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Defence: 'मुकदमेबाजी के आतंक' में विकलांग जवान, पेंशनभोगी और शहीद सैनिकों की विधवाएं! नहीं मिल रहा हक का पैसा

Sat, 07 Sep 2024 04:57 PM IST
Harendra Chaudhary हरेंद्र चौधरी
Updated Sat, 07 Sep 2024 04:57 PM IST
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सार
Defence: ऑल इंडिया एक्स-सर्विसमैन वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष और वरिष्ठ वकील भीम सेन सहगल ने बताया कि उन्होंने विकलांग जवानों, बुजुर्ग पेंशनभोगियों और शहीद सैनिकों की विधवाओं की दुर्दशा को लेकर देश के रक्षा मंत्री को पत्र लिखा है।
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Defence: Disabled, pensioners and widows of martyred soldiers in terror of litigation
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

पूर्व सैनिकों की संस्था ने देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को पत्र लिख कर गुहार लगाई है कि रक्षा मंत्रालय के अफसर विकलांग जवानों, बुजुर्ग पेंशनभोगियों और शहीद सैनिकों की विधवाओं को देश की अदालतों में 'मुकदमेबाजी के आतंक' में फंसा रहे हैं। ऑल इंडिया एक्स-सर्विसमैन वेलफेयर एसोसिएशन का कहना है कि इस बेवजह की मुकदमेबाजी से अदालतों में न केवल मुकदमे बढ़ रहे हैं, बल्कि देश के राजकोष पर भी बोझ बढ़ रहा है। रक्षा मंत्रालय के अफसर अदालतों और ट्रिब्यूनल के तामील के आदेशों को भी हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे रहे हैं। जिसके चलते मिलिट्री कम्यूनिटी भी सरकार से नाराज हो रही है। 



वकीलों और अदालतों के चक्कर लगाने को हो रहे मजबूर
ऑल इंडिया एक्स-सर्विसमैन वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष और सेना के रिटायर्ड अफसर और पंजाब हरियाणा हाई कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता भीम सेन सहगल ने अमर उजाला से खास बातचीत में बताया कि उन्होंने विकलांग जवानों, बुजुर्ग पेंशनभोगियों और शहीद सैनिकों की विधवाओं की दुर्दशा को लेकर देश के रक्षा मंत्री को पत्र लिखा है। अपने पत्र में उन्होंने लिखा है कि रक्षा मंत्रालय (वित्त) और जज एडवोकेट जनरल विभाग के अफसर न केवल देश की सभी अदालतों में विकलांग सैनिकों, वृद्ध पेंशनभोगियों और विधवाओं पर 'मुकदमेबाजी का आतंक' फैला रहे हैं, बल्कि सरकार को भी शर्मिंदा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जिसके चलते देश के विभिन्न दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बुजुर्ग पेंशनधारियों और विकलांग सैनिकों और विधवाओं को वकीलों और अदालतों के चक्कर लगाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। 


हक में फैसला आने के बाद भी नहीं मिल रहा पैसा
बुजुर्ग वेटरन भीम सेन सहगल के मुताबिक आजाद भारत के इतिहास में यह पहली बार है कि रक्षा कर्मियों, पेंशनभोगियों और विधवाओं के पक्ष में आए लगभग सभी अदालती और ट्रिब्यूनल्स के आदेशों को रक्षा मंत्रालय अधिकारी देश भर की हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे रहे हैं। उन्होंने बताया कि आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल (AFT) में तकरीबन 748 अवमानना याचिकाएं पेंडिंग हैं, जिनमें रक्षा मंत्रालय को तीन महीने में ब्याज सहित पैसा लौटाने के लिए कहा गया है। लेकिन पैसा दिया नहीं जा रहा है। उन्होंने कहा कि रक्षा मंत्रालय के अधिकारी हर केस में ऊपरी अदालतों में अपील कर रहे हैं और फौजियों की अनदेखी कर रहे हैं। 2016-17 के केसों में अभी तक पेमेंट नहीं हुई है, इनमें विकलांग जवानों, बुजुर्ग पेंशनभोगियों और शहीद सैनिकों की विधवाओं के पेंशन के मामले हैं। ये ऐसे मामले हैं, जिनमें सुप्रीम कोर्ट भी उनके हक में फैसला दे चुका है, लेकिन अभी तक पैसा नहीं दिया गया है। 

कम उम्र में ही विकलांगता के हो रहे शिकार
रक्षा मंत्री को भेजे पत्र में उन्होंने लिखा है कि यह सभी जानते हैं कि सेना में नौकरी का तनाव और दबाव सैनिकों और अधिकारियों के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है, जिसके कारण वे कभी-कभी कम उम्र में ही कई विकलांगताओं का शिकार हो जाते हैं, जो सेवा की शर्तों के कारण और भी गंभीर हो जाती हैं। परिवार से दूर रहना, बैरक में रहना, परिवारिक मुद्दों की न सुलझा पाने की असमर्थता, लगातार आवागमन, फील्ड एरिया में पोस्टिंग आदि स्वास्थ्य पर बुरा असर डालते हैं। नतीजतन, सैन्य कर्मियों की जीवन अवधि नागरिक कर्मचारियों की तुलना में कम होती है। फिर भी उन्हें विकलांगता लाभ देने से मना कर दिया जाता है, जिसके कारण मुकदमेबाजी होती है। जब अदालतें और ट्रिब्यूनल सैनिकों और उनकी विधवाओं के पक्ष में फैसला सुनाते हैं, तो आपके अधिकारियों का अहंकार आहत होता है और वे हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में उनके खिलाफ रिट याचिकाएं और अपील दायर करना शुरू कर देते हैं।



पूर्व मंत्रियों ने उठाए कड़े कदम
सहगल कहते हैं कि यूपीए कार्यकाल के आखिर में तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटनी ने सबसे पहले इस दर्द को महसूस किया और रक्षा मंत्रालय की तरफ से इन अनैतिक मुकदमों के बारे में जानकारी मिलने पर उन्होंने कई कदम उठाए। लेकिन जब भाजपा सत्ता में आई, तो प्रधानमंत्री मोदी के हस्तक्षेप पर पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने कई कड़े कदम उठाए और इस मुकदमेबाजी को समाप्त किया और रक्षा मंत्रालय के अफसरों की तरफ की जाने वाली बेवजहों की अपीलों पर रोक लगाई। पूर्व रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण के कार्यकाल में 2019 में भी ऐसी सभी अपीलें वापस ले ली गईं थीं और जब सुप्रीम कोर्ट ने रक्षा मंत्रालय के खिलाफ सख्त टिप्पणी की, तो उन्होंने अपने अफसरों को ऐसे मामले दायर करने के लिए फटकार लगाई। यहां तक कि रक्षा मंत्रालय और कानून मंत्रालय द्वारा गठित समितियों ने भी अफसरों को सैनिकों और विधवाओं के खिलाफ फालतू की मुकदमेबाजी में शामिल होने के लिए भी फटकार लगाई थी।

न्याय पाना हुआ असंभव
सहगल कहते हैं कि आज की तारीख में, सीमाओं पर दुश्मन और आतंकवादियों से लड़ने के बजाय, हमारे अधिकारी देश की अदालतों में अपने ही पुराने पेंशनभोगियों और दिग्गजों के खिलाफ लड़ रहे हैं। इतना ही नहीं, अटॉर्नी जनरल को भी सर्वोच्च न्यायालय में सबसे निचले रैंक के विकलांग कर्मियों के खिलाफ नियमित रूप से पेश होने के लिए कहा जा रहा है। एक देश के रूप में हम सभी के लिए इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या हो सकता है? उन्होंने आगे कहा कि सरकार ने सशस्त्र सेना न्यायाधिकरणों (एएफटी) के न्यायिक सदस्यों के पदों को भी नहीं भरा है, बल्कि प्रशासनिक सदस्यों के पदों पर अपने फेवरेट अफसरों को बिठा दिया है। जिससे हमारे दसैनिकों, भूतपूर्व सैनिकों और विधवाओं के लिए न्याय पाना असंभव होता जा रहा है।

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