मानहानि का मामला: दायर याचिका खारिज, मद्रास हाईकोर्ट ने कहा- 'संदर्भ से बाहर देखा, तो कार्टून अर्थ खो देगा'
तमिलनाडु के तिरुणावेल्ली जिला कलेक्टर कार्यालय में साहूकार द्वारा अत्यधिक ब्याज की मांग से परेशान होकर एक ही परिवार के चार सदस्यों ने आत्मदाह कर लिया था। जिसे लेकर कार्टूनिस्ट जी बालाकृष्णन ने एक कार्टून बनाया था, जिसमें तत्कालीन जिला कलेक्टर, पुलिस कमिश्नर और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री मूकदर्शक बनकर घटना को देख रहे थे और उनके निजी अंग नोटों से ढके हुए थे।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
मद्रास हाईकोर्ट ने एक फ्रीलांस कार्टूनिस्ट जी बालाकृष्णन पर दायर मानहानि का मुकदमा खारिज कर करते हुए कहा कि कार्टून को अगर संदर्भ से बाहर देखेंगे तो कार्टून अपना अर्थ खो देंगे। साथ ही कहा कि अदालत लोगों को नैतिकता नहीं सिखा सकती, बल्कि समाज इसे धीरे-धीरे से सीखता है और इसके मानदंडों का पालन करता है।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस जी इलांगोवन ने कहा कि याचिकाकर्ता ने जो किया है उसमें कुछ भी आपराधिक नहीं है, हालांकि ये अनैतिक हो सकता है। कोर्ट ने आगे कहा, ‘लेकिन न्यायालय लोगों को नैतिकता नहीं सिखा सकता है। ये समाज के ऊपर है कि वे बदलें और नैतिक मूल्यों का पालन करें।’
यह था मामला
इस मामले में याचिकाकर्ता कार्टूनिस्ट जी बालाकृष्णन ने साल 2017 में तमिलनाडु के तिरुणावेल्ली कलेक्टर कार्यालय के बाहर हुई आत्मदाह की एक घटना के संबंध में अपने फेसबुक पेज पर एक कार्टून प्रकाशित किया था। साहूकार द्वारा अत्यधिक ब्याज की मांग से परेशान होकर एक ही परिवार के चार सदस्यों ने 23 अक्टूबर 2017 को कलेक्ट्रेट कार्यालय में आत्मदाह कर लिया था।
इस कार्टून में तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री ईके पलानीस्वामी, तत्कालीन तिरुणावेल्ली जिला कलेक्टर संदीप नंदुरी और तिरुणावेल्ली के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर कपिल कुमार सरतकार को दिखाया गया था।
कार्टून में तीन नग्न आकृतियों के साथ एक बच्चे के जलते हुए शरीर को चित्रित किया गया था, जिसमें तत्कालीन जिला कलेक्टर, पुलिस कमिश्नर और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री मूकदर्शक बनकर घटना को देख रहे थे और उनके निजी अंग नोटों से ढके हुए थे। जिला कलेक्टर ने कार्टून को अश्लील, अपमानजनक और मानहानिकारक बताते हुए बाालाकृष्णन के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी।
इसी के आधार पर भारतीय दंड संहिता की धारा 501 (आपराधिक मानहानि) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 67 (इलेक्ट्रॉनिक रूप में अश्लील सामग्री को प्रकाशित या प्रसारित करना) के तहत दंडनीय अपराधों के लिए केस दर्ज किया गया था।
इसके बाद याचिकाकर्ता ने इस मामले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में इस सवाल पर विचार किया जाना है कि ‘बोलने एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहां से शुरू होनी चाहिए और कहां पर खत्म होनी चाहिए।’
अपमान नहीं गुस्से व दुख की अभिव्यक्ति
कोर्ट ने कहा, ‘एक लोकतांत्रिक देश में विचार, अभिव्यक्ति और बोलने की स्वतंत्रता वह नींव है जिस पर लोकतंत्र जीवित रहता है, जिसके बिना कोई लोकतंत्र नहीं हो सकता है, नतीजतन मानव समाज का कोई विकास नहीं होगा।’ न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ता साहूकारों द्वारा अत्यधिक ब्याज की वसूली को रोकने में प्रशासन की अक्षमता के बारे में अपना गुस्सा, दुख और आलोचना व्यक्त करना चाहते थे।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, ‘एक साहूकार द्वारा अत्यधिक ब्याज की मांग के चलते कलेक्ट्रेट परिसर में तीन लोगों की जान चली गई थी। समस्या इस बात की नहीं है कि याचिकाकर्ता पीड़ा, आलोचना या सामाजिक हित को लेकर लोगों के मन में जागरूकता पैदा करना चाहता था, लेकिन जिस तरह से उन्होंने इसे व्यक्त किया, वह विवाद बन गया। कार्यपालिका के मुखिया से लेकर जिला पुलिस तक के अधिकारियों को उस रूप में दर्शाने से विवाद पैदा हो गया।’
कोर्ट ने कहा कि कुछ लोग ऐसा सोच सकते हैं कि ये कार्टून ‘अतिरेक’ या ‘अश्लील’ था, वहीं कई लोगों का मानना है कि इसने लोगों के जीवन को बचाने के लिए प्रशासन द्वारा किए जाने वाले पक्षपात को सही ढंग से दर्शाया है। इस तरह एक कानून को लोगों द्वारा अलग-अलग तरीके से देखा जा सकता है।
कोर्ट ने कहा कि हो सकता है कि कार्टून ने कलेक्टर के मन में अपमान की भावना पैदा की हो, लेकिन याचिकाकर्ता का इरादा साहूकारों द्वारा अत्यधिक ब्याज की मांग के संबंध में अधिकारियों के रवैये को दिखाना था। मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की ऐसी कोई मंशा नहीं थी कि वे कलेक्टर की मानहानि करे। इस तरह कोर्ट ने आरोपी व्यक्ति को निर्दोष बताते हुए एफआईआर को खारिज करने का आदेश दिया।