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CRPF: 15वें साल में सीआरपीएफ के ग्राउंड कमांडरों को पदोन्नति नहीं, क्या अब खत्म होगा परमोशन का वनवास

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Sat, 18 Jan 2025 02:22 PM IST
सार

CRPF: करीब डेढ़ दशक से पदोन्नति का इंतजार कर रहे सहायक कमांडेंट को डिप्टी कमांडेंट 'डीसी' के रिक्त पदों पर 'अगेंस्ट द वैकेंसी ऑफ डीसी' की पोस्टिंग भी नहीं मिल पा रही है। समय पर पदोन्नति न मिलने से अफसरों के मनोबल पर विपरित असर पड़ता है।

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CRPF: No promotion for CRPF ground commanders in 15th year will the exile of promotion end now
केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीआरपीएफ' - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

 देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीआरपीएफ' में ग्राउंड कमांडर यानी 'सहायक कमांडेंट' को 15 साल बाद भी पहली पदोन्नति नहीं मिल पा रही है। सीआरपीएफ में करीब डेढ़ सौ डिप्टी कमांडेंट के पद रिक्त हैं, लेकिन इसके बावजूद ग्राउंड कमांडरों को आगे नहीं बढ़ाया जा रहा। कैडर अधिकारियों के मुताबिक, बल मुख्यालय द्वारा कोर्ट केस का हवाला देकर ग्राउंड कमांडरों को शांत कर दिया जाता है। ऐसे भी आरोप लगते रहे हैं कि बल मुख्यालय इस मामले में कोई विधिक उपाय भी नहीं कर रहा। अब केंद्रीय गृह मंत्रालय, सीआरपीएफ के ग्राउंड कमांडरों को राहत दे सकता है। सूत्रों का कहना है, अदालत के समक्ष ठोस पैरवी कर सहायक कमांडेंट के लिए पहली पदोन्नति का रास्ता बनाया जाएगा। 
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सूत्रों के मुताबिक, दिसंबर में केंद्रीय गृह मंत्रालय में हुई एक उच्चस्तरीय बैठक में यह मुद्दा उठा था। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पदोन्नति के मुद्दे को गौर से सुना। उन्हें बताया गया कि ग्राउंड कमांडरों को वाकई पहली पदोन्नति मिलने में बहुत अधिक वक्त लग रहा है। बैठक में यह बात भी सामने आई कि पदोन्नति न होने के पीछे अदालत में चल रहा मामला है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, इस मामले में काफी संजीदा नजर आए। उन्होंने निर्देश दिए कि अदालत में इस केस की ठोस पैरवी कर पदोन्नति का रास्ता खोला जाए। उस बैठक में सीआरपीएफ के शीर्ष अधिकारी भी मौजूद थे। अब बताया जा रहा है कि पदोन्नति के इस गतिरोध को खत्म कराने के लिए वरिष्ठ कानूनी विशेषज्ञों की राय ली जा रही है। 
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बल के एक अधिकारी का कहना है, करीब डेढ़ दशक से पदोन्नति का इंतजार कर रहे सहायक कमांडेंट को डिप्टी कमांडेंट 'डीसी' के रिक्त पदों पर 'अगेंस्ट द वैकेंसी ऑफ डीसी' की पोस्टिंग भी नहीं मिल पा रही है। समय पर पदोन्नति न मिलने से अफसरों के मनोबल पर विपरित असर पड़ता है। यही ग्राउंड कमांडर, बल में टेरेरिस्ट/नक्सली ऑपरेशन के अलावा चुनावी ड्यूटी और आपदा के दौरान कंपनी कमांड करते हैं। अगर जल्द ही इस मुद्दे का समाधान नहीं तलाशा गया तो रिक्तियां बढ़ती रहेंगी और बल का कामकाज भी प्रभावित होगा।
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गत वर्ष सीआरपीएफ डीजी ने ग्राउंड कमांडरों के साथ एक संवाद किया था। तब अन्य बातों के अलावा कैडर अफसरों ने अपनी पदोन्नति का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया था। एक अधिकारी ने तो भावुक होकर स्वयं को अभिशापित अधिकारी बता दिया था। संवाद के दौरान कई दूसरे ग्राउंड कमांडर भी पदोन्नति को लेकर हतोत्साहित नजर आए थे। ग्राउंड कमांडरों से संवाद के बाद डीजी सीआरपीएफ ने उन्हें आश्वासन दिया था कि जल्द ही उनकी समस्या को हल किया जाएगा। 

तत्कालीन डीजी अनीश दयाल सिंह ने इस मसले पर कैडर अधिकारियों की एक कमेटी भी गठित की थी। उसे 30 जून तक अपनी रिपोर्ट देनी थी। वह रिपोर्ट बल मुख्यालय द्वारा गृह मंत्रालय को भेजी जानी थी। सूत्र बताते हैं कि ऐसी रिपोर्ट कई बार बन चुकी हैं। समस्या क्या है और उसका हल क्या है, ये बात गृह मंत्रालय और बल मुख्यालय के शीर्ष अधिकारी ही जानते हैं। इसके बावजूद ग्राउंड कमांडरों की डिप्टी कमांडेंट बनने की फाइल आगे नहीं बढ़ पा रही।

कैडर अधिकारी बताते हैं, हमारा क्या कसूर है। बल में ऐसी कौन सी ड्यूटी है, जिसमें उनकी भूमिका नहीं होती। अगर पहली पदोन्नति मिलने में ही 15 साल लग रहे हैं तो बाकी के सेवाकाल का अंदाजा लगाया जा सकता है। मतलब, आधी सर्विस में एक भी पदोन्नति नहीं मिल रही। अगर पदोन्नति, इसी रफ्तार से मिलती रही तो इन अधिकारियों को कब बटालियन कमांड करने का मौका मिलेगा। जब वे रिटायरमेंट के करीब होंगे, तब वे कमांडेंट बनेंगे। उनके लिए डीआईजी, आईजी या एडीजी के पदों तक पहुंचना तो एक सपना ही बना रहेगा। 

ग्राउंड कमांडर व दूसरे अधिकारियों को अपने हकों के लिए अदालत में जाना पड़ रहा है। नियमों की गलत व्याख्या के कारण कैडर अधिकारियों को लाभ से वंचित रखा गया है। जब उन्होंने मजबूरी में कोर्ट का रुख किया तो विभाग ने उनका साथ नहीं दिया। इन अफसरों को नियमों के अनुसार, वित्तीय लाभ, मकान भत्ता, राशन मनी, डिटैचमेंट एलाउंस व ओल्ड पेंशन आदि न मिलने के कारण कोर्ट में जाना पड़ रहा है। अदालत से केस जीतने के बाद भी इन्हें पूरे फायदे नहीं मिल रहे। विभाग अपने ही अधिकारियों के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में रिव्यू पिटीशन एवं सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दाखिल कर रहा है। हैरानी की बात तो ये है कि कुछ मामलों में सुप्रीम कोर्ट से जीतने के बाद भी उसका लाभ लेने के लिए याचिकाकर्ताओं को अवमानना याचिका तक दाखिल करनी पड़ रही है।

सूत्रों के मुताबिक, पदोन्नति का मुद्दा उठाने वाले कैडर अफसरों को दो टूक जवाब मिलता है कि मामला तो अभी कोर्ट में है। डीपीसी पर स्टे है। अगर ऐसे ही डीपीसी पर स्टे लिया जाता रहा और विभाग, निष्क्रियता दिखाता रहा तो ये एक खतरनाक ट्रेंड बन जाएगा। वरिष्ठता सहित कई मुद्दे अदालत में चलते रहते हैं। ऐसा नहीं है कि इस प्रक्रिया के दौरान योग्य अधिकारियों को पदोन्नति नहीं मिलती। सब्जेक्ट टू कोर्ट जजमेंट के हिसाब से पदोन्नति दी जा सकती है। सूत्रों ने बताया कि कोर्ट केसों में विभाग का रवैया अभी तक लचर ही रहा है। अधिकारियों को समय पर नोटिस तक सर्व नहीं किया जाता। जब भी ग्राउंड कमांडर इस मुद्दे को बल मुख्यालय के शीर्ष अफसरों के समक्ष उठाते हैं तो यह दिलासा दी जाती है कि लॉ इकाई, इस मामले में सक्रिय है। वरिष्ठता के मामले में सुप्रीम कोर्ट का स्टे चल रहा है, इसे जल्द खत्म कराने का प्रयास हो रहा है। 

केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत अर्धसैनिक बल, बीएसएफ और सीआरपीएफ की कैडर समीक्षा फाइल, अभी तक कहीं पर अटकी है। गत वर्ष की अंतिम कैडर समीक्षा रिपोर्ट में इन दोनों बलों का नाम नहीं था। डीओपीटी के नियमानुसार, हर 5 साल में कैडर समीक्षा पूरी होना जरुरी है। सीआरपीएफ का पिछला कैडर रिव्यू 2016 में हुआ था। बल के लिए कैडर रिव्यू कमेटी 'सीआरसी' की बैठक 15 दिसंबर 2015 को हुई थी, जबकि उसे 29 जून 2016 को कैबिनेट की मंजूरी मिली थी। इसी तरह बीएसएफ के कैडर रिव्यू को 12 सितंबर 2016 को कैबिनेट की स्वीकृति प्रदान की गई थी। डीओपीटी की तरफ से जारी कैडर समीक्षा रिपोर्ट में सीआरपीएफ और बीएसएफ का नाम ही नहीं है। अब इनके रिव्यू की क्या स्थिति है, फाइल किसकी टेबल पर है, इसकी जानकारी तक नहीं दी गई है। 

नियमानुसार, दोनों बलों की कैडर रिव्यू प्रक्रिया चार साल पहले पूरी हो जानी चाहिए थी। केंद्रीय अर्धसैनिक बल, बीएसएफ और सीआरपीएफ में खासतौर पर सिपाही से लेकर सहायक कमांडेंट तक के रैंक वाले परेशान हैं। वजह, इन्हें समय पर पदोन्नति नहीं मिल रही। नियमानुसार, हर पांच साल में कैडर समीक्षा की प्रक्रिया पूरी हो जानी चाहिए। सीआरपीएफ और बीएसएफ में सिपाही को पहली पदोन्नति, 18 से 20 साल में मिल रही है। सीधी भर्ती के जरिए सेवा में आने वाले सहायक कमांडेंट को मौजूदा समय में डिप्टी कमांडेंट बनने में लगभग 15 साल लग रहे हैं। अगर कोई निरीक्षक है तो उसे सहायक कमांडेंट के पद पर पहुंचने में लगभग 15 वर्ष लग जाते हैं। दो साल से कैडर अधिकारियों की समीक्षा फाइल एक टेबल से दूसरी टेबल पर घूम रही है। कभी तो मामला अदालत  में होने की बात कह दी जाती है तो कभी विचार विमर्श या जरुरी कमेंट्स मांगने के लिए फाइल विशेषज्ञों की मेज पर पहुंच जाती है। नतीजा, पिछले पांच वर्ष में सीआरपीएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी, एसएसबी, सीआईएसएफ और असम राइफल्स में 50 हजार से अधिक कर्मियों ने नौकरी छोड़ दी है। 

पांच केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल/सीएपीएफ, जिसमें बीएसएफ, सीआरपीएफ, एसएसबी, सीआईएसएफ और आईटीबीपी शामिल हैं। इन बलों में 'समूह ए' अधिकारियों की सेवाएं 1986 से संगठित हैं, मगर अधिकारियों को उसका लाभ नहीं मिल सका। 2006 के दौरान जब छठे केंद्रीय वेतन आयोग ने आईएएस, आईपीएस व आईआरएस सहित अन्य सभी संगठित समूह ए सेवाओं 'ओजीएएस' के लिए गैर कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन 'एनएफएफयू' योजना शुरु की तो कैडर अधिकारियों ने भी इसका लाभ देने की मांग की।

हालांकि तब 'सीएपीएफ' को संगठित समूह 'ए' सेवा के रूप में मान्यता देने से इनकार कर दिया गया। इसके बाद कैडर अफसरों ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद 3 सितंबर 2015 के दिन अदालत ने अपने फैसले में सीएपीएफ को 1986 से 'संगठित समूह ए सेवा' घोषित कर दिया। 


दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सर्वोच्च न्यायालय ने 5 फरवरी 2019 को दिए अपने फैसले में दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 3 जुलाई 2019 को अपनी एक घोषणा के जरिए 'सीएपीएफ संगठित सेवा ए' को मंजूरी प्रदान कर दी। तक कैडर अफसरों में भी यह उम्मीद जगी थी कि उन्हें एनएफएफयू के परिणामी लाभ मिल जाएंगे। बाद में कुछ नहीं हो सका। दोबारा से मामले अदालतों में पहुंच गए।
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