 64 सीटें हुआ करती थीं। इस तरह से पहले नगर निगम की कुल 272 सीटें थीं, जो अब घटकर 250 रह गईं हैं।
पहले दिल्ली नगर निगम (MCD) तीन भागों में बंटा था। उत्तरी दिल्ली, दक्षिण दिल्ली और पूर्वी दिल्ली। पिछले 15 साल से तीनों एमसीडी पर भारतीय जनता पार्टी का कब्जा है। पिछले चुनाव यानी 2017 में नॉर्थ दिल्ली में भाजपा ने 64 वार्डों पर जीत हासिल की थी। आम आदमी पार्टी को 21 और कांग्रेस को 16 वार्डों में जीत मिली थी।
इसी तरह साउथ दिल्ली में भाजपा को 70, आप को 16 और कांग्रेस को 12 वार्डों पर जीत मिली थी। ईस्ट दिल्ली के 47 वार्ड में भाजपा, 12 में आप और तीन पर कांग्रेस के उम्मीदवारों ने जीत का परचम लहराया था। 2012 के चुनाव में मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस का था। तब आम आदमी पार्टी ने चुनाव नहीं लड़ा था।
इसी साल मई में केंद्र सरकार ने तीनों एमसीडी को मिलाकर एक कर दिया है। मतलब अब दिल्ली में तीन की जगह केवल एक मेयर होगा। पहले के मुकाबले इनकी शक्तियां ज्यादा होंगी। अब एक ही मेयर पूरे दिल्ली की जिम्मेदारी संभालेगा। यही नहीं, परिसीमन बदलने के साथ-साथ वार्डों की संख्या भी कम कर दी गई। पहले उत्तरी और दक्षिणी दिल्ली में 104-104 पार्षद की सीटें थीं, जबकि पूर्वी दिल्ली में 64 सीटें हुआ करती थीं। इस तरह से पहले नगर निगम की कुल 272 सीटें थीं, जो अब घटकर 250 रह गईं हैं।
वार्ड का दायरा बढ़ा और घटा, मतदाताओं की संख्या भी बदल गई
नए परिसीमन के चलते कई वार्ड के दायरों में बदलाव हुए हैं। कई वार्डों का क्षेत्र बढ़ गया है, जबकि कई के घट गए हैं। इसी तरह मतदाताओं की संख्या में भी बदलाव हुआ है। कई वार्ड में मतदाताओं की संख्या घटी है, जबकि कई में बढ़ गई है। वार्ड के संख्या में भी बदलाव किया गया है। मसलन दिल्ली में अब सबसे बड़ा वार्ड मयूर विहार फेज-1 बन गया है। त्रिलोकपुरी और संगम विहार दूसरे और तीसरे नंबर पर है। चांदनी चौक का वार्ड अब सबसे छोटा हो गया है। 42 सीटें एससी कोटे के तहत आरक्षित हैं। अब बदले परिसीमन से जातीय समीकरण में भी बड़ा बदलाव हुआ है।
नए परिसीमन के चलते कई वार्ड के दायरों में बदलाव हुए हैं। कई वार्डों का क्षेत्र बढ़ गया है, जबकि कई के घट गए हैं। इसी तरह मतदाताओं की संख्या में भी बदलाव हुआ है। कई वार्ड में मतदाताओं की संख्या घटी है, जबकि कई में बढ़ गई है। वार्ड के संख्या में भी बदलाव किया गया है। मसलन दिल्ली में अब सबसे बड़ा वार्ड मयूर विहार फेज-1 बन गया है। त्रिलोकपुरी और संगम विहार दूसरे और तीसरे नंबर पर है। चांदनी चौक का वार्ड अब सबसे छोटा हो गया है। 42 सीटें एससी कोटे के तहत आरक्षित हैं। अब बदले परिसीमन से जातीय समीकरण में भी बड़ा बदलाव हुआ है।
किसे हो सकता है फायदा?
ये समझने के लिए हमने वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद कुमार सिंह से बात की। उन्होंने कहा, '2012 में स्थापना और दिल्ली में पहली बार सरकार बनाने के बाद से आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस को साफ करना शुरू कर दिया है। हर जगह जहां कांग्रेस और भाजपा की सीधी टक्कर हुआ करती थी, अब वो भाजपा और आम आदमी पार्टी में बदल गई है। दिल्ली विधानसभा की तरह ही एमसीडी में भी इसकी बानगी देखने को मिल सकती है। 2017 नगर निगम चुनाव में तीनों जोन में आप ने कांग्रेस को तीसरे नंबर पर कर दिया और खुद दूसरे पायदान पर पहुंच गई। इस चुनाव में अब सीधी टक्कर आम आदमी पार्टी और भाजपा के बीच है।'
प्रमोद आगे कहते हैं, 'भाजपा पिछले 15 साल से एमसीडी पर काबिज है। ऐसे में आम आदमी पार्टी की तरफ से एंटी इन्कंबेंसी को भुनाने की कोशिश में है। वहीं, भाजपा अपने कामों को लेकर जनता के बीच में जाने की बात कर रही है। वहीं, कांग्रेस एक बार फिर खुद को दिल्ली में अपनी उपस्थिति दर्ज करने की कोशिश में लगी हुई है। हालांकि, नए परिसीमन से सारे आंकड़े बदल गए हैं। सभी पार्टियों को जाति, धर्म समेत सभी फैक्टर को नए सिरे से देखना होगा। ऐसे में किसी कितना फायदा या नुकसान होगा ये अभी से कहना जल्दबाजी होगी।'
ये समझने के लिए हमने वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद कुमार सिंह से बात की। उन्होंने कहा, '2012 में स्थापना और दिल्ली में पहली बार सरकार बनाने के बाद से आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस को साफ करना शुरू कर दिया है। हर जगह जहां कांग्रेस और भाजपा की सीधी टक्कर हुआ करती थी, अब वो भाजपा और आम आदमी पार्टी में बदल गई है। दिल्ली विधानसभा की तरह ही एमसीडी में भी इसकी बानगी देखने को मिल सकती है। 2017 नगर निगम चुनाव में तीनों जोन में आप ने कांग्रेस को तीसरे नंबर पर कर दिया और खुद दूसरे पायदान पर पहुंच गई। इस चुनाव में अब सीधी टक्कर आम आदमी पार्टी और भाजपा के बीच है।'
प्रमोद आगे कहते हैं, 'भाजपा पिछले 15 साल से एमसीडी पर काबिज है। ऐसे में आम आदमी पार्टी की तरफ से एंटी इन्कंबेंसी को भुनाने की कोशिश में है। वहीं, भाजपा अपने कामों को लेकर जनता के बीच में जाने की बात कर रही है। वहीं, कांग्रेस एक बार फिर खुद को दिल्ली में अपनी उपस्थिति दर्ज करने की कोशिश में लगी हुई है। हालांकि, नए परिसीमन से सारे आंकड़े बदल गए हैं। सभी पार्टियों को जाति, धर्म समेत सभी फैक्टर को नए सिरे से देखना होगा। ऐसे में किसी कितना फायदा या नुकसान होगा ये अभी से कहना जल्दबाजी होगी।'
गुजरात और दिल्ली में साथ चुनाव आप के लिए क्या मुश्किल खड़ी करेंगे?
प्रमोद के अनुसार, आम आदमी पार्टी के सामने एक और सबसे बड़ी समस्या आई है। अब गुजरात में विधानसभा और दिल्ली में एमसीडी के चुनाव की तारीख आसपास ही हैं। ऐसे में प्रचार-प्रसार को लेकर अरविंद केजरीवाल को दिक्कतें आएंगी। आम आदमी पार्टी के पास अभी अरविंद केजरीवाल ही इकलौता चेहरा हैं, जिनके नाम पर पार्टी को वोट मिलती है। अगर वह गुजरात में प्रचार करेंगे तो एमसीडी में समय नहीं दे पाएंगे और एमसीडी चुनाव के लिए प्रचार करेंगे तो गुजरात चुनाव से दूरियां बढ़ेंगी। ऐसे में उन्हें इसके बीच का कोई विकल्प निकालना होगा। जबकि, आप जैसी स्थिति भाजपा और कांग्रेस में नहीं है। इन पार्टियों में एक से ज्यादा चेहरे प्रचार की कमान संभालते हैं। दोनों पार्टियां एमसीडी चुनाव में राष्ट्रीय की जगह स्थानीय नेताओं के दम पर प्रचार करेंगी।'
प्रमोद के अनुसार, आम आदमी पार्टी के सामने एक और सबसे बड़ी समस्या आई है। अब गुजरात में विधानसभा और दिल्ली में एमसीडी के चुनाव की तारीख आसपास ही हैं। ऐसे में प्रचार-प्रसार को लेकर अरविंद केजरीवाल को दिक्कतें आएंगी। आम आदमी पार्टी के पास अभी अरविंद केजरीवाल ही इकलौता चेहरा हैं, जिनके नाम पर पार्टी को वोट मिलती है। अगर वह गुजरात में प्रचार करेंगे तो एमसीडी में समय नहीं दे पाएंगे और एमसीडी चुनाव के लिए प्रचार करेंगे तो गुजरात चुनाव से दूरियां बढ़ेंगी। ऐसे में उन्हें इसके बीच का कोई विकल्प निकालना होगा। जबकि, आप जैसी स्थिति भाजपा और कांग्रेस में नहीं है। इन पार्टियों में एक से ज्यादा चेहरे प्रचार की कमान संभालते हैं। दोनों पार्टियां एमसीडी चुनाव में राष्ट्रीय की जगह स्थानीय नेताओं के दम पर प्रचार करेंगी।'